Crores of migrant laborers have returned home and many of them are unemployed, leaders are doing party politics – राजनीति: समस्या समाधान की दिशा

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इस समय देश में कितने करोड़ लोग अपनी रोजी-रोटी के लिए चिंतित हैं? संख्या के अनुमान पर सहमति असंभव होगी। विश्व बैंक के एक अनुमान के अनुसार भारत में चार करोड़ से अधिक मजदूरों के अपने गांव लौटने की स्थिति बन गई है। पिछले तीन महीनों से यह विस्थापन अत्यंत कष्टप्रद स्थितियों में चल रहा है। अस्सी से अधिक मजदूरों की रेलयात्रा के दौरान मृत्यु हो चुकी है, लगभग दो सौ की मौत पैदल यात्रा के दौरान हुई और ऐसा होना प्रत्येक व्यक्ति के लिए न केवल दुखदाई है, बल्कि शर्मनाक भी। इस समय यह स्वीकार करने में कोई असहमति नहीं होनी चाहिए कि स्थिति अत्यंत विकट और अनेक आशंकाओं से भरी हुई है।

केंद्र और सभी राज्य सरकारों के प्रयासों की आलोचना तथ्यों के स्थान पर दलगत आधार पर सिमट गई है। प्रजातंत्र के ध्रुवों पक्ष और विपक्ष में छिड़े शब्द-युद्ध में आरोप-प्रत्यारोप संभवत: और तल्खी से हमारे सामने आते रहेंगे और उन अनगिनत लोगों, संस्थाओं और समूहों को क्षुब्ध करते रहेंगे जो सारे देश में सहायता कार्य में निस्वार्थ भाव से संलग्न हैं।

हर त्रासदी के समय समाज का यह मानवीय चेहरा उभरता है, सामाजिक सद्भाव और भाईचारे का जो दर्शन ऐसे अवसरों पर होता है, वह नई पीढ़ी के लिए अनुकरणीय उदाहरण बन जाता है। ऐसा केवल युद्ध के समय ही नहीं होता है, हर प्राकृतिक आपदा के वक्त भी सहायता के लिए लोगों का उमड़ना मनुष्य की मूलभूत एकता में नया विश्वास पैदा कर देता है।

कुछ लोग विघटन का कितना ही प्रयास क्यों न करें, भारत की संस्कृति की मूल भावना विविधता की स्वीकार्यता की है और आवश्यकता पड़ने पर यही देश की एकता और अखंडता की ढाल है। इसमें विद्यमान एक-दूसरे के दु:ख-सुख बांटने का विश्वास ही प्रवासी मजदूरों को अपने गांव में वापस ला रहा है। जिन शहरों में उन्होंने बड़ी-बड़ी उम्मीदें लगा रखी थीं, वे उन्हें अपना नहीं सके, कष्ट में उनके साथ पूरी तरह खड़े नहीं हो पाए। वे पारस्परिक सद्भाव और विश्वास को भी अपेक्षित स्तर तक नहीं ला सके।

भारत में प्रवासी मजदूरों को लेकर जो स्थिति बनी है, वह कार्यपालिका में दूरदृष्टि की अनुपस्थिति का चिंताजनक उदाहरण भी प्रस्तुत करती है। इसी के साथ राजनीति में नासमझी और ओछेपन के अनेक उदाहरण लगभग प्रतिदिन ही सामने आ रहे हैं। जिन लोगों को एक साथ बैठ कर समस्या के स्वरूप को समझना चाहिए, सहमति के आधार ढूंढ़ने चाहिए, वे मीडिया में निरर्थक बहसों में उलझे हुए हैं। क्या नौकरशाही कोरोना के बाद के लोगों की मनस्थिति को पूरी तरह से समझ पाएगी?

मजदूरों की मजबूरी में घर वापसी के दुखद समय में गांधी जी का यह अमर वाक्य बार-बार याद आया है-मेरा जीवन ही मेरा संदेश है। उनके जीवन काल में देश में ऐसे लाखों लोग थे, जिनका दर्शन लाभ युवाओं को मिलता था। वे उनके लिए प्रेरणा स्रोत बनते थे।

गांवों, कस्बों और छोटे शहरों में भी इनकी उपस्थिति थी। चूंकि इनकी सारी प्रतिष्ठा त्याग और जनसेवा से ही निर्मित हुई थी, अत: लोगों पर इनका प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता था। धीरे-धीरे चुनावों की वस्तु-स्थिति उजागर होती गई, संसाधनों से समृद्ध लोग ही आगे आने लगे, सत्ता में पहुंच कर स्वार्थ में लिप्त होते गए, पंचायत स्तर तक के चुनावों में धन और लालच का बोलबाला हो गया। पंचायत राज कानून के बाद जब सरकारी अनुदान सीधे पंचायतों को जाने लगा, वंचित और अधिक वंचित होते गए।

आज ऐसे कितने लोग (अपवाद छोड़ कर) सार्वजानिक जीवन में हैं, राजनीति में हैं, उच्च पदों पर निर्वाचित होकर पहुंचे हैं जिन्होनें अपने कार्यकारी क्षेत्र में दस-बीस साल जम कर सेवा कार्य किया हो, वहां के लोगों के दु:ख-दर्द को समझा हो, भोगा हो?

इसलिए सवाल उठता है कि क्या केंद्र और राज्य सरकारों की समन्वित व्यवस्था देश के सभी मजदूरों को कुछ दिनों के भीतर उनके गंतव्य तक पहुंचाने की योजना नहीं बना सकते थे? यदि राज्य और केंद्र एक दूसरे को समझ कर सहयोग करते तो यह कार्य अब तक पूरा हो चुका होता। मुख्य चुनौती इस समय यह है कि कोरोना के बाद जो नई परिस्थितियां बनेंगी, उनके समाधान निकालने के लिए संघीय व्ययवस्था कितनी सतर्क और सजग रह कर समन्वित ढंग से कार्य कर सकेगी?

संभवत: यह ऐसी चिंता है जो हर व्यक्ति के समक्ष कुछ इस प्रकार से उपस्थिति कर दी गई है कि उसकी जकड़न से कोई भी बच पाया है। अपने प्रदेश में लौटने के बाद उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में लाखों लोग अपने गांव में रोजगार की तलाश करेंगे। ये वे लोग हैं जिनकी आवश्यकता रोजी-रोटी के साथ स्कूल और स्वास्थ्य केंद्र की भी होगी। गांव के स्कूलों के साथ जो दुराव लगातार चलता आया है, उसने उनकी साख और स्वीकार्यता को समाप्त कर दिया है।

इसके पहले शहर से जब यही कामगार और मजदूर छुट्टी में गांव जाते थे, तो अपने रोजगार, शहर और वहां की अपनी स्थिति का एक मोहक चित्रण प्रस्तुत करते थे। लेकिन अब जिन परिस्थितियों में ये लौटे हैं, वह एक कठिन मनोवैज्ञानिक कुंठा को भी जन्म देगी। मनुष्य अपने बच्चों के भविष्य की अनिश्चितता की व्यथा को झेल पाने में अपने को जितना असमर्थ पाता है, उतना वह अन्य किसी संकट से नहीं घबराता है। इस सब की सामजिक और वैज्ञानिक समझ विकसित करने का उत्तरदायित्व शोध संस्थानों तथा राष्ट्रीय शैक्षिक संस्थाओं को उठाना चाहिए।

इस समय देश की अनेक राष्ट्रीय संस्थाओं को स्थानीय स्तर पर ऐसे समाज सेवी चाहिए, जिनका अनुकरणीय व्यक्तिव हो, जो बेदाग हों, जो निस्वार्थ भाव से लोगों के बीच कार्य करने को तैयार हों। वर्तमान परिस्थितियों में ऐसी अपेक्षा युवाओं से ही की जा सकती है। स्वामी विवेकानंद के शब्दों में ह्लजनता को शुद्धाचरण, पुरुषार्थ और श्रद्धापूर्वक लगे रहने की शिक्षा दो। यह निश्चय ही धर्म है।

अपने जटिल दार्शनिक विचारों को कुछ समय के लिए किनारे रख दो। वे स्वामी विवेकानंद ही थे, जिन्होनें आह्वान किया था कि पूजा घर कुछ समय के लिए बंद कर दो, दीन-दुखियों के पास जाकर उनकी सेवा करो! वे धर्म का जो आशय स्पष्ट करते हैं, उसे भारत के हर व्यक्ति को चाहे वह किसी भी मत/मतांतर का हो, सही परिपेक्ष्य से समझना आवश्यक है।

राष्ट्रीय समस्याओं के समाधान में सत्तापक्ष और विपक्ष के सभी दलों और अनुभवी और विचारवान व्यक्तिव के धनी राजनेताओं को एक साथ अवश्य आना चाहिए। इस समय एक त्वरित गहन विचार-विमर्श की जो आवश्यकता है, उसकी भी संभावना तलाशने के लिए समाज के उस प्रबुद्ध वर्ग को आगे आना होगा, जिसकी वैचारिकता किसी दलगत राजनीति से प्रेरित न हो।

केंद्र और राज्य की सरकारें नई स्थिति के समाधान ढूंढेंगी और नई नीतियों व परियोजनाओं के सफल होने की संभावना भी बढ़ेगी, लेकिन यह सिर्फ तभी संभव हो पाएगा जब गांधी, ग्राम स्वराज, स्वदेशी, मजदूर, कामगार, किसान और खेती की समझ रखने वालों की इसमें संपूर्ण रूप से भागीदारी होगी। बहुत देर हो चुकी है। अब बढ़ती असमानता के परिणाम हमारे सामने हैं।

सभी को सबसे ज्यादा अपेक्षा तो शिक्षा से होगी, उसमें जो परिवर्तन किए जाएंगे, उनसे होगी। अभी तो हमें जन शिक्षा पर जोर देना है, स्वच्छता और सहयोग के नए उदाहरण प्रस्तुत करने हैं, सरकारी स्कूलों का कायाकल्प करना है। स्थानीय वैचारिकता, सर्जनात्मकता, उत्पादकता और अनुभव का लाभ उठाते हुए इसके सार तत्व को बच्चों की शिक्षा का अनिवार्य अंग बनाना है, इसका कोई अन्य विकल्प है ही नहीं।

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