Preparations are necessary to deal with the problem of earthquake in India in the midst of corona virus epidemic calamity

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अभिषेक कुमार सिंह
कोरोना के संकटकालीन दौर के दो-ढाई महीने के अंतराल में दिल्ली और एनसीआर कहलाने वाले उसके आसपास के इलाकों में एक दर्जन से ज्यादा बार भूकम्प के हल्के झटके आ चुके हैं। इसी दौरान दिल्ली-एनसीआर के अलावा रिक्टर पैमाने पर चार या इससे कुछ अधिक तीव्रता के भूकम्प गुजरात से लेकर जम्मू और झारखंड व कर्नाटक तक में आ चुके हैं। भूकम्प हो या फिर कोरोना विषाणु का संक्रमण, आपदाओं के बारे में सभ्यता का अनुभव कहता है कि ये अक्सर बिना चेतावनी के आती हैं।

ऐसी स्थिति में हमें इनसे निपटने की तैयारी करने का कोई मौका नहीं मिलता है, इस कारण इन आपदाओं की मारक क्षमता बढ़ जाती है। बीते दो-ढाई महीने के दौरान आए भूकम्प के झटकों से मन में कई सवाल पैदा होते हैं। पहला तो यही कि कहीं हम किसी बड़े भूकम्प का इंतजार तो नहीं कर रहे हैं। अगर ऐसी कोई आशंका है, तो भूकम्प से बचाव के लिए तैयारियों के सवाल भी लगातार खड़े होते हैं।

दिल्ली-एनसीआर और उत्तर भारत की जमीन के गहरी परतों से गुजरने वाले भूकम्पीय क्षेत्र का हवाला देकर भूगर्भवेत्ता कई बार यह आश्वस्ति दे चुके हैं कि हल्की-फुल्की जमीनी हलचलों से बड़े भूकम्प की आशंका खत्म हो जाती है। पिछले दो साल में दिल्ली और उसके आसपास के इलाकों में करीब दो सौ से ज्यादा बार भूकम्प के हल्के झटके आ चुके हैं।

इस आधार पर राष्ट्रीय भूकम्प विज्ञान केंद्र के विज्ञानियों का मत है कि छोटे स्तर के ये भूकम्प धरती में जमा ऊर्जा को बाहर निकाल फेंकते रहे हैं, इसलिए बड़े जलजले का खतरा नहीं के बराबर रह जाता है। लेकिन इससे पहले दो महीने के अंतराल में दिल्ली-एनसीआर की धरती इतनी ज्यादा बार कभी नहीं कांपी। इसलिए बार-बार यह सवाल परेशान कर रहा है कि कहीं ऐसा तो नहीं है कि इस साल 12 अप्रैल से लगातार लौटते छोटे भूकम्प किसी बड़े संकट का इशारा हों और ऐसे में इनकी अनदेखी भारी पड़ जाए।

भूकम्प की तीव्रता के हिसाब के पांच हिस्सों (जोन) में बंटे भारत के नक्शे में दिल्ली-एनसीआर का इलाका जोन-चार में आता है। बड़े भूकम्प की सर्वाधिक आशंका जोन-पांच में होती है, जिसमें पूरा पूर्वोत्तर भारत, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर का कुछ इलाका, गुजरात का भुज क्षेत्र और अंडमान-निकोबार सर्वाधिक खतरे वाले जोन-पांच में आते हैं। इसके बाद जोन-चार जम्मू-कश्मीर, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली, उत्तर प्रदेश व बिहार के कुछ इलाके और सिक्किम तक फैला हुआ है।

तीसरी श्रेणी में कुछ कम जोखिम वाले क्षेत्र हैं जिनमें उत्तर प्रदेश के कुछ इलाके, बिहार, बंगाल, मध्य प्रदेश के कुछ इलाके, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान व केरल के आंशिक इलाके आते हैं। शेष भारत सबसे कम खतरे वाले रिस्क जोन-दो में आता है। इस दृष्टि से देखें तो देश की राजधानी का यह क्षेत्र बड़े जलजले के खतरे से सिर्फ एक पैरामीटर नीचे है। यही वजह है कि आइआइटी- कानपुर, आइआइटी धनबाद के अनुप्रयोग भूभौतिकी और भूकम्प विज्ञान विभाग और राष्ट्रीय भूकम्प विज्ञान केंद्र से जुड़े रहे भूगर्भवेत्ता हल्के झटकों को एक अहम चेतावनी की तरह देखने की बात कह रहे हैं।

इन विशेषज्ञों के मुताबिक इसके कई कारण हैं जिनके आधार पर छोटे-छोटे भूकम्पीय झटकों को बड़े भूकम्प की आहट माना जा सकता है। अव्वल तो यही कि यह इलाका भूकम्प की दृष्टि से ‘गंभीर’ या संवेदनशील माने जाने वाले जोन-चार में आता है। दूसरा, यह क्षेत्र बड़े भूकम्पों को झेल चुके इलाकों से ज्यादा दूर नहीं है। दिल्ली-एनसीआर हिमाचल के कांगड़ा से तीन सौ सत्तर किलोमीटर और उत्तरकाशी से दो सौ साठ किलोमीटर की दूरी पर है।

ये दोनों ही जगह बड़े भूकम्प के लिए जानी जाती हैं। कश्मीर से अरुणाचल प्रदेश तक जाने वाली हिमालय पर्वत शृंखला में मौजूद सक्रिय भूकम्पीय पट्टी से दो सौ अस्सी से तीन सौ पचास किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह इलाका बड़ी भूगर्भीय हलचलों के नजरिए से ज्यादा दूर नहीं है। ऐसे में यदि हिमालय में कोई बड़ी हलचल होती है तो उसका बड़ा असर दिल्ली से लेकर बिहार तक हो सकता है।

आपदा प्रबंधन विशेषज्ञों ने हिमालयी इलाके में 8.2 या इससे भी अधिक की तीव्रता वाले भूकम्प का अनुमान जताया है, जिसे एक बड़ी चेतावनी के तौर पर देखा जा रहा है। विशेषज्ञों ने इसके पीछे नेपाल में 7.3 तीव्रता (2015 में) और वर्ष 2011 में सिक्किम में आए 6.9 तीव्रता के भूकम्पों के बीच एक कड़ी की मौजूदगी को वजह माना है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि इन भूकम्पों के कारण इस इलाके की भूगर्भीय प्लेटों में उथल-पुथल हो गई है। पहले के झटकों के दौरान इनमें दरारें आ गई थीं, लेकिन हाल के भूकम्पों के कारण ये दरारें और चौड़ी हो गई हैं। इससे धरती के भीतर की ऊर्जा दरारों के जरिए बाहर निकल सकती है, जो बड़े भूकम्प का कारण बनेगी। यह सिर्फ एक आशंका भर नहीं है, क्योंकि वर्ष 2015 में नेपाल में आए भूकम्प के बाद राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान (एनआईडीएम) के विशेषज्ञों ने चेतावनी दी थी कि पूरे पूर्वोत्तर क्षेत्र में भूकम्प का खतरा बढ़ गया है, क्योंकि नेपाल, भूटान, म्यांमार और भारत की भूगर्भीय प्लेटें आपस में जुड़ी हुई हैं। यह भूकम्प पूर्वोत्तर से लेकर बिहार, यूपी, दिल्ली और उत्तराखंड के कई इलाकों को प्रभावित करने की स्थिति में हो सकता है।

यह तो सही है कि अभी तक हुई वैज्ञानिक तरक्की भूकम्प, समुद्री तूफान, बाढ़, ज्वालामुखी विस्फोट जैसी आपदाओं पर लगाम नहीं लगा पाई है, लेकिन सर्वाधिक गंभीर बात यह है कि अमीर-गरीब की खाई इन आपदाओं के वक्त और गहरी होकर नजर आती है। विकसित देश भी प्राकृतिक आपदाओं को रोक भले न पाते हों, पर इतना निश्चित है कि भूकम्प जैसी त्रासदी से भी उनका ज्यादा कुछ नहीं बिगड़ता, क्योंकि उनका आपदा प्रबंधन काफी मजबूत और सुव्यवस्थित होता है।

भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, नेपाल की तरह बड़े भूकम्प जापान, अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया में भी आते हैं, लेकिन वहां ऐसे विनाश के समाचार नहीं मिलते हैं। जापान तो भूकम्प से सबसे ज्यादा पीड़ित देशों में है, लेकिन हादसों की बारंबारता से सबक लेकर वहां न केवल मजबूत और भूकम्परोधी बुनियादी ढांचा खड़ा किया गया है, बल्कि समय-समय पर लोगों को प्राकृतिक आपदाओं के वक्त किए जाने वाले उपायों की जानकारी भी असरदार तरीके से दी जाती है।

इसके बरक्स नेपाल, भारत, पाकिस्तान जैसे देशों को देखें, तो यहां आज भी पुरानी जर्जर इमारतों में लाखों लोग भूकम्प की परवाह किए बगैर रह रहे हैं। यही नहीं, नई बन रही इमारतों में भी आग व भूकम्प से बचाव के नियम-कायदों की सतत अनदेखी हो रही है। देश में शहरीकरण के नाम पर जैसा अनियोजित और अनियंत्रित विकास हो रहा है, वह एक गंभीर मर्ज बन चुका है।

भारत में ज्यादातर मौकों पर ऐसे संकटों से बचाव का कोई ठोस जतन करने की बजाय क्षति हो जाने के बाद की स्थितियों से जूझने में ही अधिक दिलचस्पी ली जाती है। कायदे से तो गुजरात के भुज और उत्तरकाशी जैसे अनुभवों के बाद भूकम्प से पूर्णतया सुरक्षित इमारतों के निर्माण की ठोस पहल होनी चाहिए थी, पर वह भी तकरीबन सिरे से नदारद है।

अलबत्ता खानापूर्ति करते हुए शहरी नियोजकों, बिल्डरों और आम लोगों को जागरूक करने के लिए केंद्र सरकार के आदेश पर डिजिटल एक्टिव फॉल्ट मैप एटलस जरूर तैयार कर लिया गया है। इसमें सक्रिय फॉल्टलाइन की पहचान के अलावा पुराने भूकम्पों का लेखाजोखा है, जिससे लोगों को पता चल सके कि वे भूकम्प की फॉल्ट लाइन के कितना करीब हैं और नए निर्माण में सावधानियां बरती जाए। लेकिन सवाल है कि क्या इस एटलस की जानकारी आम लोगों को है।

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