US invited India in Group-7 meeting as special invited China upset on this development – जी-7 का बदलता रूप और चुनौतियां

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ब्रह्मदीप अलूने
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी किताब- द आर्ट ऑफ द डील में लिखा है कि मुझे बड़ा सोचना पसंद है और मैं हमेशा ऐसा ही करता हूं। दरअसल, ट्रंप ने दुनिया के सबसे अमीर देशों के संगठन जी-7 में भारत, रूस, दक्षिण कोरिया और आॅस्ट्रेलिया को शामिल करने की बात कह कर वैश्विक राजनीति का रुख अमेरिका की ओर मोड़ दिया है। यह भी बेहद दिलचस्प है कि ट्रंप ने जी-7 के भविष्य को लेकर बाकी सदस्यों से अभी कोई निर्णायक बात नहीं की है।

दुनियाभर में कोरोनाविषाणु फैलने के बाद अमेरिका चीन से बहुत नाराज है और ट्रंप चीन को सबक सिखाने के लिए उस पर कड़े प्रतिबंध लगाने की ओर अग्रसर हैं। जी-7 को लेकर ट्रंप की योजना में चीन को लेकर उनकी आक्रामकता प्रतिबिंबित हो रही है। हाल में अमेरिकी राष्ट्रपति ने जी-7 के भविष्य को लेकर साफ कहा कि ‘आज दुनिया में जो कुछ हो रहा है, मुझे नहीं लगता कि जी-7 उसका वाजिब तरीके से प्रतिनिधित्व करता है। ये देशों का एक पुराना पड़ गया समूह बन गया है।’ राष्ट्रपति ट्रंप ने समूह सात की बैठक को जी-10 या जी-11 कह कर संबोधित किया।

अमेरिका, फ्रांस, इटली, कनाडा, जर्मनी, जापान और इंग्लैंड समूह-सात के सदस्य राष्ट्र हैं, जो स्वतंत्रता, समानता, लोकतंत्र और मानवाधिकारों की रक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का इजहार करते रहे हैं। शुरुआत में यह छह देशों का समूह था, जिसकी पहली बैठक 1975 में हुई थी। इस बैठक में वैश्विक आर्थिक संकट के संभावित समाधानों पर विचार किया गया था। तब से यह संगठन बदलावों के साथ लगातार काम कर रहा है। लेकिन साल 2016 में ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद आपसी संबंधों को लेकर यह संगठन ज्यादा चर्चा में रहा है।

समूह सात के सदस्य फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा मितरां ने एक बार कहा था कि कोई भी राष्ट्र यह दावा नहीं कर सकता कि आज से वह समूचे विश्व के बारे में फैसला करेगा, लेकिन ट्रंप को इन बातों से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। इसका प्रदर्शन वे सिसली में कर चुके हैं। साल 2017 में इटली के शहर सिसली में आयोजित जी-7 देशों के शिखर सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन पर एक साझा घोषणापत्र जारी करने की कोशिश को तब झटका लगा था, जब ट्रंप ने 2015 में पेरिस में जलवायु परिवर्तन पर हुई संधि को लागू करने से साफ मना कर दिया था और वे प्रेस वार्ता छोड़ कर चले गए थे। जी-7 के छह देश तो तैयार थे, मगर अमेरिका अलग-थलग पड़ गया था।

जाहिर है, कई मामलों पर दुनिया के सबसे अमीर देशों के संगठन जी-7 के वैश्विक व्यवहार को दो भागों में समझा जा सकता है, जिसमें एक ओर जी-6 यानी कनाडा, जापान, ब्रिटेन, फ्रÞांस, जर्मनी और इटली हैं और दूसरी ओर जी-1 यानी सिर्फ अमेरिका।

शिखर सम्मेलन में ईरान को लेकर ट्रंप की नाराजगी भी देखी जा चुकी है। फ्रांस के बियारिज में जी-7 सम्मेलन में ईरान के विदेश मंत्री अप्रत्याशित रूप से शरीक होने पहुंचे थे। ऐसा फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की पहल पर हुआ था। मैक्रों ने ईरान के साथ हुए परमाणु समझौते को जिंदा रखने की कोशिश के लिए ऐसा किया था। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ईरान के साथ परमाणु करार तोड़ने की एकतरफा घोषणा के बाद फ्रांस का यह कदम अमेरिका को चुनौती देने वाला था।

ईरान संकट पर फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों चाह रहे थे कि परमाणु करार टूटे नहीं। इस मुद्दे पर मैक्रों को जर्मनी और ब्रिटेन का भी समर्थन हासिल था। कनाडा में हुए शिखर सम्मेलन में ट्रंप ने बाकी देशों पर यह आरोप लगा कर सनसनी फैला दी थी कि दूसरे देश अमेरिका पर भारी आयात शुल्क लगा रहे हैं। पर्यावरण के मुद्दे पर भी उनका सदस्य देशों के साथ मतभेद था। ट्रंप ने जी-7 की साझा प्रेस वार्ता में शामिल होने से इंकार करते हुए कनाडा की आलोचना की थी। अमेरिकी राष्ट्रपति ने आरोप लगाया था कि कनाडा उनके किसानों, कामगारों और कंपनियों पर भारी टैक्स लगा रहा है। ट्रंप ने इसके जवाब में आॅटोमोबाइल पर आयात शुल्क लगाने की चेतावनी दी थी।
ट्रंप जी-7 को लेकर मुखर रहे हैं और सदस्य देशों से उनके नीतिगत मतभेद हैं। वे भारत, दक्षिण कोरिया, आॅस्ट्रेलिया और रूस को प्रवेश देने की जो बात कह रहे हैं, उसके दूरगामी आर्थिक और सामरिक प्रभाव हो सकते हैं। भारत और ब्राजील जैसी तेजी से बढ़ रही अर्थव्यवस्थाओं से इस समूह को चुनौती मिल रही है, जो जी-20 समूह का प्रतिनिधित्व करते हैं लेकिन जी-7 का हिस्सा नहीं हैं।

कुछ वैश्विक अर्थशास्त्रियों का कहना है कि जी-20 के कुछ देश 2050 तक जी-7 के कुछ सदस्य देशों को पीछे छोड़ देंगे। इस दृष्टि से ट्रंप का प्रस्ताव बेहतर नजर आता है। चीन को इस समूह में प्रवेश न देने के पीछे अमेरिका की रणनीतिक दृष्टि भी नजर आ रही है। भारत-चीन सीमा पर जारी गतिरोध को लेकर भी अमेरिका के विदेश मंत्री माईक पोंपियो ने भारत का समर्थन करते हुए चीन की कड़ी आलोचना करने से गुरेज नहीं किया।

उन्होंने चीन को चेतावनी देते हुए कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप के नेतृत्व में हमारा रक्षा विभाग, हमारी सेना और हमारे राष्ट्रीय सुरक्षा संस्थान इतने सक्षम हैं कि हम अमेरिकियों की रक्षा कर सकते हैं। उन्होंने कहा, वास्तव में हम विश्व भर के अपने सहयोगी देशों भारत, आॅस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया, जापान, ब्राजील, यूरोप के साथ अच्छी सहभागिता निभा सकते हैं।

समुद्र से लेकर आर्थिक मोर्चे तक पर अमेरिका और चीन आमने सामने है। अमेरिकी नौसेना के जहाज पश्चिमी प्रशांत महासागर में जापान, आॅस्ट्रेलिया और दक्षिण कोरिया के युद्धपोतों के साथ संयुक्त अभ्यास कर चुके है और भारत के साथ भी उनका यह अभ्यास चलता रहा है। ऐसा दक्षिण चीन सागर में चीन के दावों को चुनौती देने के लिए किया जाता है। जी-7 में दक्षिण कोरिया, आॅस्ट्रेलिया और भारत के आने से अमेरिका को मजबूती मिलेगी। पेंटागन चीन की सैन्य गतिविधियों को रोकने के लिए दक्षिण चीन सागर में टॉमहॉक क्रूज मिसाइल तैनात करने को लेकर गंभीर है।

हिंद और प्रशांत महासागर में चीन के आधिपत्य की लगातार कोशिशें दुनिया के अनेक देशों के लिए गहरी चुनौती बन गई है। हिंद महासागर में चीन ने परमाणु शक्ति चालित हमलावर पनडुब्बी एसएनएन की तैनाती कर भारत की सामरिक घेराबंदी का संकेत साल 2013 में ही दे दिया था। समुद्री डकैतों को रोकने के नाम पर साल 2008 से ही अदन की खाड़ी में अपने व्यापारिक जहाजों और नाविकों की सुरक्षा के लिए युद्धपोत तैनात कर दिए थे।

यह इलाका भारत के समुद्री व्यापार के लिए भी बेहद महत्त्वपूर्ण है। देश की अस्सी फीसद ऊर्जा आपूर्ति यानी रोजाना करीब 38.6 लाख बैरल कच्चा तेल इसी इलाके से गुजरता है, इसलिए भारत के व्यापारिक और सामरिक हितों के लिए यह समुद्री क्षेत्र बहुत ही संवेदनशील है।

जी-7 में भारत के शामिल होने से अमेरिका और भारत के सामरिक रिश्ते भी बढ़ने की संभावना है और इसका असर चीन पर पड़ेगा। अमेरिका भारत से रिश्ते मजबूत कर समुद्र में चीन की ताकत को कमजोर कर सकता है। ट्रंप के उभार के बाद महाशक्ति अमेरिका की भूमिका वैश्विक हितों से ज्यादा अमेरिकीवाद पर केंद्रित हो गई है और इसके प्रभाव से जी-7 भी अछूता नहीं है।

अमेरिकी कांग्रेस में ट्रंप ने साफ कह दिया कि मेरा काम दुनिया की नुमाइंदगी करना नहीं है, मेरा काम अमेरिका की नुमाइंदगी करना है। जी-7 में भारत, रूस, दक्षिण कोरिया और आॅस्ट्रेलिया के शामिल होने से उत्तर कोरिया, चीनी सागर और चीन तक अमेरिका की बादशाहत कायम हो सकेगी, इस दृष्टि से ट्रंप का यह दांव बेहद अहम है।

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