Large foreign e-commerce companies sending their products large scale to country stealing tax – राजनीति: नए बाजार की चुनौतियां

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जयंतीलाल भंडारी
कोविड-19 के बीच दुनियाभर में आनलाइन खरीदारी उपभोक्ताओं की आदत और व्यवहार का अभिन्न अंग बन गई है। भारत के संदर्भ में यह ज्यादा महत्त्वपूर्ण इसलिए भी है कि अभी तक हमारे यहां आॅनलाइन खरीद का चलन ज्यादा नहीं बढ़ा था। लेकिन पूर्णबंदी की वजह से लोगों ने मजबूरी में इसे अपनाया और अब यह सिलसिला तेज हो चला है। वस्तुत: आॅनलाइन ख?ीदारी ई-कॉमर्स का आधार है। इलेक्ट्रॉनिक्स संचार माध्यमों के जरिए, विशेषकर इलेक्ट्रॉनिक डाटा इंटरचेंज जैसी कागज रहित सूचना प्रौद्योगिकी के माध्यम से व्यवसाय को संचालित करने को ही ई-कॉमर्स कहा जाता है।

ई-कॉमर्स से समय या दूरी की बाधाओं के बगैर कारोबार करने का अवसर मिलता है। इससे कारोबार की लागत भी कम बैठती है। इससे अप्रत्यक्ष लागतों में भी कमी होती है। कारोबार चलाने का यह सबसे सस्ता और प्रभावी तरीका है। देश में आॅनलाइन खरीदारी के कारण उपभोक्ताओं के घरों और संस्थानों तक सामान की सीधी पहुंच के कारण जहां समय, धन और श्रम की बचत हो रही हैं, वहीं सरकार द्वारा विदेशी ई कंपनियों पर लगाया गया डिजिटल कर भारत की आमदनी का नया और सतत बढ़ने वाला स्रोत साबित हो रहा है।

तेजी से बढ़ते ई-करोबार ने खुदरा कारोबार में एक तरह से क्रांति ला दी है। सस्ती दरों पर डेटा उपलब्ध होने और लोगों की क्रय शक्ति के अनुसार मोबाइल फोन व अन्य डिजिटल चीजों की कीमतें कम होने से लोगों में इंटरनेट के इस्तेमाल की प्रवृत्ति बढ़ी है। इससे इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों की संख्या में भारी इजाफा हुआ है। ग्लोबल डेटा एजेंसी स्टेटिस्टा के हाल के एक सर्वे में यह सामने आया है कि छियालीस फीसद लोगों का मानना है कि वे अब भीड़भाड़ में नहीं जाएंगे।

ऐसे में भारत में भी उपभोक्ताओं की आदत और व्यवहार में भारी बदलाव के मद्देनजर आॅनलाइन बाजार तेजी से बढ़ने की संभावनाएं बढ़ गई हैं। डेलॉय इंडिया और रिटेल एसोसिएशन आॅफ इंडिया की रिपोर्ट बताती है कि अगले साल तक भारत का ई-कॉमर्स बाजार चौरासी अरब डॉलर का हो जाएगा, जो 2017 में महज चौबीस अरब डॉलर था। लेकिन अब कोविड-19 के बाद जिस तरह ई-कॉमर्स का चलन बढ़ा है, उससे यह अनुमान लगाया जा रहा है कि वर्ष 2027-28 तक यह कारोबार करीब दो सौ अरब डॉलर तक पहुंच सकता है।

बर्नस्टीन रिसर्च की रिपोर्ट बताती है कि कोरोनाकाल में लोगों ने तेजी से डिजिटल का रुख किया है और यह बदलाव जल्द ही स्थायी रूप ले लेगा। बर्नस्टीन के मुताबिक जियो-फेसबुक के प्लेटफॉर्म द्वारा भारत में बनाए जा रहे कॉमर्स, पेमेंट और कंटेंट से जुड़ी दस महत्वपूर्ण सेवाओं की प्रणाली विकसित की जा रही है। इससे वर्ष 2025 तक करीब एक सौ इक्यावन लाख करोड़ रुपए का बाजार खड़ा हो सकता है।

ई-कॉमर्स के फैलते बाजार को देखते हुए दुनियाभर की बड़ी-बड़ी आॅनलाइन कंपनियों के साथ-साथ भारत के व्यापारिक संगठन भी स्थानीय दुकानदारों व कारोबारियों को आॅनलाइन से जोड?े की रणनीति बना रहे हैं। जहां जियो-फेसबुक का प्लेटफॉर्म भारत में ई-कॉमर्स की नई तस्वीर बता रहा है, वहीं एमेजॉन, फ्लिपकार्ट-वालमार्ट और स्नैपडील जैसी अधिकांश ई-कॉमर्स कंपनियों ने भारत में किराना और आॅफलाइन स्टोर को अपने साथ जोड?े की पहल शुरू की है। इतना ही नहीं, आॅफलाइन रिटेल एसोसिएशन कन्फेडरेशन आॅफ आॅल इंडिया ट्रेडर्स (सीएआइटी) ने भी उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (डीपीआइआइटी) के साथ मिल कर देश के कारोबारियों के लिए राष्ट्रीय ई-कॉमर्स बाजार तैयार करने का रणनीति तैयार करने का संकेत दिया है।

चूंकि भारत में ई-कॉमर्स के क्षेत्र में विदेशी ई-कॉमर्स कंपनियों की बड़ी भागीदारी है, इसलिए भारत में विदेशी ई-कॉमर्स कंपनियों पर लगाया गया डिजिटल टैक्स भारत के लिए नया वित्तीय स्रोत्त बन गया है। भारत में दो करोड़ रुपए से अधिक का सालाना कारोबार करने वाली विदेशी डिजिटल कंपनियों द्वारा किए जाने वाले व्यापार एवं सेवाओं पर दो फीसद डिजिटल कर लगाया है। वस्तुत: डिजिटल कर विदेशी ई-कॉमर्स कंपनियों द्वारा भारत में अर्जित की जा रही आय पर लगाया गया है।

इस कर के दायरे में भारत में काम करने वाली दुनिया के सभी देशों की ई-कॉमर्स करने वाली कंपनियां शामिल हैं। पिछले दिनों देश के आयकर विभाग ने चौबीस से अधिक गैर भारतीय ई-कॉमर्स कंपनियों को डिजिटल टैक्स की पहली किश्त के भुगतान के लिए कानूनी दायरों का सूचना पत्र जारी कर किया है। इस पर अमेरिका की डिजिटल कंपनियों एमेजॉन, फेसबुक और गूगल आदि ने आपत्ति करते हुए अमेरिका के व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय से इसकी शिकायत की। इसमें कहा गया है कि उन्हें बड़ी राशि डिजिटल टैक्स के रूप में देना होगी, जो उपयुक्त नहीं है।

यह बात महत्त्वपूर्ण है कि देश में खुदरा कारोबार में जैसे-जैसे विदेशी निवेश बढ़ा, वैसे-वैसे ई-कॉमर्स की रफ्तार बढ़ती गई। अब कोविड-19 के परिदृश्य में देश में ई-कॉमर्स नीति में बदलाव की जरूरत महसूस की जा रही है। केंद्र सरकार पिछले एक वर्ष से वर्तमान ई-कॉमर्स नीति को बदलने के लिए काम कर रही है। नई ई-कॉमर्स नीति का मसौदा विभिन्न पक्षों को विचार-मंथन के लिए जारी किया जा चुका है। इस मसौदे में सबसे ज्यादा जोर ई-कॉमर्स की वैश्विक और भारतीय कंपनियों के लिए समान अवसर मुहैया कराने पर दिया गया है। सरकार का प्रयास है कि वैश्विक कंपनियों के मुकाबले भारतीय कंपनियां कहीं पीछे नहीं रहें और यह तभी संभव है जब भारतीय कंपनियों को भी वैश्विक कंपनियों के समान अवसर मिलें। मसौदे में कहा गया है कि यह सरकार का दायित्व है कि ई-कॉमर्स से देश की विकास आकांक्षाएं पूरी हों और बाजार भी विफलता और विसंगति से बचा रहे।

मसौदे में ई-कॉमर्स कंपनियों द्वारा ग्राहकों के डेटा की सुरक्षा और उसके व्यावसायिक इस्तेमाल को लेकर तमाम पाबंदी लगाए जाने का प्रस्ताव है। मसौदे में आॅनलाइन खरीदारी से जुड़ी कंपनियों के बाजार, बुनियादी ढांचा, नियामकीय और डिजिटल अर्थव्यवस्था जैसे बड़े मुद्दे शामिल हैं। इस मसौदे में यह मुद्दा भी है कि आॅनलाइन खरीद कंपनियों के माध्यम से निर्यात कैसे बढ़ाया जा सकता है। नई ई-कॉमर्स नीति के इस मसौदे पर देश के उद्योग संगठनों ने यह साफ कर दिया है कि छोटे खुदरा कारोबारियों के हितों से कोई समजौता नहीं किया जाएगा। चूंकि ई-कॉमर्स में विदेशी निवेश के मानक बदले गए हैं, जिससे ई-कॉमर्स कंपनियों में ढांचागत बदलाव की आवश्यकता है।

आॅनलाइन बाजार में उपभोक्ताओं के हितों और उत्पादों की गुणवत्ता संबंधी शिकायतों के संतोषजनक समाधान के लिए नियामक भी सुनिश्चित किया जाना होगा। उन बहुराष्ट्रीय ई-कॉमर्स कंपनियों पर निगरानी के लिए उपयुक्त तंत्र बनाना होगा, जिन्होंने भारत को अपने उत्पादों को खपाने का केंद्र बना दिया है। कई बड़ी विदेशी ई-कॉमर्स कंपनियां कर चोरी करते हुए देश में अपने उत्पाद बड़े पैमाने पर भेज रही हैं। ये कंपनियां इन उत्पादों पर गिफ्ट या सैंपल का लेबल लगा कर भारत में भेज देती हैं। नई ई-कॉमर्स नीति में अनुमति मूल्य, भारी छूट और घाटे के वित्त पोषण पर लगाम लगाने की व्यवस्था करना होगी, जिससे सबको काम करने का समान अवसर मिल सके।

आॅनलाइन बाजार बढ़ने की प्रबल संभावनाओं के बीच ई-कॉमर्स कंपनियों और देश के उद्योग-कारोबार से संबंधित विभिन्न पक्षों के हितों के बीच उपयुक्त तालमेल के साथ अर्थव्यवस्था को लाभांवित करने वाली नई ई-कॉमर्स नीति को जल्द ही अंतिम रूप देने की जरूरत है। इसमें कोई दो मत नहीं है कि कोविड-19 के बाद नई वैश्विक आर्थिक व्यवस्था के तहत भविष्य में डेटा की अहमियत कच्चे तेल से भी अधिक होगी, अतएव नई ई-कॉमर्स नीति के नए मसौदे में डेटा के स्थानीय स्तर एवं भंडारण के विभिन्न पहलुओं पर जोर दिया जाना होगा और डेटा को एक अहम आर्थिक संसाधन के रूप में मान्यता देनी होगी।

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