1767 में बंगाल के मुखर्जी परिवार द्वारा वाराणसी में स्थापित इस प्रतिमा का आज तक नहीं हुआ विसर्जन   

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DESK NEWS |  1767 में नवरात्रि पर बंगाल के एक मुखर्जी परिवार ने वाराणसी में मां दुर्गा की एक ऐसी प्रतिमा स्थापित की, जो आज तक विसर्जित नहीं की जा सकी। मूर्ति में आज न तो कोई खरोंच है और न ही रखरखाव का कोई खर्चा। मां दुर्गा की इच्छानुसार 254 साल से केवल चना और गुड़ का भोग लगाया जा रहा है।

दरअसल, बंगाल के हुगली से बनारस आए प्रसन्न मुखर्जी नाम के एक दुर्गाभक्त ने मदनपुरा के गुरुणेश्वर महादेव मंदिर के पास यह प्रतिमा नवरात्रि के पहले दिन स्थापित की।

मुखर्जी परिवार के वंशज पं. हेमंत मुखर्जी बताते हैं कि नवमी पर भक्त प्रसन्न के सपने में मां दुर्गा आईं और बोलीं कि मुझे काशीवास करना है। गंगा में मत बहाना। बस चना और गुड़ पर मेरा गुजारा हो जाएगा। मगर, दशमी की सुबह मूर्ति विसर्जन पर प्रतिमा उठाने की तैयारी होने लगी। 4 लोगों से मूर्ति नहीं हिली तो धीरे-धीरे 60 से अधिक लाेग और पहलवान बुलाए गए|

लेकिन मां को टस-से-मस तक नहीं कर सके। इसके बाद भक्त मुखर्जी को रात में देखा गया सपना याद आता है। उसने तत्काल मना किया कि मां का विसर्जन नहीं होगा। तब से आज तक मिट्टी और पुआल की बनी यह प्रतिमा काशी की विरासत के रूप में जानी जाती है।

दुर्गापूजा में मंदिर खोला जाता है और रोजाना 6 हजार श्रद्धालु दर्शन करते हैं। पंडित हेमंत मुखर्जी के अनुसार रंग रोधन के अलावा मूर्ति पर कोई खर्च नहीं होता। इसके अलावा उन्हीं के बगल में ब्लैक स्टोन से बनी 11वीं शताब्दी की भगवान विष्णु की भी मूर्ति स्थापित है।

6 साल बाद 1773 में बनारस के बंगाली ड्योढ़ी में दुर्गापूजा को भव्य रूप से मनाया जाने लगा। राजा राजेंद्र मित्र ने निर्देश पर देवी को चांदी के सिंहासन पर विराजमान किया गया जो कि 18वीं सदी के कुशल कारीगरों द्वारा बनाया गया था। इसमें स्थापित होने वाली मूर्ति पर हर दुर्गापूजा सोने का पत्तर चढ़ाया जाता था। वहीं यहां से मां दुर्गा की विदाई महापाया पालकी में होती है। परंपरा यह भी है कि बनारस में सबसे पहले बंगाली ड्योढ़ी की प्रतिमा विसर्जित होती है।

सार्वजनिक दुर्गापूजा की शुरूआत 1922 से

बनारस में सार्वजनिक रूप से हर गली-मोहल्ले में दुर्गापूजा की शुरूआत 1922 में हुई थी। पहली मूर्ति काशी नरेश के नदेसर स्थित महाराजा पैलेस परिसर में स्थापित हुई थी। वाराणसी दुर्गोत्सव सम्मिलनी (वीडीएस) नाम की संस्था ने इसकी शुरूआत की थी। इसमें खास तौर काशिराज प्रभु नारायण सिंह ने शिरकत की थी। कई साल के बाद इस पूजा को पांडेय हवेली के सीएम एंग्लो बंगाली प्राइमरी पाठशाला में किया जाने लगा और तब से लेकर आज तक यहीं पर यह दुर्गापूजा होती है।

 

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