The example of sacrifice and sacrifice Dr. Shyama Prasad Mukherjee created history with his efforts for a united India – राजनीति: त्याग और बलिदान की मिसाल

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प्रभात झा
पुण्यतिथि तो अनेक महापुरुषों की मनाई जाती है और आगे भी मनाई जाती रहेंगी। लेकिन वे पुण्यात्मा बहुत भाग्यशाली होते हैं, जिनके समर्थक या विचारधारा पर चलने वाले उनके बलिदान को अपने प्रयासों से उसे सार्थक कर दुनिया के सामने इतिहास रचते हैं। आज डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की पुण्यतिथि है। अखंड भारत के लिए उन्होंने कहा था कि भारत यानी एक देश में ‘दो निशान, दो विधान एवं दो प्रधान’ नहीं चलेंगे। उन्होंने भारतीय संसद में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से कहा था- ‘या तो मैं संविधान की रक्षा करूंगा, नहीं तो अपने प्राण दे दूंगा।’ हुआ भी यही।

डॉ. मुखर्जी परमिट बिना जम्मू-कश्मीर गए और उन्हें शेख अब्दुल्ला की सरकार ने गिरफ्तार किया। तब उन्होंने कहा था- ‘मैं इस देश का सांसद हूं। मुझे अपने देश में ही कहीं जाने से आप कैसे रोक सकते हैं।’ उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और गिरफ्तारी के कुछ ही दिनों बाद उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। वे अखंड भारत के लिए बलिदान देने वाले पहले भारतीय थे, जो जनसंघ के अध्यक्ष के रूप में वहां गए थे।

डॉ. मुखर्जी एक ऐसे धर्मनिष्ठ, न्यायप्रिय और राष्ट्रभक्त माता-पिता की संतान थे, जिनकी प्रसिद्धि न केवल बंगाल, बल्कि संपूर्ण भारत में थी। धर्म एवं संस्कृति के प्रति आदर और राष्ट्रीयता की प्रेरणा उन्हें अपने माता-पिता से मिली थी। अपनी मां योगमाया देवी से धार्मिक एवं ऐतिहासिक कथाएं सुन-सुन कर जहां देश और संस्कृति की जानकारी प्राप्त की, वहीं अपने पिता आशुतोष मुखर्जी के साथ बैठ कर राष्ट्रभक्ति की शिक्षा को आत्मसात किया। आत्मबोध की दिशा में दृढ़ता के साथ बढ़ते हुए श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने शिक्षा, राजनीति, समाज-संस्कृति सभी क्षेत्रों में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

1929 में बंगाल विधान परिषद के सदस्य बने, 1934 से 1938 तक कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे कम उम्र के उप-कुलपति रहे, अखिल भारतीय हिंदू महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी निर्वाचित हुए, बंगाल प्रांत के वित्त मंत्री रहे, संविधान सभा के सदस्य बने और स्वतंत्र भारत के पहले मंत्रिमंडल में मंत्री बने। सन 1952 के पहले आम चुनाव में दक्षिण कलकत्ता संसदीय क्षेत्र से लोकसभा सांसद भी बने।
श्यामा प्रसाद मुखर्जी भारत का विभाजन नहीं होने देना चाहते थे। इसके लिए वे महात्मा गांधी के पास भी गए थे। परंतु गांधी जी का कहना था कि कांग्रेस के लोग उनकी बात सुनते ही नहीं।

जवाहरलाल नेहरू भी विभाजन के पक्ष में थे। जब देश का विभाजन अनिवार्य जैसा हो गया, तो डा. मुखर्जी ने यह सुनिश्चित करने का बीड़ा उठाया कि बंगाल के हिंदुओं के हितों की उपेक्षा न हो। उन्होंने बंगाल के विभाजन के लिए जोरदार प्रयास किया, जिससे मुसलिम लीग का पूरा प्रांत हड़पने का मंसूबा सफल नहीं हो सका। उनके प्रयत्नों से हिंदुओं के हितों की रक्षा तो हुई ही, कलकत्ता बंदरगाह भी पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) को सौंपे जाने से बच गया। पूर्वी पाकिस्तान से विस्थापित होकर भारत आ रहे हिंदुओं की दुर्दशा से वे विचलित थे। उन्होंने विस्थापितों के बीच रह कर उनको लाभान्वित करने वाली योजनाओं की पहल की।

जवाहरलाल नेहरू द्वारा विस्थापितों के प्रति उपेक्षा के कारण उन्होंने आठ अप्रैल 1950 को नेहरू मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया, जिसमें वे 1947 में गांधी जी के निमंत्रण पर शामिल हुए थे। त्यागपत्र देने के बाद डा. मुखर्जी ने संसद में प्रतिपक्ष की भूमिका निभाने का निश्चय किया। 21 अक्तूबर 1951 को भारतीय जनसंघ का गठन हुआ, जिसके वे संस्थापक अध्यक्ष बने। डा. मुखर्जी ने अपने उद्घाटन भाषण में कहा था- ‘आज भारतीय जनसंघ के रूप में एक नए अखिल भारतीय राजनीतिक दल का उदय हो रहा है, जो देश का प्रमुख प्रतिपक्षी दल होगा। हालांकि भारत अद्वितीय विविधताओं का देश है, तब भी इस बात की परम आवश्यकता है कि मातृभूमि के प्रति गहरी भक्ति भावना और निष्ठा की चेतना में से विकसित होने वाला बंधुत्व भाव और विवेक समस्त देशवासियों को एक सूत्र में बांधे।’

देश में पहला आम चुनाव 25 अक्तूबर 1951 से 21 फरवरी 1952 तक हुआ। भारतीय जनसंघ को तीन सीटें मिलीं। डा. मुखर्जी भी दक्षिण कलकत्ता संसदीय क्षेत्र से चुनाव जीत कर लोकसभा में आए। हालांकि उन्हें विपक्ष के नेता का दर्जा नहीं था, लेकिन वे संसद में डेमोक्रेटिक एलायंस के नेता थे। सदन में नेहरू की नीतियों पर तीखा प्रहार करते थे। संसद में संख्या की दृष्टि से थोड़े होते हुए उनका इतना प्रभाव था कि चाहे कश्मीर पर चर्चा हो या कोई और विषय हो, उनके भाषण को सब पूरे ध्यान से सुनते थे।

जिस समय संविधान सभा में धारा 370 पर विचार-विमर्श हो रहा था, शेख अब्दुल्ला की बात मान कर जवाहरलाल नेहरू स्वयं विदेश चले गए। यह एक सोची-समझी रणनीति के तहत किया गया। मंत्रिमंडल में बिना विभाग के मंत्री रहे गोपालस्वामी अयंगर, जो जम्मू-कश्मीर के राजा हरि सिंह के दीवान रहे थे, को नेहरू खासतौर पर जम्मू-कश्मीर के लिए ही कैबिनेट में लाए थे। विदेश जाने से पहले यह जिम्मेदारी नेहरू ने अयंगर को देकर गए थे।

धारा 370 का प्रावधान कांग्रेस संसदीय दल के समक्ष आया और वहां भी विरोध हुआ। घबराए अयंगर सरदार पटेल के पास पहुंचे। उन्होंने भी इसे अस्वीकार कर दिया। लेकिन अस्थायी व्यवस्था की गई। सरदार पटेल का कहना था कि नेहरू होते तो इसे ठीक कर देता, लेकिन अभी तो मानना होगा। सरदार पटेल का असामयिक दुनिया से चला जाना दुर्भाग्यपूर्ण रहा। धारा 370 के कारण कश्मीर की समस्या भले ही बाद में लोगों को दिखाई दी हो, डा. मुखर्जी उसकी गंभीरता को आरंभ में ही समझ गए थे।

जम्मू-कश्मीर में शेख अब्दुल्ला की पृथकतावादी राजनीतिक गतिविधियों से उभरी अलगाववादी प्रवृतियां 1952 तक जोर पकड़ने लगी थीं। इससे राष्ट्रीय मानस विक्षुब्ध हो उठा था। डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने प्रजा परिषद के सत्याग्रह को पूर्ण समर्थन दिया, जिसका उद्देश्य जम्मू-कश्मीर को भारत का पूर्ण और अभिन्न अंग बनाना था। समर्थन में उन्होंने जोरदार नारा बुलंद किया था -‘एक देश में दो निशान, एक देश में दो विधान, एक देश में दो प्रधान, नहीं चलेंगे, नहीं चलेंगे।’

अगस्त 1952 में जम्मू की विशाल रैली में उन्होंने अपना संकल्प व्यक्त करते हुए कहा था-‘या तो मैं आपको भारतीय संविधान प्राप्त कराऊंगा या फिर इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए अपना जीवन बलिदान कर दूंगा।’ 26 जून 1952 को संसद में दिए अपने ऐतिहासिक भाषण में डा. मुखर्जी ने धारा 370 को समाप्त करने की जोरदार वकालत की थी। उन्होंने कहा था- ‘क्या जम्मू-कश्मीर के लोग उन मूलभूत अधिकारों के हकदार नहीं हैं, जिन्हें हमने जम्मू-कश्मीर को छोड़ सारे भारत के लोगों को दिया है?’

अपने संकल्प को पूरा करने के लिए उन्होंने नई दिल्ली में नेहरू सरकार और श्रीनगर में शेख अब्दुल्ला की सरकार को चुनौती देने का निश्चय किया। मई 1953 में जम्मू-कश्मीर की यात्रा पर निकल पड़े। उनका उद्देश्य वहां जाकर स्थिति का अध्ययन करना था। उन दिनों जम्मू-कश्मीर में प्रवेश के लिए परमिट लेना पड़ता था, लेकिन उन्होंने बिना परमिट जम्मू-कश्मीर राज्य में प्रवेश करने का निर्णय लिया।

उन्होंने संप्रभु गणतंत्र भारत के अंदर दूसरे संप्रभु गणतंत्र के अस्तित्व को अस्वीकार कर दिया। जब उनसे परमिट मांगा गया तो उन्होंने कहा- ‘मैं भारत की संसद का सदस्य हूं, मैं अपने ही देश में कश्मीर में परमिट लेकर नहीं जाऊंगा।’ उन्हें गिरफ्तार कर नजरबंद कर दिया गया। चालीस दिन तक न उन्हें चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई गई और न अन्य बुनियादी सुविधाएं दी गईं। 23 जून 1953 को उनकी रहस्यमय परिस्थितियों में मृत्यु हो गई।
(लेखक भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं)

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