Tensions between India and China are at peak and Indian ruling class has been wavering for years – राजनीति: पैर पसारते चीन से खतरे

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भारत-चीन के बीच तनाव चरम पर है। पैंतालीस साल बाद सीमा पर चीनी सैनिकों ने इतने बड़े पैमाने पर हिंसक गतिविधियों को अंजाम दिया जिसमें भारत के बीस सैनिक शहीद हो गए। इस तरह के विवादों की जड़ जहां चीन की विस्तारवादी नीतियों में है, वहीं दूसरी ओर इस हालात के लिए जिम्मेवार भारतीय शासक वर्ग की ढुलमुल कूटनीति भी रही है। चीनी विस्तारवाद का सामना जिस दृढ़ता से किया जाना चाहिए था, उसमें भारत विफल रहा। पिछले सात दशक के दस्तावेज और सबूत यही बताते हैं।

यह एक कटु सत्य है कि पाकिस्तान के प्रति आक्रमक भारतीय कूटनीति चीन के सामने रक्षात्मक हो जाती है। वैसे कूटनीति का आक्रमक या दृढ़ होने का मतलब यह नहीं है कि हम किसी दूसरे की सीमा में अतिक्रमण करेंगे। आक्रामकता और दृढ़ता का तात्पर्य और उद्देश्य अपनी सीमा को बचाए रखना भी है। लेकिन भारतीय कूटनीति अभी तक चीनी विस्तारवाद को ऐतिहासिक प्ररिपेक्ष्य में समझने में विफल रही है।

गौर करें तो पाएंगे कि चीन के भौगोलिक विस्तारवाद की नीति में काफी स्पष्टता है। बिना किसी दस्तावेजी प्रमाण और संधि के भी चीन अपने आसपास के इलाकों पर दावा ठोक सकता है। चीन के भौगोलिक विस्तारवाद का वैचारिक आधार नहीं है। वहीं चीन इतिहास के प्रमाणों को तोड़-मरोड़ कर अपने विस्तारवाद को अंजाम देता रहा है। चीन का भौगोलिक विस्तारवाद चीन की अपनी सुविधा वाले साक्ष्यों पर ही आधारित है। बेशक इन साक्ष्यों को अंतराष्ट्रीय मान्यता हासिल नहीं है।

चीन के भौगोलिक विस्तारवाद ने साम्यवादी देशों को भी नहीं बक्शा। चीन ने अपनी सुविधा के हिसाब से सीमा के विस्तार के लिए पूंजीवादी अमेरिका का भी सहयोग लिया। माओत्से तुंग के शासन में चीन का सोवियत संघ से सैन्य संघर्ष हुआ और 1969 में चीन ने तत्कालीन सोवियत संघ के नियंत्रण वाले कुछ हिस्सों पर दावा ठोक दिया था। ये हिस्से यानी द्वीप उसरी नदी में थे। चीन ने इन द्वीपों पर दावा करते हुए सोवियत संघ पर हमला बोल था। अंत में सोवियत संघ ने परमाणु हमले की धमकी दी। हालांकि सोवियत संघ के विघटन के बाद चीन कई इलाकों को हासिल करने में कामयाब हो गया।

सन 1979 में चीन ने वियतनाम पर हमला बोल दिया। हमले का तात्कालिक कारण वियतनाम का कंबोडिया में हस्तक्षेप था। चीन में माओ युग समाप्त हो चुका था। चीन की सत्ता पर डेंग शियाओपिंग काबिज हो गए थे। डेंग ने वियतनाम के खिलाफ तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर से सहयोग मांगा। डेंग ने जिमी कार्टर को सोवियत रूस और वियतनाम की दोस्ती का हवाला दिया। माओ और डेंग के ये दो अभियान स्पष्ट करते हैं कि चीनी सैन्यवाद और विस्तारवाद में विचारधारा का महत्त्व नहीं न था, न है और न ही भविष्य में रहेगा।

पिछले कुछ सालों में चीन के इस विस्तारवाद ने और जोर पकड़ा है। हालांकि चीन के पक्ष में कोई अंतराष्ट्रीय कानून या संधि नहीं है। लेकिन फिर भी चीन ने पिछले कुछ वर्षों में दक्षिण चीन सागर के बड़े हिस्से में कई देशों की समुद्री सीमा को लांघते हुए घुसपैठ कर ली है और अपने बेड़े तैनात कर दिए हैं। पुराने इतिहास का हवाला देते हुए वह दक्षिण चीन सागर को अपना हिस्सा बता रहा है। वैसे चीन लाओस, वियतनाम और मंगोलिया के इलाकों पर भी दावा करता रहा है। चीन का तर्क है कि इन देशों के कई इलाके किसी जमाने में चीनी शासकों के अधीन थे।

वियतनाम के इलाकों पर दावा करते हुए चीन तर्क देता है कि यह कभी मिंग वंश के शासकों के अधीन था। लाओस और मंगोलिया को लेकर भी उसका कहना है कि इन इलाकों में किसी जमाने में चीन के शासकों के शासन था। इसलिए ये भी चीन के ही हिस्से हैं। भारत के अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम और लद्दाख में चीन गलत साक्ष्यों का उदाहरण देकर अपना दावा जताता है। जापान के कब्जे वाले सेनकाकू द्वीप को भी वह अपना बताता है। वैसे अगर वर्तमान में इतिहास के आधार पर ही भौगोलिक सीमाओं को तय किया जाएगा, तो कई दक्षिण एशियाई देशों का भूगोल बदल जाएगा।

चीन के विस्तारवाद को रोकने के लिए ठोस रणनीति तय करने की जरूरत है। युद्ध से किसी देश का भला नहीं होने वाला। युद्ध न तो भारत के हित में है, न चीन के। देखा जाए तो भारतीय कूटनीति के ढीलेपन ने ही चीन के मनोबल को मजबूत किया है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण तो यह है कि साल 2003 में भारत ने चीन के अधीन तिब्बत स्वाययत क्षेत्र को मान्यता दे दी। यह भारत की एक बड़ी भूल कही जा सकती है। भारत और चीन के बीच 1988, 1993, 1996, 2005, 2012 और 2013 में द्विपक्षीय समझौते हुए।

इन समझौते में यह तय किया गया था कि दोनों पक्ष आपसी सहयोग, शांति और कूटनीति से सारे विवाद सुलझाएंगे। इसके बावजूद सीमा विवाद आज तक हल नहीं हुआ है, उल्टे भारतीय इलाकों में चीनी सैनिकों की घुसपैठ जारी होती रही। चीनी सैनिकों ने भारतीय सीमा में छोटे-मोटे अतिक्रमण तो सैकड़ों बार किए हैं। 2013 में चीन-भारत सीमा पर मजबूती के लिए भारत सरकार ने माउंटेन कार्प्स के गठन की मंजूरी दी। लेकिन फिलहाल माउंटेन कार्प्स के गठन में कितनी प्रगति हुई है, यह बताना मुश्किल है।

कोरोना महामारी के दौरान चीन ने एकाएक अपने कई पड़ोसियों के साथ तनाव क्यों बढ़ाया, यह बड़ा सवाल है। ताइवान सीमा पर चीन की नौसेना और वायुसेना की गतिविधियां तेज हैं। दक्षिण चीन सागर में भी चीन आक्रमक बना हुआ है। इस साल अप्रैल में चीन के समुद्री जहाज ने वियतनाम के समुद्री इलाके में वियतनामी मछुआरों की नाव तोड़ दी थी।

मई में दक्षिण चीन सागर में मलेशिया के तेल खनन जहाज और चीन के सर्वे संबंधी समुद्री जहाज का टकराव हो गया। कोरोना संकट के दौरान दक्षिण चीन सागर में चीन की गतिविधियों पर इंडोनेशिया ने नाराजगी जताते हुए कहा कि चीन इंडोनेशिया के विशिष्ट समुद्री आर्थिक क्षेत्र में घुसपैठ की कोशिश कर रहा है। इधर चीनी सैनिकों ने भारतीय सीमा में घुसपैठ शुरू कर दी।

मौजूदा दौर में चीन के इस उकसावे वाली रणनीति के कारण तो अपनी जगह हैं ही, वैश्विक परिस्थितियों ने इसमें अपनी भूमिका निभाई है। कोरोना महामारी के कारण चीन को कई देशों ने घेरा है और भारत, आस्ट्रेलिया, जापान, वियतनाम, ताइवान आदि देशों के बीच बढ़ते तालमेल से चीन खासा नाराज है। चीन की सरकार के मुखपत्र ‘ग्लोबल टाइम्स’ ने भारत और आस्ट्रेलिया की बढ़ती नजदीकियों पर चेतावनी भरी टिप्पणियां की हैं। ग्लोबल टाइम्स ने आरोप लगाया है कि भारत और आस्ट्रेलिया इस समय ताइवान वियतनाम जैसे देशों को चीन के खिलाफ गोलबंद करने की कोशिश कर रहे हैं।

एक सच्चाई यह भी है कि इस वक्त चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर राष्ट्रपति शी जिनपिंग के विरोधी सक्रिय हैं। जिनपिंग ने अपने कार्यकाल के दौरान भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के नाम पर कम्युनिस्ट पार्टी में सक्रिय अपने तमाम विरोधियों को खत्म करने की कोशिश की है। कइयों को जेल भेजा, मौत की सजा दिलवाई। इसलिए चीनी कम्युनिस्ट पार्टी का एक गुट जिनपिंग के खिलाफ मौके की तलाश में है।

कोरोना महामारी फैलाने को लेकर चीन की वैश्विक घेरेबंदी हुई है। चीन की अर्थव्यवस्था पर भी बुरा प्रभाव पड़ा है। बेरोजगारी बढ़ी है, फैक्ट्रियों में उत्पादन घटा है, निवेश और निर्यात भी गिरा है। दूसरी ओर, हांगकांग संकट ने भी जिनपिंग की मजबूत छवि को भारी नुकसान पहुंचाया है। इसलिए यह भी कहा जा रहा है कि जिनपिंग घरेलू मोर्चे पर स्थिति मजबूत करने और लोगों का ध्यान बंटाने के लिए पड़ोसी देशों की सीमाओं पर सैन्य आक्रामकता दिखा रहे हैं।

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