भाजपा में इस बार विधायकों को नहीं संगठन की चलेगी, पहले किया गया भरोसा कमजोर साबित हुआ

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भारतीय जनता पार्टी ने नगरीय निकाय चुनाव को लेकर तैयारी काफी पहले से शुरु कर दी थी। यही वजह है कि अधिसूचना जारी होने के दौरान भाजपा से नेता बेफिक्र हैं और वह भोपाल से लेकर जबलपुर तक अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष के स्वागत की तैयारियों में लगे हैं। भाजपा ने नगर निगमों में पार्षदों और महापौर टिकट को लेकर कुछ मापदंड तैयार कर लिए हैं।

वर्ष 2009 और 2014 में जिस तरह पार्षद टिकट वितरण में विधायकों की मनमानी चली थी उसका खामियाजा पार्टी को अभी तक भुगतना पड़ रहा है। भोपाल और इंदौर जैसे शहर में पार्टी को कई क्षेत्रों में अच्छे उम्मीदवारों की तलाश करनी पड़ रही है। ऐसा इसलिए हुआ है कि पिछले दो नगर निगम चुनाव में विधायकों ने ऐस लोगों को टिकट दिए जो भविष्य में बड़े नेता नहीं बन सके।

इस बार संगठन की सिफारिश ज्यादा काम करेगी। प्रदेश में नगर निगम, नगर पालिका चुनाव की अधिसूचना अगले एक-दो दिन में जारी हो जाएगी। इसको लेकर प्रदेश के दोनेां प्रमुख राजनीतिक दल भाजपा और कांग्रेस में दावेदार से लेकर बड़े नेता रणनीति बनाने में जुटे हैं।

2009 के पहले 2004 में चुनाव हुए थे। तब तक भाजपा में संगठन को महत्व मिलता था। इसके बाद जब 2009 में चुनाव हुए तो पार्षदों के टिकट वितरण में विधायकों ने अपनी मनमानी चलाई। भाजपा में तीन स्तर पर कमेटियां बनती हैं जिला संभाग और प्रदेश। जिले से तीन नाम की पैनल बनती है और संभाग की समिति पार्षदों की टिकट फाइनल करती है।

लेकिन पिछले दो बार में विधायकों की जिद के आगे संगठन ने घुटने टेक दिए थे। 2014 में स्वर्गीय नंदकुमार सिंह चौहान प्रदेश अध्यक्ष थे। विधायकों ने संभाग समितियों को सिर्फ सिंगल नाम भेजे। आपसी प्रतिद्वंद्विता के बावजूद इस मामले में सभी विधायक एकजुट थे। भविष्य में उनके लिए ही मुसीबत का कारण बन जाए। इसलिए भोपाल जैसे महानगर में भी विधायकों ने एक दूसरे के क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं किया। इसका खामियाजा भाजपा संगठन को अब उठाना पड़ रहा है। निवर्तमान पार्शदों में से अधिकांश अब भविष्य के लिए नया नेतृत्व तैयार करने की कोशिश में हैं।

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