UP विधानसभा सचिवालय पर बड़ा खुलासा-NO EXTENSION NO ORDER,बादशाह बना बैठा है प्रमुख सचिव प्रदीप दुबे

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उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की करेप्शन को लेकर हमेशा से जीरो टालरेंस की नीति रही है. नियम के खिलाफ कुछ भी हो यह योगी जी को बर्दाश्त नही है लेकिन कुछ अधिकारी काकस बनाकर योगी जी की इस कार्यशैली को पलीता लगाने का कार्य कर रहे है. ताजा मामला उत्तर प्रदेश की विधान सभा का है. विधान सभा का प्रशासनिक दायित्व एक ऐसा अधिकारी निभा रहा है जिसे रिटायर हुये एक साल से ज्यादा का समय हो गया है. कार्मिक विभाग ने इस अधिकारी को दोबारा सेवा विस्तार नही दिया फिर भी वह विधान सभा के प्रमुख सचिव की कुर्सी पर जमा हुआ है। यह अधिकारी है श्रीमान प्रदीप कुमार दुबे। सरकार बसपा की हो या सपा की या फिर भाजपा लेकिन विधान सभा में प्रदीप दुबे का ही सिक्का चलता है। तभी तो रिटायर्मेंट के बाद भी वह विधान सभा के प्रमुख सचिव के पद पर बने हुये है। विधान सभा के सभी कार्य संचालित कर रहे है। इस रिटायर्ड गिरोह के कारनामों से सालों से अखबारों के पन्ने रंगे जा रहे हैं। मीडिया में छाये रहने वाले ये ऐसे बुजुर्ग हीरो है, जिनपर आजतक किसी भी तरह की कार्यवाई नहीं की गई।
अपने 11 साल के कार्यकाल में विधान सभा सचिवालय को मनमाने तरीके से चलाने के लिए प्रदीप दुबे कुख्यात रहे है. समय समय पर कई राजनितिक दलों ने दुबे का विरोध किया लेकिन अपने प्रभाव के चलते हर बार वह बाख निकलते है. भाजपा और सपा ने 2009 में प्रदीप दुबे की नियुक्ति का विरोध किया था. सपा ने तो दुबे की नियुक्ति को ही नियम के विपरीत बताया था लेकिन जब सपा की सरकार बनी तो दुबे उस सरकार की आँख के तारे हो गए थे. यही हाल भाजपा का भी है. भाजपा ने भी दुबे को हटाकर स्थायी प्रमुख सचिव विधान सभा नियुक्त नही किया बल्कि 2019 अप्रैल में जब वह रिटायर हो गये उसके बाद बिना किसी आदेश के पद पर बनाये रखा है. जबकि श्री दुबे पर विधान सभा में अनियमित तरीके से नियुक्तिया करने के साथ ही गलत तरीके से कर्मचारियों को प्रमोशन करने के आरोप है. संविदा पर रखे गये कर्मचारियों को मनमाने तरीके से नियमित भी करने के आरोप दुबे पर लगे है. यही नही विधान सभा सचिवालय परिसर में फर्जी तरीके से बेरोजगारों से नियुक्ति के नाम पर उनसे पैसे वसूले गये. यह सब कुछ दुबे के चहेते अधिकारी विधान सभा के ओ एस डी आर सी मिश्र के कमरे में किया गया. मामला बढ़ने पर इस मामले में हजरतगंज में प्राथमिकी भी दर्ज करायी गई. आर सी मिश्र उसमे मुख्य मुलजिम थे. उस समय प्रदीप दुबे ने श्री मिश्र को टर्मिनेट करने की जानकारी मीडिया को दी,लेकिन दिलचस्प यह है कि आज भी आर सी मिश्र विधान सभा सचिवालय में ही कार्य कर रहे है। एक तरह से विधान सभा सचिवालय रिटायर अफसरों का गिरोह चला रहा है. इस गिरोह का सरगना है प्रदीप कुमार दुबे द्य इस गिरोह के साथ मिलकर श्री दुबे ने विधान सभा के भीतर कराये जाने वाले सुन्दरीकरण के कार्य में भी लम्बा घोटाला किया है लेकिन दुबे के प्रभाव की वजह से इसकी जाँच भी नही हो पा रही है. फर्स्ट आई न्यूज की पड़ताल में कई चौकाने वाले तथ्य प्रकाश में आये है. इस अंक में हम कुछ मुद्दों की जानकारी पाठको के सामने रख रहे है. सबसे पहले प्रदीप कुमार दुबे की नियुक्ति के बारे में बताते है.

आपको बता दे कि  प्रदीप दुबे उच्चतर न्यायिक सेवा के अधिकारी है. इनकी पत्नी श्रीमती रेखा  भी हाईकोर्ट की जज रही है. प्रमुख सचिव विधान व् संसदीय कार्य के पद पर तैनात होने से पहले श्री दुबे राज्यपाल के सलाहकार हुआ करते थे. इसी बीच प्रमुख सचिव विधान सभा व् संसदीय कार्य का पद खाली हुआ. उस समय प्रदेश में बसपा सुप्रीमो कुमारी मायावती मुख्यमंत्री थी. मुख्यमंत्री सचिवालय में सेटिंग के बाद 13 जनवरी 2009 प्रदीप कुमार दुबे ने उच्चतर न्यायिक सेवा के अधिकारी पद से सेवानिवृत्ति ले ली. उस समय श्री दुबे की उम्र 52 वर्ष थी. सेवानिवृत्ति के ठीक छ दिन बाद यानी 19 जनवरी 2009 को नियुक्ति विभाग ने आदेश जारी कर श्री दुबे को प्रमुख सचिव संसदीय कार्य के पद पर नियुक्ति कर दी. इसी पत्र में श्री दुबे को इस पद के साथ ही प्रमुख सचिव विधान सभा का अतिरिक्त दायित्व भी दिया गया. अपनी अस्थायी नियुक्ति को आगे चलकर उन्होंने स्थायी करवा लिया. दुबे की प्रमुख सचिव विधान सभा की नियुक्ति के बाद सपा और भाजपा ने खूब विरोध किया. लगभग दो साल बाद 27 जून 2011 को विधान सभा के विशेष सचिव नरेंद्र कुमार सिन्हा के आदेश से प्रदीप कुमार दुबे संसदीय कार्य विभाग से हटकर विधान सभा के स्थायी प्रमुख सचिव हो गए. आदेश में यह स्पष्ट किया गया कि इस सेवा में न्यायिक सेवा के कार्यकाल को भी जोड़ा जायेगा. जब श्री दुबे को विधान सभा के प्रमुख सचिव पर पूर्णरूप से तैनात किया गया उस समय उनकी आयु 54 वर्ष हो चुकी थी जबकि नियम के अनुसार 52 साल की आयु तक ही कोई भी व्यक्ति विधान सभा के प्रमुख सचिव पद पर तैनात हो सकता है. इसकी जानकारी खुद ही विधान सभा सचिवालय ने खुद ही छह माह बाद इस पद के लिए विज्ञापन निकालकर दी।

प्रदीप कुमार दुबे के प्रमुख सचिव विधान सभा सचिवालय के पद पर तबादले के ठीक छह माह बाद विधान सभा सचिवालय ने लखनऊ के कई प्रमुख अखबारों में प्रमुख सचिव विधान सभा पद को भरने के लिए विज्ञप्ति निकली गई. जिसमे इस पद के लिए आयु सीमा 35 से 52 वर्ष तय की गई. विधान सभा के सूत्रों का कहना है कि अखबार में विज्ञापन तो निकल गया लेकिन श्री दुबे ने सीधी भर्ती न होने पाये इसके लिए पूरा जोर लगा दिया. श्री दुबे ने कई अखबारों में इस बारे में खबर भी छपवायी कि प्रमुख सचिव विधान सभा का पद मुख्य सचिव के बाद सबसे बड़ा संवैधानिक पद होता है इस वजह से इस पर सीधी भर्ती न की जाय. यह सबकुछ उन्होंने इस वजह से किया क्योंकि श्री दुबे खुद इस आवेदन को भर नही सकते थे. नियत उम्र से वह दो साल ज्यादा थे. बहुत सारे लोगो ने इस पद के लिए आवेदन किया लेकिन कुछ हो नही पाया और प्रदीप कुमार दुबे एक बार स्वैक्षिक सेवानिवृत्ति और दो दो बार सरकार द्वारा रिटायर किये जाने के बाद भी अपने पद पर आज भी बने हुए है।

अप्रैल 2017 में प्रदीप कुमार दुबे अपनी सेवा 60 साल की उम्र में पूरी करके रिटायर हो गए लेकिन इसके बाद भी पद का मोह वह नही छोड़ पाए. अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके सरकार से उन्होंने दो साल का सेवा विस्तार हासिल कर लिया. यह सेवा विस्तार की अवधि अप्रैल 2019 में पूरी हो गई लेकिन विधान सभा अध्यक्ष हृदय नारायण दीक्षित की कृपा से अभी भी वह इस पद पर बने हुये है. सरकार की तरफ से उन्हें सेवा विस्तार भी अभी तक नही दिया दिया गया है फिर भी वह नियमित रूप से रिटायर्ड अफसरों के काकस के साथ विधान सभा के प्रशासन को मनमाने तरीके से चला रहे है

प्रदीप दुबे पर आत्महत्या के लिए मजबूर करने का भी है आरोप

इन रिटायर्ड अफसरों के गिरोह के कई और ऐसे कारनामे सामने आये है जिनसे मानवता भी शर्मशार हो जाए द्य ठगी और भ्रष्टाचार के अलावा बेईमानी का ऐसा चेहरा बेनकाब हुआ जिसने पूरे विधानसभा सचिवालय के होश उड़ा दिए द्य विधानसभा सचिवालय प्रमुख सचिव पद पर विराजमान प्रदीप दुबे पर एक अनुसेवक के नाम पर फर्जी तरीके से 22 लाख 24 हजार रूपये का विधानसभा सोसायटी से लोंन लेने का आरोप भी है।

बर्खास्त अनुसेवक प्रेम चन्द्र पाल का सुसाइड नोट

आरोप बस इतना ही नही है बल्कि उस अनुसेवक को फर्जी मामलों में फंसा कर बर्खास्त भी कर दिया जिससे क्षुब्ध अनुसेवक प्रेम चंद पाल को आत्महत्या करनी पड़ी। 14 अक्टूबर 2019 को प्रेम चंद पाल ने अपने सुसाइड नोट में साफ लिखा कि उसकी मौत के लिए प्रदीप कुमार दुबे प्रमुख सचिव विधान सभा, सी.पी.तिवारी समीक्षा अधिकारी, सुरेश द्विवेदी, प्रमोद द्विवेदी, ज्ञानदत्त दीक्षित, दीपक कुमार मिश्र और प्रमुख सचिव प्रदीप दुबे की पत्नी रेखा दीक्षित को भी जिम्मेदार ठहराया है। विधान सभा सचिवालय की छत्रछाया में पल रहे इस बेईमान, भ्रष्टाचारी और हत्यारे गिरोह को किसी का भी भय नही है, जिसके चलते प्रेमचन्द्र पाल जैसे लोग इनके जाल में फंस कर असमय ही मौत को गले लगाने के लिए मजबूर हो जाते है। जानकारी के मुताबिक और भी कई कर्मचारी ऐसे हैं जो इनके सामने कठपुतली बनने को मजबूर हैं और ये गिरोह उनका पूरा इस्तेंमाल अपने गैरकानूनी कामों को अंजाम देने के लिए कर रहा है। जिस किसी ने भी इस गिरोह के गलत कामों का विरोध करने की कोशिश की उसे निलंबन और बर्खास्तगी का भय दिखा कर चुप रहने के लिए विवश कर दिया जाता है।

दुबे के कार्यकाल में विधान सभा सचिवालय में नौकरी के नाम पर ठगी की गई..
प्रदीप कुमार दुबे ने अपनी नियुक्ति गलत तरीके से तो करायी ही साथ ही अपने चेलो के जरिये विधान सभा के सचिवालय में नौकरी देने की दुकान सजाकर बेरोजगारों से करोड़ो की ठगी करवायी. इनके इस गैंग में विधान सभा सचिवालय के ओएसडी आर सी मिश्र जो अभी भी इनके साथ काम कर रहे है}, सुधीर यादव व् निजी सचिव जय किशोर समेत कई लोग शामिल है. इन सभी ने मिलकर बेरोजगारों से पैसे लेकर 2012-13 में आर सी मिश्र के कमरे में समीक्षा अधिकारी के लिए साक्षात्कार आयोजित किया जिसमे दो दर्जन से ज्यादा लोग शामिल हुये. बताते है कि बेरोजगारों से 10-10 लाख रूपये वसूले गए लेकिन बेकारो को नौकरी नही मिली. इसके बाद उनमे से एक पीड़ित उमेश सिंह ने हजरतगंज कोतवाली में एफआईआर दर्ज करवायी. अखबारों में यह मामला जब खूब उछला, उसके प्रदीप दुबे ने मीडिया को एक पत्र जारी कर बताया कि आर सी मिश्र की टर्मिनेट कर दिया गया है, लेकिन किसके आदेश से आज भी वह विधान सभा के रूम नंबर 204 में वह बैठ रहे है यह कोई भी बताने को तैयार नही है. दरअसल विधान सभा सचिवालय को प्रदीप कुमार दुबे एक प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी की तरह चला रहे है. इस कार्य में छह रिटायर अधिकारी शामिल है. प्रदीप दुबे ने सचिवालय में ठेके के साथ ही अन्य कई सुन्दरीकरण के कार्यो में बड़े पैमाने पर करेप्सन किया है जिसके बारे में अगले अंक में विस्तार से रिपोर्ट दी जायेगी।