covid pandemic need to introduce online education system and practical, technical problems in the country – राजनीति: ऑनलाइन शिक्षा और चुनौतियां

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माया जॉन
ऑनलाइन शिक्षा और परीक्षा के संबंध में हाल में जिस तरह के फैसले हुए हैं, वे वक्त की मांग तो हैं लेकिन व्यावहारिकता की कसौटी पर खरे उतर पाएंगे, इसमें संदेह है। देश के तमाम विश्वविद्यालयों ने अब अपने यहां न केवल शिक्षण कार्य, बल्कि परीक्षा जैसे काम तक आॅनलाइन शुरू कराने का फैसला किया है। इस कवायद से छात्रों की मुश्किलें बढ़ना स्वाभाविक है। इसमें कोई संदेह नहीं कि व्यावहारिक मुश्किलों और तकनीकी संसाधनों के अभाव में आॅनलाइन शिक्षण की सुविधाएं सर्वसुलभ नहीं हैं और इसी वजह से छात्रों और शिक्षकों को इसमें तात्कालिक तौर पर दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। लेकिन, दूसरी ओर हमारे सामने अब बदलती दुनिया में तकनीक के साथ चलने की चुनौती भी है।

आज दुनिया के तमाम शिक्षण संस्थान और विश्वविद्यालय आॅनलाइन चल रहे हैं। अगर हमें उनके साथ दौड़ में शामिल होना है तो आॅनलाइन शिक्षा प्रणाली को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। बस, सवाल इतना भर है कि भारत जैसे देश में इसे आसानी से कैसे स्वीकार्य बनाया जाए।

पूर्णबंदी से जूझ रही दुनिया में अब ज्यादातर कामकाज आॅनलाइन शुरू हो चुके हैं। कहना न होगा कि जीवन का बड़ा हिस्सा आॅनलाइन संस्कृति में ढलने को मजबूर हो चुका है। इसी क्रम में आॅनलाइन शिक्षा भी एक विकल्प के रूप में सामने आई है। किसी ने सोचा भी नहीं था कि स्कूली बच्चे तक आॅनलाइन कक्षाओं में शामिल होंगे। लेकिन अब यह हो रहा है, भले अड़चनें कितनी ही क्यों न हों। दरअसल, भारत के शिक्षा जगत की जमीनी हकीकत दुनिया से अलग है। अमेरिका, जापान और पश्चिमी यूरोप के देशों में, जहां हर व्यक्ति तक तकनीक की पहुंच दूसरे देशों के मुकाबले कहीं ज्यादा है, वहां पर भी शिक्षाविदों के बीच में आॅनलाइन शिक्षा और परीक्षा के बारे में एक राय नहीं है। अमेरिका में ही आॅनलाइन पढ़ाई करने वाले छात्रों की सफलता दर प्रत्यक्ष कक्षाओं के छात्रों की तुलना में आठवां हिस्सा ही है।

पूर्णबंदी के कारण देश भर में छात्रों की पढ़ाई बाधित हुई है। यह स्थिति देश के स्कूलों से लेकर उच्च शिक्षण संस्थानों तक में देखने को मिल रही है। इस तरह की आपात परिस्थितियों में आॅनलाइन शिक्षा व्यवस्था विभिन्न विश्वविद्यालयों में लागू की गई और पाठ्यक्रम को पूरा मान कर आॅनलाइन परीक्षाएं कराने की तैयारियां भी चल रही हैं। लेकिन हकीकत यह है कि न सिर्फ देश के विभिन्न क्षेत्रीय शैक्षणिक संस्थान, बल्कि कई केंद्रीय विश्वविद्यालय भी इस दिशा में कदम बढ़ाने को लेकर दुविधा में हैं। इसका बड़ा कारण है कि संसाधनों की उपलब्धता के बारे में वे अच्छी तरह जानते हैं। शिक्षण संस्थानों के पास तो फिर संसाधन हो सकते हैं, भले सीमित हों, लेकिन छात्रों का बड़ा वर्ग ऐसा है जिसके पास आॅनलाइन शिक्षा के लिए आवश्यक संसाधन नहीं हैं। यही वह प्रमुख बिंदु है जो आॅनलाइन शिक्षण और परीक्षा को लेकर सबको चिंतित कर रहा है।

छात्रों की पढ़ाई बाधित होने का प्रतिकूल प्रभाव आगे जाकर उनके रोजगार की तैयारियों पर भी पड़ेगा। आनलाइन शिक्षा की चुनौतियों को नजरअंदाज करना इसके लक्ष्य में बड़ी बाधा साबित हो सकता है। छात्रों और शिक्षकों से यह उम्मीद की जा रही है कि वे तत्काल इस प्रणाली को आत्मसात कर लें और आनलाइन ऐप, ई-रिसोर्स व अन्य आनलाइन शिक्षण के तरीकों से सामान्य दिनों की तरह शिक्षण गतिविधियां चलाते रहें। लेकिन व्यावहारिक रूप से क्या ऐसा संभव हो पाएगा, यह बड़ा सवाल है।

इस आनलाइन कवायद का नतीजा अब तक इस रूप में सामने आया है, जिसमें एक शिक्षक किसी भी तरह से अपने पाठ्यक्रम को पूरा करने औपचारिकता में लग गया है, और दूसरी ओर बहुसंख्यक छात्र आनलाइन शिक्षण पद्धति की समस्याओं से जूझ रहे हैं।

यह एक असाधारण दौर है और ऐसे समय में बेशक नए प्रयोगों की जरूरत है। चुनौतियों का सामना करने के लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) और विभिन्न विश्वविद्यालयों से लेकर कॉलेज के शिक्षक तक, सभी नए और सकारात्मक प्रयोग कर रहे हैं। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इसका एक दूसरा पक्ष भी है और वह हैं हमारे छात्र। हमारे विश्वविद्यालयों में विभिन्न पृष्ठभूमियों से छात्र आते हैं। इनमें से बहुत से छात्र पहले से ही जाति, वर्ग, लिंग, धर्म, भाषा, क्षेत्र, आदिवासी पृष्ठभूमि या शारीरिक निशक्तता के आधार पर कई तरह की चुनौतियां झेल रहे हैं। केंद्रीय विश्वविद्यालयों में छात्रों का एक बड़ा हिस्सा दूसरे शहरों से आने वाले छात्रों का है जो मार्च में छुट्टियों में अपने घर चला गया।

अपने घरों में इन छात्रों के पास किताबों सहित दूसरी अध्ययन सामग्री नहीं हैं। ऐसे में छात्रों के सामने सवाल है कि कैसे पढ़ाई करें। इन छात्रों की यह मुश्किल तकनीकी संसाधनों के अभाव की वजह से है। छात्रों का एक बड़ा हिस्सा ऐसे क्षेत्रों से आता है जहां इंटरनेट की समस्या है। ऐसे छात्रों की संख्या भी कम नहीं है जिनके पास लैपटॉप जैसी सुविधा नहीं है। स्मार्टफोन के सहारे पढ़ाई संभव नहीं है। इसी तरह निशक्तजन छात्रों की विशेष जरूरतों पर भी ध्यान देना होगा, जिनकी आॅनलाइन पढ़ाई के लिए वांछित तकनीक तक पहुंच नहीं है और जो शिक्षण संस्थानों में मुहैया कराए जाने वाले संसाधनों और सुविधाओं पर ही पूरी तरह से निर्भर हैं।

यह विडंबना ही है कि आनलाइन शिक्षण का यह संकट विश्वविद्यालय व्यवस्था के हाशिये पर मौजूद दूरस्थ माध्यम में पढ़ने वाले छात्रों की शिक्षा में लंबे समय से चल रहे संकट का एक हूबहू रूप है। पिछले दशक में विश्वविद्यालयों में छात्रों के दाखिले में बढ़ोत्तरी हुई है। दिल्ली विश्वविद्यालय का ही उदाहरण लें। यहां हर साल स्कूल आफ ओपन लर्निंग (एसओएल) में एक लाख से ज्यादा छात्र दाखिला लेते हैं। ज्ञात हो कि दूरस्थ शिक्षा प्रणाली में ज्यादातर छात्र सामाजिक रूप से पिछड़े और आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि से आते हैं। नियमित कॉलेजों में सीटों की कमी के कारण या आर्थिक दिक्कतों के कारण दाखिला न ले पाने वाले छात्र बेहद खराब ढंग से चल रही दूरस्थ शिक्षा प्रणाली में पढ़ाई करने को मजबूर हैं, जहां बिना कक्षाओं के ही पाठ्यक्रम पूरा कराना और गुणवत्तापूर्ण पाठ्य-सामग्री का अभाव एक आम बात है।

यह सर्वमान्य तथ्य है कि विभिन्न सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि से आने वाले छात्रों की पढ़ने की क्षमताएं भी भिन्न होती हैं। ऐसे में उनकी जरूरतों को सिर्फ प्रत्यक्ष कक्षाओं में ही बेहतर ढंग से पूरा किया जा सकता है। अलग-अलग छात्रों और समूहों के साथ मिल कर कक्षाओं में पढ़ाई करने से बेहतर समझ विकसित होती है। इसके विपरीत, आॅनलाइन पढ़ाई से शिक्षा का सारा बोझ सिर्फ एक व्यक्ति विशेष पर केंद्रित हो जाता है, जिसमें छात्र सिर्फ डिजिटल तकनीक और गैजेटों पर निर्भर हो जाता है और इसका सबसे घातक नतीजा यह होता है कि ज्ञान अर्जन एक एकांगी रूप ले लेता है।

छात्रों के अल्पकालिक और दीर्घकालिक हितों को ध्यान में रखने के लिए नीति निमार्ताओं को शिक्षकों और छात्रों की चिंताओं के प्रति संवेदनशील होने की आवश्यकता है। बेहतर हो कि अंतिम वर्ष के छात्रों के लिए मौजूदा सत्र को थोड़ा-सा बढ़ाया जाए, ताकि स्थिति ठीक होने पर एक निश्चित समय-सीमा के लिए उनके लिए कक्षाएं और पीसीपी (पर्सनल कांटैक्ट प्रोग्राम) के सत्र आयोजित किए जा सकें। इसके बाद ही परीक्षाओं के लिए या तो अतिरिक्त आंतरिक परीक्षण के तरीकों को अपनाया जा सकता है या बाह्य परीक्षा की योजना बनाई जा सकती है। आज जरूरत इस बात की है कि हम शिक्षण संस्थानों में आए संकट से बाहर निकलने के लिए ऐसे उपायों पर अमल करें जिनमें सभी के हितों का समावेश हो।

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