Economic stimulus package help small industries MSME overcome crisis, born due to covid epidemic – राजनीति: छोटे उद्योग, बड़ा संकट

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जयंतीलाल भंडारी
पिछले दो महीने में कोरोना महामारी संकट से निपटने के लिए की गई पूर्णबंदी से उद्योगों को भारी झटका लगा है। इसका सीधा असर देश की विकास दर पर पड़ा है। पिछले कुछ समय में सरकार की ओर से जो राहत और प्रोत्साहन पैकेज जारी किए गए हैं, उससे यह उम्मीद तो बंधी है कि कारोबार फिर से पटरी पर लौटेगा, लेकिन यह सरकार और उद्योगों दोनों के लिए बड़ी चुनौती है। एक जून को सरकार ने दो लाख कुटीर, लघु एवं मध्यम उद्योगों (एमएसएमई) को उबारने के लिए बीस हजार करोड़ रुपए की सहायता और रेहड़ी-पटरी वालों को भी फिर से कारोबार शुरू करने के लिए दस हजार रुपए तक के कर्ज की मंजूरी दे दी है।

साथ ही, अच्छा प्रदर्शन कर रही एमएसएमई को और मजबूत बनाने के लिए पचास हजार करोड़ रुपए के इक्विटी निवेश को भी स्वीकृति दी गई है। इससे एमएसएमई उद्योगों को स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध होने का मौका मिलेगा।

यह भी महत्त्वपूर्ण है कि एमएसएमई को लाभ देने के लिए सरकार ने इसकी परिभाषा में बड़ा बदलाव किया है। इसका दूरगामी प्रभाव पड़ेगा। औद्योगिक इकाई की परिभाषा के तहत निवेश की सीमा बढ़ा कर सूक्ष्म उद्योग के लिए एक करोड़ का निवेश और पांच करोड़ का कारोबार कर दिया है। वहीं लघु उद्योग के लिए निवेश की सीमा बढ़ा कर दस करोड़ रुपए और पचास करोड़ रुपए का कारोबार कर दिया गया है। मध्यम उद्योग के लिए बीस करोड़ रुपए निवेश और ढाई सौ करोड़ रुपए कारोबार की सीमा निर्धारित की गई है।

ऐसे में देश और दुनिया के अर्थविशेषज्ञों मानना है कि जो एमएसएमई देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, उनमें नई जान फूंक कर देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाया जा सकता है। एमएसएमई को पुनर्जीवित करने के लिए सरकार ने पिछले महीने घोषित व्यापक आर्थिक पैकेज में एमएसएमई क्षेत्र के लिए सौ से ज्यादा राहतों की घोषणा की थी।

उल्लेखनीय है कि नए राहत पैकेज के तहत केंद्र सरकार किसी भी विदेशी आपूर्तिकर्ता से दो सौ करोड़ रुपए से कम मूल्य की वस्तु एवं सेवाओं की खरीद नहीं करेगी। यह कदम इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इससे छोटे और मझौले उद्योगों की वस्तुओं व सेवाओं की नई मांग पैदा की जा सकेगी। इसी तरह निर्माण परियोजना को पूरा करने और पंजीकरण की समयावधि को छह महीने आगे बढ़ाए जाने से डवलपरों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है।

यह बात भी महत्त्वपूर्ण है कि विभिन्न कारणों से एमएसएमई के कई कर्ज एनपीए हो गए थे। ऐसे में उनके पास नकदी जुटाने का कोई रास्ता नहीं बचा था। बैंक एमएसएमई को कर्ज नहीं दे रहे थे। लेकिन अब नए पैकेज के तहत एनपीए वाले एमएसएमई को भी नया कर्ज मलने का रास्ता साफ हो गया है।

नए आर्थिक पैकेज में छोटे उद्योगों के उत्पादन को वैश्विक स्तर तक पहुंचाने के लिए जो संकल्पना की गई है, उससे स्थानीय एवं स्वदेशी उद्योगों को भारी प्रोत्साहन मिलेगा। इस पहल से सरकार के ह्यमेक इन इंडियाह्ण अभियान को एक नई ऊर्जा मिल सकती है। यह कोई छोटी बात नहीं है कि वैश्विक संकट में जब दुनिया की बड़ी-बड़ी अर्थव्यवस्थाएं ढह गई हैं, तब भी स्थानीय आपूर्ति व्यवस्था, स्थानीय विनिर्माण, स्थानीय बाजार देश के बहुत काम आए हैं।

यदि हम वर्तमान समय में वैश्विक ब्रांडों की ओर देखें तो पाएंगे कि वे भी कभी बिल्कुल स्थानीय ही थे। इसलिए कोरोना संकट में न सिर्फ हमें स्थानीय उत्पाद खरीदने हैं, बल्कि उनको हरसंभव तरीके से आगे बढ़ाना भी जरूरी है। हमें स्थानीय ब्रांडों और उत्पादों को अपनी अर्थव्यवस्था का आधार बनाने और उन्हें दुनिया भर में मशहूर करने की रणनीति पर आगे बढ़ना होगा।

हम मेक इन इंडिया अभियान को आगे बढ़ा कर स्थानीय उत्पादों को वैश्विक बना सकते हैं। आज दुनियाभर में विभिन्न वस्तुओं का उत्पादन करने वाली भारत की कई कंपनियां अपनी जबर्दस्त पहचान बनाए हुए हैं। यदि हम पेट्रोलियम उत्पाद और गूगल, फेसबुक जैसी टेक कंपनियों को छोड़ दें तो अधिकांश क्षेत्रों में हमारे स्थानीय उत्पाद वैश्विक उत्पादों का रूप ले सकते हैं और दुनिया के बाजारों में छा सकते हैं। इस समय दुनिया में दवाओं सहित कृषि, प्रसंस्कृत खाद्य, परिधान, जेम्स व ज्वैलरी, चमड़ा और इसके उत्पाद, कालीन और मशीनी उत्पाद जैसी कई वस्तुओं की भारी मांग है। इसलिए इन क्षेत्रों में दुनिया का बाजार अनंत संभावनाएं लिए हुए है।

पिछले दिनों देश में विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा किए शुरू किए गए श्रम सुधारों के तहत कई बातें एक जैसी दिखाई दे रही है। इसमें नई इकाइयों को श्रम कानूनों के अनुपालन में काफी छूट दी गई है। कारखाने का लाइसेंस लेने की शर्तों में भी ढील दी गई हैं। कारखाना अधिनियम 1948 और औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 के अधिकांश प्रावधान भी इन पर लागू नहीं होंगे। उत्पादन बढ़ाने के लिए कई राज्यों ने उत्पादन इकाइयों में काम के घंटों को आठ से बढ़ा कर बारह कर दिया है।

विभिन्न राज्य सरकारों ने नए श्रम कानूनों के परिप्रेक्ष्य में कर्मचारियों और नियोक्ताओं दोनों वर्गों के बीच उपयुक्त तालमेल बनाए रखने की शर्तें भी सुनिश्चित की हैं, ताकि नए श्रम सुधारों के बीच मजदूरों को पूरी तरह नियोक्ताओं की दया पर न रहना पड़े। आर्थिक गतिविधियों से जुड़े सभी पक्षों के हितों के बीच संतुलन साधने और उन्हें सुरक्षित रखने के उपाय भी सुनिश्चित किए गए हैं।

पूर्णबंदी और श्रमिकों के पलायन ने छोटे उद्योगों के समक्ष गंभीर चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। हालांकि सरकार ने एमएसएमई इकाइयों को बगैर किसी जमानत के आसान बैंक कर्ज सहित कई राहतों का एलान किया है, लेकिन अधिकांश बैंक कर्ज डूबने की आशंका के मद्देनजर कर्ज देने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। स्थिति यह है कि करीब सवा छह करोड़ इकाइयों में से आधी से अधिक इकाइयां उत्पादन शुरू भी नहीं कर पाई हैं। जिनमें काम शुरू हुआ है, वे भी काफी कम क्षमता के साथ परिचालन कर रही हैं। कच्चे माल की दिक्कतें उनके सामने खड़ी हैं और आपूर्ति शृंखला टूट गई है। मजदूरों की कम उपलब्धता के कारण कारखानों के सामने गंभीर संकट खड़ा हो गया है।

पहले ही सुस्त चल रही अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर एमएसएमई के आधार पर बढ़ाना कोई मामूली काम नहीं है। 30 मई को राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) के द्वारा जारी सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के आंकड़ों के अनुसार पिछले वित्त वर्ष 2019-20 में देश की विकास दर 4.2 फीसदी के साथ ग्यारह वर्ष के निचले स्तर दर्ज की गई। इस तरह जहां कोविड-19 से पहले ही अर्थव्यवस्था की गति सुस्त रही, वहीं अब प्रमुख वैश्विक संगठनों और कई अर्थविशेषज्ञों ने अनुमान लगाया है कि कोविड-19 की चुनौतियों के बीच वित्त वर्ष 2020-21 में वृद्धि दर ऋणात्मक रहेगी। लेकिन अब उम्मीद की जा रही है कि सरकार के नए आर्थिक पैकेज से छोटे उद्योग अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाएंगे। ऐसे में यह अत्यधिक जरूरी है कि सबसे पहले सरकार एमएसएमई के लिए हाल ही में घोषित की गई राहत योजनाओं पर तेजी से अमल करे।

खासतौर से बैंकों को स्पष्ट निर्देश दिए जाने चाहिए कि वे बिना डरे, बिना जमानत के कर्ज देने की शुरूआत करें, क्योंकि एमएसएमई को दिए जाने वाले कर्ज की जमानतदार स्वयं सरकार है। इस वक्त एमएसएमई को सर्वोच्च प्राथमिकता देकर उन्हें सक्षम बनाने की जरूरत है। आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत सरकार ने एमएसएमई में जान फूंकने के लिए जो अभूतपूर्व घोषणाएं की है, उनका कारगर क्रियान्वयन देश के एमएसएमई के लिए संजीवनी का काम करेगा।

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