Despite the presence of United Nations struggle between communism and democracy in North and South Korea continues unabated – राजनीतिः कोरियाई अशांति से बढ़ते खतरे

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ब्रह्मदीप अलूने

तानाशाही एक ऐसा भयानक विचार है, जिसमें वैश्विक शांति, सुलह की उम्मीदें, समन्वय की संभावना और वैदेशिक संबंधों के शिष्टाचार को नकारने की आशंका बनी रहती है। इसीलिए अंतरराष्ट्रीय राजनीति में इसे ‘मरो या मारो’ की दो टूक पद्धति भी माना जाता है। दरअसल, पूर्वी एशिया में कोरिया प्रायद्वीप के देश उत्तर कोरिया की कथित समाजवादी शासन पद्धति साम्यवाद के अंतर्द्वंद में उलझ कर तानाशाही को आत्मसात कर चुकी है और यह संकट विश्व के लिए चुनौतीपूर्ण बन गया है।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद महाशक्तियों के बीच कोरियाई प्रायद्वीप का राजनीतिक बंटवारा बाद में वैचारिक प्रतिद्वंद्विता का कारण बन गया और इसके दूरगामी परिणाम बेहद खतरनाक होकर विश्व शांति के लिए लगातार संकट बढ़ाते रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र जैसे वैश्विक निकाय की उपस्थिति के बावजूद उत्तरी और दक्षिणी कोरिया में साम्यवाद और लोकतंत्र के बीच संघर्ष बदस्तूर जारी है। अमेरिका और सोवियत संघ के पूंजीवाद और साम्यवाद के असर से युद्ध के मैदान में खून बहाने वाले दक्षिण कोरिया और उत्तर कोरिया के बीच 1953 में युद्ध रुक तो गया था, लेकिन महाशक्तियों के हितों के कारण दोनों देशों के बीच कोई शांति समझौता नहीं हो सका और इसी कारण पिछले सात दशक से दोनों देशों के नागरिक युद्ध जैसे माहौल में रहने को मजबूर हैं और इस क्षेत्र में युद्ध भड़कने की आशंका लगातार बनी रहती है।

इस समय दोनों देशों के बीच तनाव एक बार फिर चरम पर है। उत्तर कोरिया ने दक्षिण कोरिया की सीमा से लगे संपर्क कार्यालय को विस्फोट करके उड़ा दिया। तानाशाह किम का मानना है कि सीमा के उस पार से उत्तर कोरिया विरोधी पर्चे और गुब्बारे उड़ाएं जाते हैं और ऐसा करके दक्षिण कोरिया उत्तर कोरिया के लोगों को उकसाने में लगा है। वहीं, दक्षिण कोरिया सीमा पर शांति बनाए रखने का पक्षधर नजर आता है। दक्षिण कोरिया से संबंध विच्छेद को लेकर उत्तर कोरिया का रुख उसकी विश्वसनीयता के लिए भी खतरनाक है। उत्तर कोरिया आवश्यकता अनुसार शांति के करार भी करता है और फिर उन्हें तोड़ भी देता है। उसने इसे अपनी कूटनीति का हिस्सा बना लिया है। 1990 के दशक में जब उत्तर कोरिया में भारी अकाल पड़ा था, तब उसने उससे उबरने के लिए उसने विश्व के साथ सहयोग का दिखावा किया था और इसके अंतर्गत 1994 में परमाणु हथियारों के परीक्षण रोकने के लिए अमेरिका के साथ समझौता किया था, साथ ही 1999 में मिसाइल परीक्षण प्रतिबंध पर उसने सहमति भी जताई थी। लेकिन परिस्थितियां मुफीद होते ही 2006 में उसने एक बार फिर रुख बदला और फिर न केवल मिसाइल परीक्षण करता रहा बल्कि हाइड्रोजन बम तक का परीक्षम कर डाला।

साल 2017 में दक्षिण कोरिया के नए राष्ट्रपति मून जे-इन ने अपने पहले भाषण में अर्थव्यवस्था और उत्तर कोरिया से संबंधों पर बात की थी और प्योंगयांग जाने की इच्छा भी जताई थी। कोरियाई प्रायद्वीप में शांति स्थापना के लिए इसे एक सकारात्मक पहल माना गया था, इसके बाद दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति मून-जे-इन और उत्तर कोरियाई नेता किम-जोंग ने साल 2018 में एक सैन्य समझौता भी किया, जिसे व्यापक रूप से दोनों देशों के बीच तनाव कम करने के उद्देश्य के लिए उठाया गया कदम माना गया। इस समझौते में उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया के बीच एक संपर्क कार्यालय भी बनाया गया था, जिसे उत्तर कोरिया ने हाल में नष्ट कर दिया है। उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया के बीच एक असैन्य क्षेत्र भी है, जिसे 1950-53 के कोरियाई युद्ध के बाद से कोरियाई प्रायद्वीप की विभाजक रेखा माना जाता है। पिछले साल इसी स्थान पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग की मुलाकात हुई थी। कोरियाई प्रायद्वीप को परमाणु मुक्त बनाने के उद्देश्य से इस मुलाकात को भी ऐतिहासिक माना गया था।

लेकिन पिछले कुछ सालों में उत्तर कोरिया को शांत रखने की दक्षिण कोरिया और अमेरिका की कोशिशें अब धराशाई हो चुकी हैं और कोरिया प्रायद्वीप एक बार फिर युद्ध के मुहाने पर खड़ा है। इसकी आशंका गहराने का कारण उत्तर कोरिया का बेहद खतरनाक तानाशाह किम जोंग रहा है और उसे मिलने वाले चीन और रूस के प्रश्रय की भी इसमें बड़ी भूमिका रही है।

किम जोंग की कार्यप्रणाली बेहद खतरनाक और विध्वंसक है। किम की क्रूरता और नृशंसता से इस देश के लोग इतने भयभीत और आतंकित हैं कि वे अपने तानाशाह का नाम तक जुबान पर नहीं आने देना चाहते। तकरीबन दो लाख विरोधी जेलों में बंद हैं, इसमें से अनेक यातनाएं झेलते-झेलते पागल हो चुके हैं या मर चुके है। ढाई करोड़ की आबादी में हर तीसरा बच्चा भूखा रहने को मजबूर है, लेकिन विडंबना यह है कि किम हथियारों और बमों के बूते दुनिया को धमका रहा है। दक्षिण कोरिया के एक राजनयिक ने साल 2017 में दावा किया था कि उत्तर कोरियाई नागरिक पहले से ही आर्थिक बदहाली में जी रहे हैं। सड़कों से कारें कम हो गई हैं, कम ईंधन से काम चलाया जा रहा है और जरूरत के सामान में लगातार कमी आती जा रही है।

दक्षिण कोरिया लोकतांत्रिक देश होने और उच्च विकास दर के साथ दुनिया के संपन्न देशों में शामिल है। अमेरिका से मजबूत सामरिक और आर्थिक संबंधों के चलते दक्षिण कोरिया मजबूत स्थिति में है और यह स्थिति चीन, रूस और उत्तर कोरिया को स्वीकार्य नहीं है। चीन और रूस जैसे साम्यवादी देश एशिया में अमेरिका को चुनौती देने के लिए उत्तर कोरिया के तानाशाह का इस्तेमाल करते हैं और अब यह स्थिति घातक हो गई है। उत्तर कोरिया में यहां के सर्वसत्तावादी शासनतंत्र में कानून और न्याय व्यवस्था को भी माओ सिद्धांतों पर ढाला गया है, जिसमें विरोधियों को कुचलने के लिए किसी भी हद तक जाया जा सकता है। संयुक्त राष्ट्र के तमाम प्रतिबंधों के बावजूद इसके नब्बे फीसद बाजार पर चीनी कब्जा है।

कोरिया को लेकर दशकों से महाशक्तियां लगातार आमने सामने रही हैं। 25 जून 1950 को उत्तर कोरिया की साम्यवादी सरकार ने जब दक्षिण कोरिया पर हमला किया था, तब उसे बचाने के लिए संयुक्त राष्ट्र सेना की कमान एक अमेरिकी जनरल मैक आॅर्थर के हाथों में थी। लेकिन तब भी उस युद्ध का निर्णायक समाधान इसलिए नहीं हो सका था, क्योंकि चीन का युद्ध में उतर आने का अंदेशा था और आज भी हालात जस के तस हैं। दक्षिण कोरिया की 1953 से अमेरिका के साथ रक्षा संधि है और दक्षिण कोरिया में अट्ठाईस हजार से ज्यादा अमेरिकी सैनिक और युद्धपोत नियमित रूप से वहां तैनात रहते हैं। मिसाइलों से लैस अमेरिकी विमानवाहक युद्धपोत कार्ल विंसन भी वहां खतरे से निपटने के लिए तैयार है। वहीं चीन और उत्तर कोरिया के बीच 1961 से पारस्परिक सहायता और सहयोग की रक्षा संधि है। इससे साफ है कि अगर दक्षिण कोरिया और उत्तर कोरिया के बीच युद्ध की परिस्थिति में अमेरिका और चीन आमने सामने हो सकते हैं।

इस साल अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव होने वाले हैं और ट्रंप उत्तर कोरिया को सबक सिखाने की हिमाकत कर सकते है। उत्तर कोरिया में किम के स्वास्थ्य को लेकर रहस्य बरकरार हैं और उनका वंश सत्ता पर कब्जा जमाए रखने के लिए युद्ध के विध्वंसक हथियार का इस्तेमाल कर सकता है, जिससे उनके देश के लोगों की भावनात्मक संवेदनशीलता का फायदा मिल सके। वहीं चीन में शी जिनपिंग की स्थिति भी कमजोर होती दिख रही है। जाहिर है, सत्ता पर अपना दावा मजबूत करने के लिए तीनों देशों के प्रमुख युद्ध का सहारा ले सकते हैं और इसकी आशंका गहरा गई है।

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