life cannot be imagined without Nature water, forest and land Man’s life possible only water, forest, land – राजनीति: प्रकृति बची तो बचेगी दुनिया

0
66
.

भावना मासीवाल
प्रकृति जीवन है। इसके बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है। प्रकृति है तो जल, जंगल और जमीन है। जल, जंगल, जमीन है तभी मनुष्य का जीवन संभव है। प्रकृति ही है जो अनगिनत जीव-जंतुओं, पेड़-पौधों, विभिन्न संसाधनों, जैविक-अजैविक घटकों का पोषण करती है। वही है जो इन सभी में खुद को अधिक शक्तिशाली समझने वाले मनुष्य को हवा, जल, भोजन आदि देती है। प्रकृति पर आश्रित होना ही मनुष्य को उसके खुद को सर्वशक्तिशाली समझने के अहसास को कम करती है।

क्या कभी हमने सोचा है कि जिसने हमें जीवन दिया, प्राण वायु के लिए स्वच्छ हवा, पीने के लिए स्वच्छ जल का आधार नदियां, भोजन और आवास के लिए जंगल और फलों, अनाजों और फसलों का स्वामी बनाया, जीवन को जीने के लिए सभी आवश्यक वस्तुएं प्रदान की, उसे बदले में हमने क्या दिया? सिर्फ अपनी आवश्यकता, शौक और शक्ति प्रदर्शन के लिए वनों को काट डाला, नदी का रुख बदल दिया। हवा जो इस चराचर जगत की जीवनदायनी और प्राण है, उसे विषैला बना दिया, संसाधनों का अंधाधुंध प्रयोग करते हुए प्रकृति में असंतुलन की स्थिति को जन्म दिया। क्या कभी मनुष्य ने इस पर विचार किया कि प्रकृति ने उसे जो अनमोल धरोहर प्रदान की है उसकी इतनी दयनीय हालत क्यों है?

वह तो लालसाओं की होड़ में इस कदर अंधा होकर दौड़ रहा है कि पीछे मुड़ कर अपनी जीवनदायिनी प्रकृति को देखना तक नहीं चाहता है। वह भूल गया है कि जल, हवा, नदी, पहाड़, पठार, जंगल आदि प्राकृतिक तत्त्वों से ही उसका अस्तित्व है। इन सबके अभाव में जीवन की कल्पना करना भी असंभव है। मनुष्य भली-भांति इस बात से परिचित है कि पृथ्वी के अतिरिक्त कहीं भी जीवन संभव नहीं है। फिर भी वह लगातार इसकी संभावनाएं तलाश रहा है। मनुष्य की चंद्रमा से लेकर अन्य ग्रहों पर जीवन की तलाश करना इसका प्रमाण है। वह जानता है कि प्रकृति के विविध संसाधनों का उसने अपनी आवश्यकता से अधिक अंधाधुंध उपभोग किया है, जिसके कारण प्रकृति में असंतुलन की स्थिति पैदा हो गई है। मनुष्य की इसी उपभोग की नीति ने प्रकृति को विनाश के छोर पर लाकर खड़ा कर दिया है।

प्रकृति में असंतुलन के कारण सामाजिक परिदृश्य भी बहुत तेजी से बदल रहा है। गांव कस्बों में बदल रहे हैं, अनावृष्टि और अतिवृष्टि से खेतों की फसल नष्ट हो रही है, किसान अब किसानी छोड़ कर मजदूर बनने पर मजबूर हो रहे हैं। यह सब प्रकृति में बदलाव के कारण भी हो रहा है। मगर मनुष्य कहां अपनी खामियों को स्वीकार करता है! वह गांव से अधिक शहरों का हिमायती है। उसके लिए विकास का नाम शहर है। इसी कारण गांव नष्ट हो रहे हैं। हम विकास में गांवो को साथ लेकर चलने की अपेक्षा गांव को शहर बनाना चाहते हैं। अब तक प्रकृति से मनुष्य का तादात्म्य बनाए रखने वाले गांव भी अब शहर की तरह सीमेंट की बहुमंजिला इमारतों में बदल रहे हैं और प्रकृति का सान्निध्य छोड़ वे भी विकास की अंधी दौड़ का हिस्सा बन रहे हैं।

इसे गांव की मजबूरी भी कहा जा सकता है, क्योंकि वे भी आधुनिक कहे जाने वाले संसाधनों के साथ जीना चाहते हैं। जिसके कारण एक तरफ शहरों की ओर पलायन बढ़ा है तो दूसरी तरफ गांव अब शहर में तब्दील होने लगे हैं। गांवों से शहरों की ओर बढ़ता पलायन स्थानीयता की नीति के अभाव से उपजा है। वर्तमान समय में बुनियादी सुविधाओं और रोजगार का अभाव पलायन का मुख्य कारण बन कर उभर रहा है। संकट के इस दौर में बड़ी संख्या में मजदूरों का मजबूर होकर शहरों से गांव वापस लौटना इसी पलायन की त्रासदी का हिस्सा है।

जहां शहरों ने उनके श्रम की अवहेलना और उनका अवमूल्यन कर उन्हें वापस गांव जाने पर मजबूर कर दिया। पूंजीवादी नीतियों में गांव के गांव उजाड़ कर उन्हें औद्योगिक क्षेत्र में परिवर्तित कर दिया गया। विकास के नाम पर धरती का ज्यादातर हिस्सा सीमेंट से पाट दिया गया। नदियां नाले का रूप लेकर सूख रही हैं। इसका भयानक प्रभाव बदलते पर्यावरण पर देखा जा सकता है।

आज देश ही नहीं, बल्कि दुनिया के हर कोने में जल, जंगल और जमीन को बचाने का संघर्ष चल रहा हैं। यह जनता की सामाजिक, सांस्कृतिक और सामुदायिक धरोहर है। अफसोस की बात है कि ये वैश्विक पूंजीवादी अर्थव्यवस्था को संचालित करने वाली ताकतों के हाथों में हैं, जो निजी हितों के लिए इनका दुरुपयोग कर रही हैं। वैश्विक अर्थव्यवस्था और आधुनिक सभ्यता ने एक गंभीर संकट को जन्म दिया है, जिससे पूरी दुनिया सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संकटों से जूझ रही है।

आधुनिक विकास नीतियों ने पूंजी के संरक्षण को बढ़ावा दिया; पूंजी के संरक्षण ने उपनिवेशवादी नीतियों को बढ़ावा दिया। इसी ने प्राकृतिक संपदा पर अधिकार के प्रश्न को बढ़ावा दिया। फिर प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार और स्वामित्व के इसी प्रश्न ने हिंसा को वैश्विक धरातल पर शक्ति का सबसे बड़ा हथियार बना दिया। आज विकसित राष्ट्रों का शक्ति के बल पर विकासशील और कमजोर राष्ट्रों पर अतिक्रमण कर उनकी प्राकृतिक संपदा पर स्वामित्व स्थापित करने की बढ़ती अधिकार नीति इसी का परिणाम है।

फिर चाहे वह यूरोप की ‘गुआनों’ की खास जरूरत हो, जिसमें उस पर कब्जे की राजनीति को अपनाते हुए उसके उर्वरक के प्राकृतिक संसाधनों का उपभोग अपने हित में करना हो या ‘क्योटो प्रोटोकॉल’ का समझौता हो, जिसके तहत विकासशील देशों पर कार्बन के उत्सर्जन को कम करने का दबाव डाला गया। दूसरी तरफ विकसित राष्ट्रों द्वारा कोई स्वीकृति नहीं देना या तेल के संसाधनों पर आधिपत्य को लेकर विकसित राष्ट्रों की नूरा-कुश्ती आदि इन बातों का प्रमाण है। इसके पीछे के कारण जो भी हो परंतु हिंसा उस पर अधिकार का प्रमुख शस्त्र है।

इसी तरह नदियों पर स्वामित्व का प्रश्न, फिर चाहे वह चीन और भारत के मध्य ब्रह्मपुत्र नदी पर बिजली परियोजना का विवाद हो या पाकिस्तान और भारत के मध्य झेलम नदी विवाद। ये सभी मुद्दे आज प्रकृति पर स्वामित्व के प्रश्न को उजागर करते हैं। प्रकृति पर मनुष्य की निर्भरता और अधिक से अधिक उपभोग की लालसा ने अधिकार को बढ़ावा दिया है। अधिकार सुख ने शस्त्रों के निर्माण और सैन्यकरण की नीतियों को जन्म दिया और हिंसा को बढ़ावा दिया है। आज राष्ट्रों के बीच शक्ति केंद्रीकरण की होड़ और अधिक से अधिक शस्त्रों का निर्माण खुद को शक्तिशाली सिद्ध करने की प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दे रहा है।

प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध का दंश झेलने के बाद भी आए दिन किसी न किसी राष्ट्र द्वारा शस्त्र निर्माण और परीक्षण की खबर देखी और सुनी जाती है। इन सबके केंद्र में सीमाओं का विवाद, नदियों पर आधिपत्य, जंगलों पर अधिकरण, प्राकृतिक संसाधनों पर स्वामित्व की मानसिकता है जो तीसरे विश्वयुद्ध की संभावनाओं को जन्म दे रही है। मनुष्य की उपभोगवादी मानसिकता प्रकृति पर दबाव डाल रही है और उस पर अतिक्रमण को बढ़ावा दे रही है।

प्रकृति पर अतिक्रमण केवल उसके संसाधनों पर स्वामित्व से ही नहीं बढ़ा, बल्कि आधुनिक तकनीक ने भी उसे नुकसान पहुंचाया है। मोबाइल फोन, कंप्यूटर और अत्याधुनिक तकनीकों से निकलने वाले रेडिएशन ने प्रकृति के जीव-जंतुओं, पक्षियों के घरौंदों को नष्ट कर दिया है। रेडिएशन के प्रभाव से कितने मर चुके हैं, कितने इसके प्रभाव से प्रजनन क्षमता खो चुके हैं, हर साल कितने ही जीव-जंतु, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे लुप्त होते जा रहे हैं, इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है। जो जीवित हैं, वे भी तभी तक जीवित हैं, जब तक प्रकृति उनका संरक्षण कर रही है।

दरअसल, प्रकृति ही है जो अपने भीतर इतनी विविधताओं को जीवित रख सकती है। अगर प्रकृति नष्ट हो जाएगी तो विविधताओं से भरा हुआ यह खूबसूरत जीवन भी नष्ट हो जाएगा। जैव विविधताओं से भरी इस पृथ्वी में प्रत्येक जीव का प्रकृति को बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण योगदान है। यह एक प्रकार का संतुलन चक्र है। अगर यह बिगड़ता या टूटता है तो मनुष्य जीवन भी नष्ट हो जाएगा। ऐसे में आवश्यक है कि मनुष्य प्रकृति के साथ तादात्म्य बना कर आगे बढ़े। वह विकास की अंधी दौड़ का हिस्सा बनने की अपेक्षा प्रकृति के साथ विकास की नई नीतियों का निर्माण करे, ताकि मनुष्य के साथ ही प्रकृति के भीतर रहने वाले सभी प्राणी भी विकास में उसके सहयोगी बन सकें।

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App। में रुचि है तो




सबसे ज्‍यादा पढ़ी गई




Source link

Authors

.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here