Agriculture has been the mainstay of our country economy since ancient times – राजनीतिः ग्रामीण विकास की चुनौती

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निरंकार सिंह

महामारी काल में यह साबित हो गया है कि अपने ही संसाधन संकट के समय काम आते हैं। इस दृष्टि से भारत के गांवों का उदाहरण दिया जा सकता है, जो कोरोना के कहर से अप्रभावित रहे हैं। ग्रामवासियों के रहन-सहन का तरीका बेहतर साबित हुआ है। सभी ग्रामवासियों का मिल-जुल कर एक परिवार की भांति रहना और एक-दूसरे को यथासंभव सहयोग करने हेतु सदैव तत्पर रहना हमारे ग्रामीण जीवन की विशेषता है। दरअसल, शहरी जरूरतों का भी सारा सामान गांव से ही आता हैं। वह वहीं पैदा होता है। इसलिए एक बार फिर लोगों का ध्यान गांवों की ओर गया है। प्राचीन काल से ही हमारे देश की अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार कृषि ही रहा है। कृषि पर हमारी निर्भरता के साथ ही यह तथ्य भी हमारे लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है कि देश की पैंसठ प्रतिशत से भी अधिक जनसंख्या गांवों में ही निवास करती है।

महात्मा गांधी ने देश में जिस स्वराज्य की परिकल्पना की थी, उसकी बुनियाद देश के लाखों गांवों के विकास पर टिकी है। उनका दृढ़ विश्वास था कि जब तक भारत के लाखों गांव स्वतंत्र, शक्तिशाली और स्वावलंबी बन कर उसके संपूर्ण जीवन में पूरा भाग नहीं लेते, तब तक भारत का भविष्य उज्जवल नहीं हो सकता। इसमें कोई संदेह नहीं कि ग्राम स्वराज्य की यह पद्धति आर्यों के शासन व्यवस्था की बुनियाद थी। इस बारे में 1830 में अंग्रेज गवर्नर जनरल सर चार्ल्स मेटकाफ ने जो ब्योरा अपने देश को भेजा था, उसमें लिखा था- ह्यभारत के ग्राम समुदाय एक प्रकार के छोटे-छोटे गणराज्य हैं, जो अपने लिए आवश्यक सभी सामग्री की व्यवस्था कर लेते हैं और किसी प्रकार के बाहरी संपर्क से मुक्त हैं। लगता है कि इनके अधिकारों और प्रबंधों पर कभी कोई प्रभाव नहीं पड़ता। एक के बाद एक राजवंश आता है, क्रांतियों का क्रम चलता रहता है। किंतु ग्राम समुदाय उसी ढर्रे पर चलता जाता है। मेरे विचार से ग्राम समुदायों के इस संघ ने जिसमें प्रत्येक (समुदाय) एक छोटे-मोटे राज्य के ही रूप में हैं, अन्य किसी बात की अपेक्षा अनेक क्रांतियों के बावजूद भारतीय जन समाज को कायम रखने और जनजीवन को विश्रृंखल होने से बचाने में बड़ा भारी काम किया। साथ ही, यह जनता को सुखी बनाए रखने और उसे स्वतंत्र स्थिति का उपभोग कराने का बड़ा भारी साधन है। इसलिए मेरी इच्छा है कि गांवों की इस व्यवस्था में कभी उलट फेर न किया जाए। मैं उस प्रवृत्ति की बात सुन कर ही दहल जाता हूं जो इनकी व्यवस्था भंग करने की सलाह देती है।

मेटकाफ के इस खौफ के बावजूद ब्रिटिश सरकार स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता के इन केंद्रों को विनष्ट करने की निर्धारित नीति पर बराबर चलती रही। इन ग्राम-गणतंत्रों को विनष्ट कर ब्रिटिश साम्राज्यशाही ने इस प्राचीन देश को सबसे अधिक क्षति पहुंचाई। यदि अस्सी फीसद भारतीयों को आश्रय देने वाले हमारे गांवों में प्रशासन का वह पुराना ओज आज भी कायम रहता, तो सामुदायिक विकास और राष्ट्रीय पुनर्निर्माण कोई जटिल काम नहीं था। ब्रिटेन से आजाद होने के लिए लड़े गए स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में गांधी जी ने भारतीय मध्यम वर्ग को साहस, एकता, नैतिक नियमों पर विश्वास, स्वाभिमान, आत्म-निर्भरता और आत्मविश्वास की शिक्षा दी और ये गुण उनमें पैदा किए। इन्हीं गुणों से उन्होंने अपनी स्वतंत्रता प्राप्त की। इसी तरह गांधी जी ने अपना रचनात्मक कार्यक्रम बनाया और शुरू किया, जिससे किसानों को इन्हीं गुणों का विकास करने और बड़ी हद तक प्रतिदिन रचनात्मक काम करके स्वतंत्रता प्राप्त करने में मदद मिली। गांधी जी का लक्ष्य सारे हिंदुस्तानियों के लिए पूरी स्वतंत्रता और न्याय प्राप्त करना था।

लेकिन आजादी के बाद हमने गांधी जी के बताए मार्ग को दकियानूसी मानते हुए उसे तिलांजलि दे दी। परिणाम आज सामने है। गरीबी बढ़ती जा रही है। कम से कम तीस फीसद जनता आज भी गरीबी की रेखा के नीचे जी रही है। बेकारी भी बढ़ी है। शिक्षितों की बेकारी भी बढ़ी है। साथ-साथ विषमता भी कम होने के बदले बढ़ ही रही है। इसीलिए अब सबका ध्यान फिर से गांधी जी के विचारों की ओर जाने लगा है। मौजूदा वैश्विक महामारी संकट के बाद उच्च वर्ग के भी बहुत से विद्वानों को ऐसा महसूस होने लगा है कि गांधीजी के दिखाए रास्ते को छोड़ कर भारत ने बहुत बड़ी गलती की है। अत: ये सब लोग भी गांधी जी की विचारधारा से मिलता-जुलता विचार रखने लगे हैं। जैसे, कृषि विकास हमारी विकास योजना का मुख्य आधार बनना चाहिए। इसकी बुनियाद पर ही गृह उद्योगों और ग्रामोद्योग की एक रूपरेखा गांवों के विकास के लिए बनानी चाहिए। उसमें बिजली, परिवहन और बाजार आदि की सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जाएं। बड़े उद्योगों की उपेक्षा करने की बात नहीं है, परंतु अपने जैसे देश में जहां पूंजी की बहुत कमी हो और मानव शक्ति बडे़ पैमाने पर बेकार पड़ी हो और देश की अधिकांश आबादी गांवों में बसती हो, वहां योजना की बुनियाद ही बदलनी चाहिए।

हालांकि हाल के वर्षों में गांवों की सूरत बदली है। सरकारों ने गांव और किसानों की ओर थोड़ा तो ध्यान दिया है। दूर-दराज के गांवों में भी बिजली-पानी पहुंचाने का काम कुछ तो परवान चढ़ा है। दूरदर्शन व अन्य संचार माध्यमों के द्वारा ग्रामीण लोगों को उत्तम कृषि, स्वास्थ्य व शिक्षा संबंधी जानकारी दी जा रही है। गांवों को सड़क और रेलमार्गों द्वारा शहरों से जोड़ने का काम जारी है। कृषि क्षेत्र के प्रस्तावित तीन कानूनी सुधारों से गांवों की दुनिया बदल सकती है। इन तीनों सुधारों को ठीक ढंग से लागू कर दिया गया तो एक देश एक बाजार का सपना साकार हो जाएगा। सरकार ने आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन, एपीएमसी एक्ट और एग्रीकल्चर प्रोड्यूस प्राइस एंड क्वालिटी एश्योरेंस जैसे तीन बड़े सुधारों को हरी झंडी देकर अन्नदाता की सुध ली है।

अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए पिछले महीने केंद्र सरकार ने जो आर्थिक पैकेज घोषित किया गया है उसमें कृषि क्षेत्र के साथ पशुपालन, डेयरी, मत्स्य, खाद्य प्रसंस्करण, जड़ी-बूटी, शहद उत्पादन और आपरेशन ग्रीन की कमजोर कड़ियों को मजबूत करने पर जोर दिया गया है। राहत पैकेज में कृषि क्षेत्र के लिए लगभग 1.65 लाख करोड़ रुपए के पैकेज की घोषणा की गई है। कृषि क्षेत्र में कानूनी सुधार की लंबे समय से अटकी गाड़ी को एक झटके में पटरी पर ला दिया है। इससे किसान अब कभी भी और कहीं भी अपनी उपज बेफिक्र होकर ले जाने और बेचने के लिए स्वतंत्र हो गया है। सरकार इसके लिए एक केंद्रीय कानून लाएगी। अभी तक किसान राज्यों के कृषि उत्पाद विपणन समिति कानून के दायरे में आते थे। उसी कानून के तहत किसान अपनी उपज निश्चित मंडी के लाइसेंसधारी आढ़ती को बेचने के लिए बाध्य होता था। पर अब कृषि उपज के अंतरराज्यीय

कारोबार करने की छूट मिल गई है। निश्चित आमदनी के लिए जोखिम रहित खेती में मानक युक्त गुणवत्ता वाली फसल उगाने के लिए जो उपाय किये जाएंगे, उसमें किसानों के हितों का पूरा ध्यान रखा जाएगा। इसमें किसानों से निर्यातक और बड़े खरीददार सीधे जुड़ेंगे। हमारे यहां लोकतंत्र के मूलभूत तत्व को समझा नहीं गया है और इसीलिए हम समझते हैं कि सब कुछ सरकार कर देगी, हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं है। जनता को अपनी समस्याओं का हल स्वयं अपने हाथों से निकालना होगा। सरकार उनकी मदद कर सकती है, किन्तु पहल जनता को ही करनी होगी, तभी हम आगे बढ़ पाएंगे।

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