क्या होता है गर्भगृह, अयोध्या के राम मंदिर में जिसका निर्माण शुरू हुआ

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उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बुधवार को राम मंदिर के पवित्र गर्भगृह का शिलापूजन किया. मंत्रोच्चारण के बीच उन्होंने गर्भगृह की आधारशिला रखी. इसके बाद अयोध्या के राम मंदिर में  गर्भगृह निर्माण का काम शुरू हो गया. हिंदू मंदिरों के कई भाग होते हैं, जिसमें सबसे महत्वपूर्ण गर्भगृह ही होता है. ये वो भाग है, जहां देवमूर्ति की स्थापना की जाती है. इसका आकार-प्रकार और मूर्ति रखने की जगह ना केवल तय होती है बल्कि शास्त्रसम्मत तरीके से किया जाता है.

आप जब मंदिर जाते हैं तो जहां देवी-देवताओं की मूर्ति रखी होती है, उस प्रकोष्ठ को गर्भगृह कहते हैं. हिंदुओं के उपासनास्थल को मंदिर कहते हैं. वैसे मंदिर का शाब्दिक अर्थ घर है.

कैसा होता है गर्भगृह?
आम तौर पर गर्भगृह एक खिड़की रहित और कम रोशनी वाला कक्ष होता है, जिसे जानबूझकर ऐसा बनाया गया है ताकि भक्त के दिमाग को उसके भीतर परमात्मा के मूर्त रूप पर केंद्रित किया जा सके.

आकार क्या होता है?
गर्भगृह सामान्य रूप से वर्गाकार होता है और एक चबूतरे पर बैठता है. इसे ब्रह्मांड के सूक्ष्म जगत का प्रतिनिधि माना जाता है. केंद्र में देवता की मूर्ति रखी जाती है. पहले गर्भगृह छोटे होते थे और उनका द्वार भी छोटा सा होता था, लेकिन समय के साथ इसका आकार बढ़ता गया.

 

गर्भगृह में प्रतिस्थापित शिवलिंग. आमतौर पर शिवलिंग गर्भगृह में बीचों बीच ही रहता है.

कुछ शुरुआती मंदिरों में गर्भगृह वर्गाकार नहीं होता था. कुछ में आयताकार होता था. जहां एक से अधिक देवताओं की पूजा की जाती है और कुछ प्राचीन मंदिरों में गर्भगृह को मंदिर के मुख्य तल के नीचे रखते थे.

तमिल भाषा में इसे करुवराई कहा जाता है जिसका अर्थ है गर्भगृह का आंतरिक भाग. यह मंदिर का अधिकांश गर्भगृह और केंद्र है, जहां प्राथमिक देवता की छवि रहती है. गर्भगृह के एक ओर मंदिर का द्वार और तीन ओर दीवारें होती हैं. ये द्वार बहुत अलंकृत तरीके से बनाया जाता है.

अयोध्या के राम मंदिर के गर्भगृह का आकार क्या होगा?
इस मंदिर के गर्भगृह का आकार प्रकार 20 फीट चौड़ा और 20 फीट लंबा होगा. राम मंदिर का गर्भगृह पश्चिम दिशा में ही बनेगा.

गर्भगृह में मूर्तियां किस स्थिति में रखी जाती हैं?
गर्भगृह में मूर्तियों के रखने की स्थितियां भगवान के अनुसार अलग होती हैं. भगवान विष्णु आदि की मूर्तियां आमतौर पर पिछली दीवार के सहारे रखी जाती हैं. शिवलिंग की स्थापना गर्भगृह के बीचोंबीच होती है. देवतत्त्व की दृष्टि से गर्भगृह अत्यंत मांगलिक और महत्त्वपूर्ण स्थान होता है. यही मंदिर का ब्रह्मस्थान है.

तिरुपति में भगवान बालाजी के मंदिर में गर्भगृह में उनकी पूजाअर्चना. इस मंदिर में गर्भगृह में केवल पुजारी ही जा सकता है. बाकी लोगों का प्रवेश उसमें नहीं होता.

गर्भगृह क्यों बनाए जाते हैं?
भगवान की वेदी खुले हाॅल में नहीं बनानी चाहिए. बड़े हाॅल में छोटा कमरा होता है, जिसमें वेदी बनाई जाती है. जिस प्रकार समवसरण की आठवीं भूमि में भव्य जीव ही प्रवेश पाते हैं, उसी प्रकार गर्भगृह में भी शुद्ध वस्त्रादि पहनकर ही प्रवेश किया जाता है. शास्त्रों में कहा गया है कि अशुद्ध वस्त्रों में होने पर हाॅल में ही दर्शन करना चाहिए. इसी बात का भी ध्यान रखते हुए मंदिरों में गर्भगृह बनाए जाते हैं.

गर्भगृह और मंडप में क्या अंतर है?
–  ये मंदिर का प्रवेश कक्ष होता है, इसे हाल भी कहते हैं, ये स्तंभों पर टिका होता है. ऊपर छत होती है. इसमें संख्या के हिसाब से भक्त गण ज्यादा संख्या में इकट्ठा हो सकते हैं.

 

दक्षिण भारत के द्रविण शैली के बने मंदिर में गर्भगृह की स्थिति. इससे पहले एक लंबा गलियारा है, जिसे मंडप कहा जाता है.

मंदिर और मठ में क्या अंतर है?
– मंदिर में देवमूर्ति होती है, जिसकी पूजा-अर्चना की जाती है. मठ वह जगह है, जहां किसी सम्प्रदाय, धर्म या परंपरा विशेष में आस्था रखने वाले शिष्य आचार्य या धर्मगुरु अपने सम्प्रदाय के संरक्षण और संवर्द्धन के उद्देश्य से धर्म ग्रन्थों पर विचार विमर्श करते हैं या उनकी व्याख्या करते हैं, जिससे उस सम्प्रदाय के मानने वालों का हित हो. उन्हें पता चल सके कि उनके धर्म में क्या है. ‘मठ’ शब्द का प्रयोग शंकराचार्य के काल यानी सातवीं या आठवीं शताब्दी से शुरू हुआ माना जाता है.

मंदिर कितनी शैलियों के होते हैं. राम मंदिर किस शैली में बन रहा है?
– राम मंदिर नागर शैली में बनाया जा रहा है. जिस शैली में उत्तर भारत के तमाम मंदिर बनते रहे हैं. मंदिरों के निर्माण में मुख्य तौर पर तीन प्रकार की शैलियां इस्तेमाल होती रही हैं- नागर, द्रविड़ और बेसर शैली. मंदिर निर्माण की प्रक्रिया की शुरुआत मौर्य काल से हुई. आगे चलकर उसमें सुधार हुआ. गुप्त काल को मंदिरों की विशेषताओं से लैस देखा जाता है.
संरचनात्मक मंदिरों के अलावा एक अन्य प्रकार के मंदिर थे जो चट्टानों को काटकर बनाए गए. जैसे महाबलिपुरम का रथ-मंडप जो 5वीं शताब्दी का है.

नागर शैली में बना हुआ खजुराहो का मंदिर (विकी कामंस)

नागर शैली क्या होती है, इसके मंदिर कैसे होते हैं?
– ‘नागर’ शब्द नगर से बना है. सबसे पहले नगर में निर्माण होने के कारण इसे नागर शैली कहा जाता है. यह संरचनात्मक मंदिर स्थापत्य की एक शैली है जो हिमालय से लेकर विंध्य पर्वत तक के क्षेत्रों में प्रचलित थी. इसे 8वीं से 13वीं शताब्दी के बीच उत्तर भारत में मौजूद शासक वंशों ने पर्याप्त संरक्षण दिया.
नागर शैली की पहचान-विशेषताओं में समतल छत से उठती हुई शिखर की प्रधानता पाई जाती है. इसे अनुप्रस्थिका एवं उत्थापन समन्वय भी कहा जाता है.

नागर शैली के मंदिर आधार से शिखर तक चतुष्कोणीय होते हैं. ये मंदिर ऊंचाई में 08 भागों में बांटे गए हैं, जिनके नाम इस प्रकार हैं- मूल (आधार), गर्भगृह मसरक (नींव और दीवारों के बीच का भाग), जंघा (दीवार), कपोत (कार्निस), शिखर, गल (गर्दन), वर्तुलाकार आमलक और कुंभ (शूल सहित कलश).
इस शैली में बने मंदिरों को ओडिशा में ‘कलिंग’, गुजरात में ‘लाट’ और हिमालयी क्षेत्र में ‘पर्वतीय’ कहा गया.

द्रविड़ शैली के मंदिर कैसे होते हैं ये कहां होते हैं?
– कृष्णा नदी से लेकर कन्याकुमारी तक द्रविड़ शैली के मंदिर पाए जाते हैं. कहा जा सकता है कि दक्षिण भारत के मंदिर द्रविड़ शैली के होते हैं. इस शैली की शुरुआत 8वीं शताब्दी में हुई. द्रविड़ शैली के मंदिर की खासियतों में – प्राकार (चहारदीवारी), गोपुरम (प्रवेश द्वार), वर्गाकार या अष्टकोणीय गर्भगृह (रथ), पिरामिडनुमा शिखर, मंडप (नंदी मंडप) विशाल संकेन्द्रित प्रांगण तथा अष्टकोण मंदिर संरचना शामिल हैं.
द्रविड़ शैली के मंदिर बहुमंजिला होते हैं. पल्लवों ने द्रविड़ शैली को जन्म दिया, चोल काल में इसने ऊंचाइयां हासिल की. विजयनगर काल में ये और भव्य हुए. इसमें कला का और संगम हुआ. चोल काल में द्रविड़ शैली की वास्तुकला में मूर्तिकला और चित्रकला का संगम हो गया.
द्रविड़ शैली में ही आगे नायक शैली का विकास हुआ, जिसके उदाहरण हैं- मीनाक्षी मंदिर (मदुरै), रंगनाथ मंदिर (श्रीरंगम, तमिलनाडु), रामेश्वरम् मंदिर आदि।

मंदिरों के निर्माण की बेसर शैली क्या है, क्या अब भी इस शैली से मंदिर बनते हैं?
– नागर और द्रविड़ शैलियों के मिले-जुले रूप को बेसर शैली कहते हैं. इस शैली के मंदिर विंध्याचल पर्वत से लेकर कृष्णा नदी तक पाए जाते हैं.
बेसर शैली को चालुक्य शैली भी कहते हैं. बेसर शैली के मंदिरों का आकार आधार से शिखर तक गोलाकार (वृत्ताकार) या अर्द्ध गोलाकार होता है.बेसर शैली का उदाहरण है – वृंदावन का वैष्णव मंदिर जिसमें गोपुरम बनाया गया. अब आमतौर पर इस शैली के मंदिर नहीं बनते.

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