disasters challenge we have to make extensive changes in the model of development and lifestyle -राजनीतिः चुनौती बनती आपदाएं

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भारत डोगरा

दुनिया के अनेक क्षेत्र इस समय दोहरी-तिहरी आपदाओं के दौर से गुजर रहे हैं। अफ्रीका और अरब क्षेत्र के कुछ देशों में युद्ध और गृह-युद्ध के कारण करोड़ों लोग बुरी तरह त्रस्त थे और भूख के साथ घायल, बीमार लोगों के इलाज की समस्या भी विकट होती जा रही थी। इस स्थिति में कोरोना महामारी और उससे बचाव के लिए पूर्णबंदी जैसी स्थितियों का आगमन हुआ। इस कारण खाद्य सामग्री जरूरतमंदों तक पहुंचाने और घायलों के इलाज की समस्या और गहरा गई। इतना ही नहीं, इसी स्थिति में इनमें से कुछ देशों को टिड्डी दलों के हमले को भी झेलना पड़ा, जिससे खाद्य व आजीविका सुरक्षा पर और प्रतिकूल असर पड़ा।
ईरान, अफगानिस्तान, वेनेजुएला जैसे कई देसों को पिछले कुछ समय में तीन-पक्षीय आपदाओं के दौर से गुजरना पड़ा है। दक्षिण एशिया का एक बहुत बड़ा क्षेत्र भी दोहरी या तिहरी आपदा से प्रभावित रहा है। यदि हम अपने देश के पूर्वी भाग को देखें तो कोविड-19 के दौर में ही पश्चिम बंगाल और ओड़िशा को समुद्री चक्रवात का सामना करना पड़ा। पश्चिम बंगाल में तो भारी तबाही हुई। तटबंधों के टूटने से बाढ़ की स्थिति कुछ क्षेत्रों में मानसून के आगमन से पहले ही उत्पन्न हो गई। असम के कुछ क्षेत्रों में भी समय से पहले ही बाढ़ जैसे हालात बन गए। इतना ही नहीं, देश के अनेक पश्चिमी भागों को पिछले दिनों टिड्डी दलों के सबसे बड़े हमले को भी झेलना पड़ा है। राजस्थान, उत्तर-प्रदेश, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के अनेक जिले टिड्डियों के हमले से प्रभावित हुए। इनमें से कई जिले इसी समय गंभीर जल-संकट से भी जूझ रहे हैं। महाराष्ट्र के कुछ जिलों में निसर्ग चक्रवात से भी भारी क्षति हुई है।

ऐसी विशेष कठिन परिस्थितियों में संकट से उबरने के लिए परस्पर सहयोग और साहस की जरूरत है। ओड़िशा व पश्चिम बंगाल में चक्रवात से पूर्व के बचाव में यह देखा गया, जिसके लिए इस प्रयास से जुड़ी सभी एजेंसियां प्रशंसा की पात्र हैं। लगभग सात लाख लोगों को समय पर व विशेष आश्रयों व सुरक्षा स्थलों पर पहुंचाया गया। ओड़िशा में एक भी जीवन की क्षति नहीं हुई। पश्चिम बंगाल में तूफानी प्रकोप इतना अधिक था कि कुछ लोगों को नहीं बचाया जा सका, फिर भी बचाव प्रयास कुल मिला कर काफी हज तक कामयाब रहे। इसी तरह के साहस व आपसी सहयोग का मिलाजुला प्रयास बाद में जन-जीवन को सामान्य बनाने में भी देखा गया है।

जलवायु बदलाव के इस दौर में वैसे भी आपदाएं बढ़ रही हैं। अत: दोहरी-तिहरी आपदाओं के प्रकोप के लिए हमें अब हमेसा तैयार रहना होगा। एक साथ आने वाली आपदाएं चुनौती बन कर उभरी हैं। लेकिन यदि हम विभिन्न स्तरों पर पर्यावरण रक्षा के प्रति अधिक सजग और प्रयासरत रहे, तो आपदाओं की संभावना और विनाशक क्षमता में एक सीमा तक कमी जरूर लाई जा सकती है। इसके लिए छिटपुट प्रयास नहीं, अपितु सुनियोजित ढंग से दीर्घकालीन प्रयासों की जरूरत है और वह भी निरंतरता के साथ। इसलिए नियोजित टिकाऊ विकास का महत्त्व अब पहले से और ज्यादा बढ़ गया है।

आपदाओं का सबसे अधिक कष्ट उन लोगों को सहना पड़ता है जो गरीबी व अभाव के कारण किसी बड़ी कठिनाई को झेलने में सक्षम नहीं हैं। उनके आवास, खाद्य उपलब्धि और आय की स्थिति इतनी विकट है कि अचानक आई आपदा का सामना कर पाना उनके लिए संभव ही नहीं है। ऐसे में जो बुनियादी जरूरतें खाद्य-सुरक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की हैं, उन्हें अधिक मजबूत करना होगा। इनके लिए उपलब्ध संसाधन बढाने होंगे और कई तरह की फिजूलखर्ची व अपव्यय को रोकना होगा। विभिन्न आपदाओं का सामना करने के लिए जो विशिष्ट प्रयास जरूरी हैं, उन पर अधिक ध्यान देना होगा, उनके लिए अधिक संसाधन उत्पन्न कराने होंगे। इस क्षेत्र में विकेंद्रित प्रयासों और क्षमताओं को मजबूत करने से भी बहुत सहायता मिलेगी।

जहां एक ओर केंद्र व राज्य सरकारों के स्तर पर बेहतर आपदा प्रबंधन क्षमता विकसित करने की जरूरत है, वहीं पंचायत, गांव समुदाय और मोहल्ले के स्तर पर भी यह बहुत महत्त्वपूर्ण है। अनेक आपदाओं के समय जीवन रक्षा के लिए किसी बाहरी एजेंसी के पहुंचने से पहले बचाव के कुछ महत्त्वपूर्ण कार्य करने होते हैं और यह तभी संभव हो सकते हैं जब स्थानीय स्तर पर तैयारी पहले से मजबूत हो। अत: विभिन्न गांवों और समुदायों के स्तर पर संभावित आपदाओं पर नियोजित ढंग से संवाद होना, स्थानीय योजना तैयार करना और इसके आधार पर राज्य व केंद्र सरकार से सहायता प्राप्त कर निरंतरता से कार्य करना बहुत जरूरी है।
जहां एक ओर आपदाओं का सामना करने की तैयारी बहुत जरूरी है, वहीं दूसरी ओर इन आपदाओं के अधिक विकट होने के कारण समझना और उन्हें कम करना भी आवश्यक है। वैज्ञानिकों ने इस बारे में बहुत-सी जानकारी उपलब्ध करवाई है कि जलवायु बदलाव के कारण आपदाएं अधिक विकट हो रही हैं और अगले कुछ दशकों में उग्र रूप धारण सकती हैं। समुद्रों का जल-स्तर ऊपर उठने से कई टापू देश लुप्त तक हो सकते हैं, कई घनी आबादी के शहर उजड़ सकते हैं और एक-तिहाई कृषि भूमि बुरी तरह प्रभावित हो सकती है। बदलती जलवायु के कारण अनेक प्रजातियां लुप्त हो सकती हैं। नई बीमारियां फैल सकती हैं या पहले से मौजूद रोगों का प्रकोप बढ़ सकता है।

वर्ष 1992 में विश्व के डेढ़ हजार से ज्यादा वैज्ञानिकों ने (जिनमें उस समय जीवित नोबल पुरस्कार प्राप्त वैज्ञानिकों में से लगभग आधे वैज्ञानिक भी सम्मिलित थे) एक बयान जारी किया था, जिसमें कहा गया था कि, ‘हम मानवता को इस बारे में चेतावनी देना चाहते हैं कि भविष्य में क्या हो सकता है? पृथ्वी और उसके जीवन की व्यवस्था जिस तरह हो रही है, उसमें व्यापक बदलाव की जरूरत है, अन्यथा बहुत कष्ट बढ़ेंगे और हम सबका घर यह पृथ्वी इतनी बुरी तरह तहस-नहस हो जाएगी कि फिर उसे बचाया नहीं जा सकेगा।’

वर्ष 1992 में आई वैज्ञानिकों की इस चेतावनी के पच्चीस साल पूरे होने पर एक बार फिर विश्व के जाने-माने वैज्ञानिकों ने वर्ष 2017 में एक नई अपील जारी की थी। इस अपील पर पहले से भी अधिक ध्यान आकर्षित हुआ। इस पर एक सौ अस्सी देशों के तेरह हजार पांच सौ चौबीस वैज्ञानिकों व प्रतिष्ठित व्यक्तियों ने हस्ताक्षर किए थे। इसमें कहा गया कि जिन गंभीर समस्याओं की ओर वर्ष 1992 में ध्यान दिलाया गया था, उनमें से अधिकांश समस्याएं पहले से अधिक विकट रूप धारण करती जा रही हैं। लेकिन उनको सुलझाने के प्रयास में कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं हुई है। केवल ओजोन परत संबंधी समस्या में कुछ उल्लेखनीय सफलता मिली है। अस्तित्व को संकट में डालने वाली अन्य समस्याएं पहले की तरह गंभीर स्थिति में मौजूद हैं या फिर उनकी स्थिति और विकट हुई है।

मौजूदा एक साथ दोहरी-तिहरी आपदाओं के दौर को समझने के लिए इस तरह की चेतावनियों पर ध्यान देना जरूरी है। ये चेतावनियां हमें बता रही हैं कि जहां आपदाओं का सामना करने के लिए कहीं अधिक व बेहतर तैयारी की जरूरत है, वहां बचाव के लिए हमें विकास के मॉडल व जीवन शैली में व्यापक बदलाव करने होंगे, ताकि पर्यावरण की रक्षा को व्यापक व मजबूत आधार मिल सके। इसके साथ यह व्यापक सच्चाई अपनी जगह है कि विश्व इतिहास के किसी भी अन्य दौर की अपेक्षा आज न्याय, समानता, अमन-शांति और पर्यावरण रक्षा के विभिन्न आंदोलनों व अभियानों के एक-दूसरे के नजदीक आने व आपसी एकता से अधिक व्यापक उद्देश्यों के लिए कार्य करना जरूरी है। इसके लिए यह भी जरूरी है कि विश्व की बड़ी समस्याओं व इन आंदोलनों और अभियानों के प्रति जन-चेतना का प्रसार कहीं अधिक व्यापक स्तर पर हो।

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