half of the country’ economy is from this unorganized sector – राजनीतिः संकट में श्रम-बल

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संजय ठाकुर

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आइएलओ) की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्तमान परिस्थितियों में भारत में अनौपचारिक क्षेत्र के लगभग चालीस करोड़ कामगार गरीबी में और गरीबी में चले जाएंगे। हालांकि देश में इस समस्या के समाधान की क्षमता है, जैसा कि वर्ष 1998 के एशियाई आर्थिक संकट, वर्ष 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट और वर्ष 2016 की नोटबंदी के बाद शुरू हुई मंदी और अन्य विभिन्न अवसरों पर देखा भी गया है। लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में उभरे संकट से पार पाने के लिए प्रभावी कदम उठाने होंगे। कामगारों की वर्तमान स्थिति को देखते हुए तत्काल राष्ट्रीय कामगार नीति बनाने पर विचार करने की जरूरत है। इस वक्त सरकार के समक्ष आर्थिक गतिविधियों को सामान्य बनाने, रोजगार-सृजन और आजीविका-सुरक्षा प्रदान करने जैसी चुनौतियां तो हैं ही, साथ सामाजिक सुरक्षा और चिकित्सा-सहायता जैसे संकटों से निपटना है।

यह विडंबना ही है कि आर्थिक उन्नति का आधार होते हुए भी कामगार उपेक्षित हैं। देश का सारा औद्योगिक विकास, कृषि, व्यापार और निर्माण-कार्य श्रमिकों पर ही टिका है। लेकिन दुख की बात यह है कि देश के विकास का इतना महत्त्वपूर्ण अंग होते हुए भी श्रमिक वर्ग उपेक्षित ही नहीं, बल्कि बहुत कम मजदूरी पर काम करते हुए मुश्किल परिस्थितियों में जीवन-यापन करने को मजबूर है। देश को अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अग्रिम पंक्ति में लाने में इन कामगारों का बड़ा योगदान है। इसलिए उद्योग जगत की रीढ़ माने जाने वाले श्रमिक तबके के हितों की रक्षा करना सरकार, प्रशासन और समाज का दायित्व हो जाता है।

कामगारों की बहुत बड़ी संख्या असंगठित क्षेत्र के कामगारों की है, जिसमें देश के नब्बे प्रतिशत से ज्यादा कामगार आते हैं। देश की अर्थव्यवस्था में लगभग आधी हिस्सेदारी इसी असंगठित क्षेत्र की है। गैर-कृषि क्षेत्र में लगभग छब्बीस करोड़ कामगार हैं। सेवाओं, विनिर्माण और गैर-विनिर्माण क्षेत्रों में अनौपचारिक कामगारों की संख्या लगभग इक्कीस करोड़ सत्तर लाख है। बिजली, पानी, गैस, निर्माण और खनन के क्षेत्र में लगभग पांच करोड़ नब्बे लाख कामगार हैं। विनिर्माण-क्षेत्र पांच करोड़ चौंसठ लाख कामगारों को रोजगार देता है। इनमें से कपड़ा और परिधान क्षेत्र में लगभग एक करोड़ अस्सी लाख कामगार आते हैं। खुदरा-व्यापार में तीन करोड़ सत्तर लाख से ज्यादा कामगारों को रोजगार मला है। पुष्प-उद्योग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लगभग एक करोड़ कामगारों को रोजगार देता है। देश के सभी कामगारों में से आधे से ज्यादा बिना अनुबंध के ही काम करते हैं। इसके अलावा सफाई-कर्मचारी, खेतिहर मजदूर, बढ़ई, लोहार, दर्जी, पशुपालक, रिक्शा-चालक आदि कुछ ऐसे कामगार हैं जिनके बिना सामाजिक निर्वहन मुश्किल है। सूती वस्त्र उद्?योग, हथकरघा उद्योग, चीनी उद्?योग, लौह एवं इस्पात उद्?योग, सीमेंट उद्?योग जैसे बड़े क्षेत्र इन्हीं कामगारों पर निर्भर हैं।

काम की खोज में कामगारों का गांवों से नगरों और महानगरों की ओर पलायन होता रहा है। अगर बड़े उद्योगों का देश के ग्रामीण इलाकों में भी विस्तार होता तो काम की तलाश में लोगों को महानगरों की ओर नहीं भागना पड़ता। गांवों में रोजगार के अवसर पैदा करने, ग्रामीण लोगों का जीवन-स्तर सुधारने और उन्हें आर्थिक सुरक्षा प्रदान करने की दिशा में कोई उल्लेखनीय प्रयास हुए हों, ऐसा नजर नहीं आता। गांवों में आय का सबसे बड़ा साधन कृषि है, लेकिन यह क्षेत्र हमेशा उपेक्षित रहा। यही कारण रहा कि किसान और गांवों की हालत में कोई क्रांतिकारी बदलाव नहीं आया। देश में किसानों की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। किसानों को दिल्ली, मुंबई जैसे महानगरों और पंजाब, पश्चिम बंगाल, गुजरात व आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में जाकर मजदूरी करने को मजबूर होना पड़ता है। यह क्रम वर्षों से चल रहा है।

वर्तमान समय में देश में करोड़ों कामगार संकट में हैं। कामगारों के संबंध में देश की कोई भी सशक्त नीति नहीं होने की वजह से इनके पास कोई आर्थिक सुरक्षा नहीं है। सामाजिक सुरक्षा और बीमा जैसी सुविधा न होने से आय के साधन छिन जाने पर इनके पास जीवन-यापन का कोई विकल्प ही नहीं बचता और ये पूरी तरह असुरक्षा की स्थिति में आ जाते हैं। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण और श्रम बल सर्वेक्षण के आंकड़ों से भी इस बात की पुष्टि होती है कि वर्तमान समय में करोड़ों कामगारों पर सीधा संकट है, जिससे इनके सामने अस्तित्व को बचाए रखने की चुनौती खड़ी हो गई है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में देखें तो करोड़ों ऐसे कामगार हैं जिनका रोजगार छिन गया है और वे अपने गांवों की ओर पलायन करने को मजबूर हुए हैं। ये कामगार रोजगार की तलाश में कभी अपने गांवों से नगरों और महानगरों की ओर पलायन करने को मजबूर हुए थे। लेकिन मौजूदा हालात ने इन्हें घर वापस जाने के लिए मजबूर कर दिया है।

कामगारों का यह संकट यहीं तक सीमित नहीं है, बल्कि इनके लिए आने वाले दिन और भी मुश्किल भरे हो सकते हैं। घटती मांग और आपूर्ति की कमी के कारण विकास दर पर पड़ा बुरा प्रभाव रोजगार-सृजन को मुश्किल बनाने के साथ-साथ वर्तमान समय में काम कर रहे कामगारों के रोजगार को भी प्रभावित करेगा। ये गैर-पंजीकृत छोटे व्यवसायों और पंजीकृत छोटी कंपनियों में काम करने वाले ऐसे कामगार हैं जिनके पास लिखित अनुबंध तक नहीं है। जिन बड़े व्यवसायों और बड़ी कंपनियों में काम कर रहे कामगारों के पास लिखित अनुबंध है उनमें भी पांच करोड़ से ज्यादा कामगार ऐसे हैं जिनके पास एक वर्ष से भी कम अवधि का अनुबंध है। इसके अलावा दैनिक वेतन भोगी भी प्रभावित होंगे जो आर्थिक संकट के नाम पर छंटनी का शिकार हो रहे हैं। इस तरह यह महामारी नौकरियों के संकट को बढ़ाएगी।

वर्तमान परिस्थितियों में उद्योगों पर पड़ा बुरा प्रभाव सीधे तौर पर कामगारों से जुड़ा है। आधे से ज्यादा उद्योग बंद होने के कगार पर पहुंच गए हैं। अगर ये बंद होते हैं तो बहुत-सी नौकरियां खतरे में पड़ जाएंगी। एक मोटे अनुमान के मुताबिक दो करोड़ से ज्यादा नौकरियां प्रभावित होने का खतरा भारतीय उद्योग जगत पर मंडरा रहा है। खाद्य उत्पाद, कपड़ा, धातु, रबड़, प्लास्टिक, इलेक्ट्रॉनिक्स, सीमेंट और पूंजीगत सामान के विनिर्माण क्षेत्र में लगभग नौ करोड़ नौकरियों को कम किया जा सकता है। इसी तरह आॅटोमोबाइल उद्योग में भी एक लाख और विमानन उद्योग में लगभग छह लाख नौकरियां खतरे में हैं।

कामगारों की दशा सुधारने, रोजगार सुनिश्चित करने, सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और समाज-कल्याण के लिए बड़े पैमाने पर निवेश करने की जरूरत है। कामगारों को प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) के माध्यम से सहायता पहुंचाई जा सकती है। हालांकि केंद्र और विभिन्न राज्य सरकारें श्रमिकों के लिए कल्याणकारी योजनाएं चला तो रही हैं, पर वे वक्त की जरूरत पर कारगर साबित नहीं हो रहीं। मनरेगा ने ग्रामीण क्षेत्रों में कामगारों को रोजगार उपलब्ध करवाने में बड़ी भूमिका निभाई थी। आरंभिक चरण में इस कार्यक्रम से ग्रामीण क्षेत्रों में कामगारों की आर्थिक स्थिति में कुछ सुधार निश्चित रूप से आया था और उस दौरान ग्रामीण क्षेत्रों से कामगारों के पलायन में भी भारी कमी आई थी। आज जरूरत है इस योजना को और प्रभावकारी तरीके से लागू करने की, ताकि बड़ी संख्या में खाली बैठे लोगों को रोजगार मिल सके। देश के सर्वोच्च न्यायालय ने भी हाल में कामगारों के पलायन और उनकी दशा पर चिंता जताई है। वर्तमान परिस्थितियों से उपजे इस संकट को व्यवस्था के ढांचे की कमजोरियों के रूप में देखा जाना चाहिए। अगर वक्त रहते राष्ट्रीय कामगार नीति बनी होती तो प्रवासी कामगारों को आज बड़े संकट से बचाया जा सकता था।

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