Consumption of FMCG products fallen more than one and a half times in villages compared to cities – राजनीतिः ग्रामीण रोजगार का संकट

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सुविज्ञा जैन

अर्थव्यवस्था का संकट दिनों दिन गहराता जा रहा है। इससे सरकार के राजस्व में दस लाख करोड़ की कमी आने की आशंका है। ऐसे हालात में अब यह देखना जरूरी है कि अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए जितने भी विकल्प हमारे सामने हैं, उनमें सबसे कारगर क्या हो सकता है? पिछले दिनों एक उत्साहजनक बात यह सुनने को मिली थी कि इस संकट से हमें कृषि क्षेत्र बचा सकता है। इसका एक आधार यह था कि देश में कृषि उत्पादन पिछले साल बढ़िया हुआ है। लेकिन इस उम्मीद को बांधने से पहले क्या यह भी नहीं देखा जाना चाहिए कि हमारी पूरी अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान है कितना? आंकड़े बताते हैं कि कृषि का योगदान लगभग पंद्रह फीसद है, यानी कृषि क्षेत्र के सहारे अर्थव्यवस्था संभालने की उम्मीद लगाना एक मुगालता ही कहा जाएगा। हां, इतना जरूर है कि मुश्किल हालात में जहां दूसरी उत्पाद्र गतिविधियां बहाल करने का कोई ओर-छोर पकड़ में न आ रहा हो, वहां कम से कम कृषि क्षे़त्र अपनी पूर्व की स्थिति में खड़ा तो दिख रहा है।

लेकिन क्या सिर्फ कृषि उत्पादन के आंकड़े निश्चिंतता के लिए काफी हैं? क्या यह नहीं देखा जाना चाहिए कि इस समय किसान, खेतिहर मजदूर और गांवों में बढ़ते बेरोजगार परिवारों की वास्तविक स्थिति क्या है? पिछले कई महीनों से विशेषज्ञ ग्रामीण अर्थव्यवस्था की बिगड़ती हालत की तरफ ध्यान दिलाते आ रहे हैं। और एक बात अब किसी को भी यह मान लेने में अड़चन नहीं आनी चाहिए कि देश में कई छमाहियों से चली आ रही आर्थिक सुस्ती की सबसे ज्यादा मार गांवों पर ही पड़ी है। इसका अनुमान गांवों में रोजमर्रा की जरूरत के सामान की खपत घटने से लगाया गया था। सर्वेक्षणों के मुताबिक रोजमर्रा के इस्तेमाल की चीजें बनाने वालीं यानी एफएमसीजी कंपनियों के उत्पादों की खपत शहरों के मुकाबले गांवों में डेढ़ गुनी से ज्यादा गिर गई थी। इस तथ्य के आधार पर अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं था कि गांव के व्यक्ति की जेब की क्या हालत हो गई है। कई अर्थशास्त्री तो अर्से से सुझाते आ रहे हैं कि जरूरत ग्रामीण उपभोक्ताओं की जेब तक पैसा पहुंचाने की है। याद करें तो पिछले साल से ही कई किसान संगठन मांग कर रहे थे कि उद्योग क्षेत्र की तर्ज पर कृषि क्षेत्र को भी आर्थिक पैकेज मिलना चाहिए।

इसी बीच, आर्थिक संकट से जूझती सरकार के सामने कोरोना आपदा आ गई। तीन महीने गुजर गए, अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए तरह-तरह के जतन करने पड़ रहे हैं। सरकार को अपनी हैसियत से कई-कई गुने बड़े राहत पैकेजों का एलान करना पड़ रहा है। मसलन पिछले दिनों सरकार ने बीस लाख करोड़ के भारी-भरकम राहत पैकेज की घोषणा की। लिहाजा क्या यह नहीं देखा जाना चाहिए कि इस कवायद में देश के कृषि केंद्र यानी गांव के लिए सबसे ज्यादा गौरतलब क्या एलान था? बीस लाख करोड़ के उस राहत पैकेज में ग्रामीण बेरोजगारों के लिए कानूनी योजना यानी मनरेगा के लिए चालीस हजार करोड़ रुपए अलग से दिए गए हैं। वाकई यह रकम देखने में बड़ी दिखाई देती है। बड़ी इस मायने में भी है क्योंकि कुछ महीने पहले ही बजट में सरकार मनरेगा कानून को लागू करने के लिए साढे इकसठ हजार करोड़ का प्रावधान कर चुकी थी। यानी चालीस हजार करोड़ रुपए के नए एलान को मिला कर मनरेगा पर खर्च के लिए इस वित्तीय वर्ष में अब कुल एक लाख एक हजार पांच सौ करोड़ की रकम खर्च के लिए उपलब्ध है। बेशक, पिछले वर्षों की तुलना में इस रकम को सर्वकालीन सर्वाधिक कह कर प्रचारित किया गया और अभी भी प्रचारित किया जा रहा है। लेकिन अर्थव्यवस्था के मौजूदा संकट के मद्देनजर क्या इसका आकलन जरूरी नहीं है कि गांव और गांव में बेरोजगारी की समस्या से निपटने के लिए यह रकम है कितनी?

पिछले साल के बजट में भी मनरेगा के लिए साठ हजार का प्रावधान किया गया था। बाद में जो संशोधित आंकड़ा आया उसमें यह रकम बढ़ कर इकहत्तर हजार करोड़ हो गई थी। हालांकि इस रकम में से पिछले साल खर्च किए गए अड़सठ हजार करोड़ रुपए। सरकार का दावा है कि इस खर्च से पांच करोड़ अड़तालीस लाख ग्रामीण परिवारों को मनरेगा कानून के तहत रोजगार मुहैया कराया गया। गौरतलब है कि इस कानून के तहत गांव के बेरोजगार परिवारों को साल में सौ दिन और एक सौ बयासी रुपए प्रतिदिन के हिसाब से रोजगार दिए जाने की कानूनी जिम्मेदारी थी। लेकिन मनरेगा के पिछले साल का आकलन करते हैं तो आंकड़ा यह निकल कर आता है कि साढे़ पांच करोड़ बेरोजगार परिवारों को कानून सम्मत यानी सौ दिन और एक सौ बयासी रुपए प्रतिदिन की दर से काम देने पर कम से कम एक लाख चालीस हजार करोड़ रुपए खर्च होने चाहिए थे। इसलिए यह पड़ताल करनी पड़ती है कि उतने बेरोजगार परिवारों को काम देने का काम सिर्फ अड़सठ हजार करोड़ में हो कैसे गया?

दरअसल, पिछले साल साढ़े पाच करोड़ परिवारों के तहत काम दिया जाना तो दर्ज हुआ, लेकिन उन्हें सौ दिन का रोजगार नहीं मिला। पिछले साल कानूनी योजना मनरेगा के तहत साल के तीन सौ पैंसठ दिन में औसतन सिर्फ 48.39 दिन यानी लगभग पचास दिन का ही काम दिया जा सका। सरकारी अफसरों का तर्क हो सकता है कि सभी बेरोजगारों ने पूरे सौ दिन का काम मांगा ही नहीं। लेकिन देश में कुछ साल से बेरोजगारी के बढ़ते हालात देखते हुए यह बात किसी के गले उतरेगी नहीं। बहरहाल यह गुजरे साल की बात थी। इस साल के हालात को संभालने का मसला और भी बड़ा है।

इस साल मनरेगा के तहत मजदूरी एक सौ बयासी से बढ़ा कर औसतन दो सौ दो रुपए प्रतिदिन की जा चुकी है। हिसाब लगाने में आसानी के लिए इसे औसतन दो सौ रुपए मान कर चलें तो पिछले साल जितने ही ग्रामीण परिवारों को कानूनन सौ दिन का काम देने के लिए इस साल कम से कम एक लाख चौवन हजार करोड़ रुपए की जरूरत पड़ेगी। इस समय मनरेगा के मद में कुल रकम उपलब्ध है, सिर्फ एक लाख एक हजार पांच सौ करोड़ रुपए। यानी इस साल भी सौ दिन काम की गारंटी की गुंजाइश ही नहीं बचती। लेकिन इस साल का अनुमानित हिसाब यहीं खत्म नहीं हो जाता।

इस साल गांवों की माली हालात हद से ज्यादा बदली हुई है। पूर्णबंदी के दौरान अपने अपने गांवों में वापस पहुंचे मजदूरों और कामगार परिवारों की तादाद कम से कम दो करोड़ बैठती है। यानी पिछले साल काम मांगने वालों की संख्या साढ़े पांच करोड़ में इस साल दो करोड़ बेरोजगारों को और जोड़ लिया जाना चाहिए। इन अतिरिक्त दो करोड़ ग्रामीण परिवारों को रोजगार देने का खर्च इस साल कमोबेश चौवन हजार करोड़ और बढ़ जाएगा। मनरेगा कानून पर इस खर्च में मजदूरों की दिहाड़ी के अलावा प्रशासनिक खर्च, मजदूरों के लिए गैंती-फावड़े, डलिया, रस्सी जैसे सामान पर खर्च को शामिल किया जाता है। बहरहाल, बदले हालत में मरनेगा की कानूनी जिम्मेदारी पूरी करने के लिए न्यूनतम दो लाख आठ हजार करोड़ की जरूरत है। जबकि मनरेगा की मद में इस साल रकम है सिर्फ एक लाख एक हजार पांच सौ करोड़ रुपए, यानी जरूरत से आधी। गांवों में रोजगार मांगने वालों की तादाद बढ़ रही है। लिहाजा हमें फौरन ही सतर्क हो जाना चाहिए। जिस तरह अर्थव्यवस्था के दूसरे क्षेत्रों में जान फूंकने की कोशिश हो रही है बिल्कुल वैसी ही कवायद ग्रामीण रोजगार के मोर्चे पर फौरन ही तैनात होने की दरकार है।

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