19.73 crore people in India suffer from mental illness of which 4.57cr suffer from depression and 4.49cr from anxiety – राजनीतिः जीवन में अवसाद की जड़ें

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ज्योति सिडाना

अवसाद या डिप्रेशन का अर्थ होता है आशाहीनता की स्थिति। जब मनुष्य को अपने जीवन में किसी भी प्रकार की उम्मीद या आशा की संभावना नहीं दिखाई देती, तो वह अवसाद की स्थिति में चला जाता है। एक सर्वे के दौरान पाया गया कि कुछ छोटे बच्चे स्कूल का होमवर्क न कर पाने को तनाव का कारण बता रहे थे। स्वाभाविक है कि घर, पड़ोस और स्कूल में अपने बड़ों को ऐसा बोलता सुनते हैं और वे उनका अनुकरण करते हैं और फिर यह शब्द उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाता है।

दरअसल, समाज में अधिकतर लोग अवसाद (डिप्रेशन), तनाव (टेंशन), चिंता (एंग्जाइटी), उदासी (सैडनेस) में अंतर नहीं कर पाते या अंतर जानते ही नहीं हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक अवसाद एक मानसिक बीमारी है, जो आमतौर पर मिजाज में होने वाले उतार-चढ़ाव और कम समय के लिए होने वाली भावनात्मक प्रतिक्रिया है, जबकि चिंता में व्यक्ति डर और घबराहट का अनुभव करता है। जब कोई व्यक्ति किसी स्थिति में खुद को बेबस महसूस करता है, तो इसे चिंता या एंग्जाइटी की स्थिति कहते हैं। लेकिन जब व्यक्ति किसी स्थिति में खुद को नाउम्मीद महसूस करने लगता है यानी उसे लगने लगता है कि उसका जीवन बेकार है, वह धरती पर बोझ है, उसका कोई भविष्य नहीं, तो यह स्थिति अवसाद कहलाती है। जब व्यक्ति अपनी क्षमता से अधिक या कम स्तर के कार्य का चुनाव करता है, या उस काम के लिए जितने प्रयास और जैसी रणनीति की आवश्यकता होती है उसने अगर नहीं बनाई तो उस कार्य में उसे विफलता का सामना करना पड़ सकता है, अपनी क्षमता और कार्य के बीच वह संतुलन नहीं बना पाता, इस प्रकार उत्पन्न स्थिति को तनाव कहते हैं। और जब व्यक्ति के जीवन में कोई बात उसके इच्छानुसार नहीं होती या लोगों का व्यवहार उसके अनुरूप नहीं होता, तब वह उदास या दुखी हो जाता है। इस तरह ये सभी अवधारणाएं अलग-अलग हैं। पर इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि उदासी, तनाव या चिंता अगर लंबे समय तक व्यक्ति में बनी रहती है, तो वह अवसाद की स्थिति में आ जाता है।

हाल ही में साइंस जर्नल लैंसेट के अनुसार दुनिया में हर नौ में से एक व्यक्ति मानसिक बीमारी से पीड़ित है। छब्बीस करोड़ लोग अवसाद में हैं। भारत में 19.73 करोड़ लोग मानसिक बीमारी से पीड़ित हैं, जिनमें से 4.57 करोड़ अवसाद से और 4.49 करोड़ चिंता से पीड़ित हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार 2013-18 के बीच 52 हजार 526 लोगों ने मानसिक बीमारी से तंग आकर आत्महत्या कर ली। दूसरी तरफ राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण की 2015-16 की रिपोर्ट के अनुसार देश में नौ हजार मनोचिकित्सक हैं यानी एक लाख की आबादी पर 0.75, जबकि प्रति लाख आबादी पर इनकी संख्या कम से कम तीन होनी चाहिए। यानी देश में नौ हजार की जगह छत्तीस हजार मनोचिकित्सकों की आवश्यकता है।

ऐसा नहीं कि इस बीमारी का इलाज नहीं है या लोग इससे बाहर नहीं आ सकते। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से इसे मानसिक रोग के रूप में देखा जाता है, पर समाजशास्त्रीय दृष्टि से देखें तो यह कोई बीमारी नहीं, बल्कि एक अभावग्रस्त स्थिति है। मसलन, सामाजिक संबंधों में निकटता का अभाव, संचार का अभाव, परेशानियों/ समस्याओं को साझा न कर पाना, पारस्परिक समझ का अभाव, एक दूसरे के साथ समय बिताने का अभाव आदि। ऐसा नहीं कि पहले के समाजों में ऐसा नहीं होता था पर, आज प्रौद्योगिकी की तीव्र गति और संबंधों के बदलते स्वरूपों ने अवसाद की मात्रा और संभावना काफी बढ़ा दी है। जैसे-जैसे भौतिकतावादी संस्कृति बढ़ रही है वैसे-वैसे दिखावे की संस्कृति में भी वृद्धि हो रही है, जिसके चलते हर जगह प्रतिस्पर्धा भी बढ़ रही है और जो इस प्रतिस्पर्धा में खुद को विफल या कमतर अनुभव करता है, वह अवसाद का शिकार हो जाता है। साथ ही लोगों में संघर्ष करने का जज्बा और आपसी सामंजस्य की भावना घटी है, असहनशीलता और व्यक्तिवादिता बढ़ी है। नतीजतन, व्यक्ति समाज से कटा हुआ अनुभव करता, अकेलेपन का शिकार हो जाता है। यही अकेलापन उसे आत्महत्या जैसे कदम उठाने पर बाध्य कर देता है। विश्लेषण करने पर आत्महत्या के अधिकांश मामलों में यही कारण होते हैं। समाजशास्त्री एमिल दुरखाइम ने अपनी पुस्तक ‘आत्महत्या’ में लिखा कि जो लोग अपने समाज से कम जुड़े या कटे होते हैं, अक्सर ऐसे ही लोग आत्महत्या अधिक करते हैं। कुछ आधुनिक समाज वैज्ञानिकों का तर्क है कि समाज में भागीदारी करने वाले, सक्रिय लोग केवल सुखी और दूसरों की अपेक्षा अधिक स्वस्थ तथा दीघार्यु होते हैं।

जीवन में अवसाद का एक बड़ा कारण शिक्षा प्रणाली का दोषपूर्ण होना भी है। वरना शिक्षा तो असमानता, शोषण, अन्याय से लड़ना सिखाती है, प्राथमिक शिक्षा से उच्च शिक्षा तक सभी पाठ्यक्रम जीवन में सकारात्मक सोच, संघर्ष करने और कभी न हारने की प्रेरणा देते हैं। विश्व का इतिहास ऐसे अनेक व्यक्तित्वों और उदाहरणों से भरा पड़ा है, जिन्होंने अपने जीवन में बहुत कुछ सहा, पर हार नहीं मानी, बल्कि विश्व विजेता बन कर उभरे। तो फिर आज हम यह अपनी किशोर और युवा पीढ़ी को क्यों नहीं सिखा पा रहे हैं?

एसोचैम के 2015 के सर्वे के अनुसार कॉरपोरेट में काम करने वाले 42.5 फीसदी कर्मचारी अवसाद और एंग्जाइटी से जूझ रहे हैं, 38.5 फीसदी कर्मचारी प्रतिदिन छह घंटे से भी कम नींद लेते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार लोग मानसिक बीमारियों को कलंक मानते हैं और इसीलिए अवसाद जैसे विषयों पर बात करना या उसे किसी से साझा करना उचित नहीं समझते या शर्म महसूस करते हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार प्रति वर्ष विश्व अर्थव्यवस्था को इस वजह से पचहत्तर लाख करोड़ रुपए का नुकसान होता है। फिर भी सरकारें मानसिक स्वास्थ्य पर स्वास्थ्य बजट का दो फीसद से भी कम खर्च करती हैं। स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं की अनदेखी करना मानव जीवन के साथ खिलवाड़ है।

स्वास्थ्य और शिक्षा शुरू से उपेक्षित रहे हैं, जबकि होना तो यह चाहिए कि अगर सभी को शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया करा दी जाएं, तो देश की अनेक बड़ी समस्याओं जैसे- निर्धनता, बेरोजगारी, अपराध, जातिवाद को एक सीमा तक कम किया जा सकता है। देश में विकास की गति को भी तेज किया जा सकता है। मानव विकास सूचकांक में जीवन प्रत्याशा (लंबा और स्वस्थ जीवन), प्रति व्यक्ति आय (जीवन स्तर) और शिक्षा (ज्ञान) के आधार पर किसी भी देश की रैंकिंग की जाती है। भारत वर्ष 2019 में 189 देशों में एक सौ उनतीसवें स्थान पर था। क्योंकि शिक्षा और स्वास्थ्य की दृष्टि से हम काफी पिछड़े हुए है। इसलिए राज्यों को इस पर गंभीरता से सोचना होगा। किशोर और युवा पीढ़ी को भी यह समझना होगा कि सामूहिकता से कटना, खुद से भी कटना है। भावनात्मक बंधन और निकटता मानसिक स्वास्थ्य के लिए उतने ही जरूरी हैं, जितना जीवित रहने के लिए भोजन और पानी। आज टेक्नोलॉजी के कारण जो संवादहीनता की स्थिति उत्पन्न हुई है उस खाई को भी पाटना होगा। जीवन में सफलता या विफलता से ज्यादा जरूरी है सकारात्मक सोच और संघर्ष करने का जज्बा। जीवन की परीक्षा में सफल हों या न हों, पर एक सफल जीवन जीना बहुत जरूरी है और जीवन की सफलता राष्ट्रपति केनेडी के इस कथन से झलकती है कि ‘जीवन ने हमारे लिए क्या किया’ की जगह यह सोचना अधिक सही और तर्कसंगत है कि ‘हमने जीवन को क्या दिया’? तो शायद अवसाद को हरा सकें और जीवन को जिता सकें।

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