duniya mere aage workers return home is nothing short of a tragedy – दुनिया मेरे आगेः पांवों के दिन

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महेश परिमल

शमशेर की कविता है, हाथों के दिन, जिसमें वे लिखते हैं- कब आएंगे हाथों के दिन। लेकिन जब मैं पढ़ता हूं कि बंगलुरू से ढाई हजार किलोमीटर दूर पैदल अपने परिवार के साथ चल कर राजस्थान भी पहुंचा जा सकता है, तब लगता है, सचमुच दिन अब पांवों के आ गए हैं। किस तरह हिम्मत की होगी, उन मजदूरों ने, जबकि उनके पास कुछ भी नहीं था। न जाने के साधन न ही खाने के। इंसान के पास जब कुछ नहीं होता, वास्तव में उस समय उनके पास सब कुछ होता है। इस सब कुछ में शामिल है हिम्मत। इस हिम्मत को हवा देती है अपने गांव की माटी की महक, जो उन्हें बुलाती है। लौटने की अदम्य इच्छाओं ने उनके पांवों को वह शक्ति दी, जिससे वे लौटने लगे गांवों की ओर। वास्तव में इंसान के पास जब खोने के लिए कुछ नहीं होता, उसकी जिंदगी उसी समय से शुरू होती है।

स्पेन में एक उत्सव होता है, जिसमें पत्नी को पीठ पर उठा कर अधिक से अधिक दूरी तय करनी होती है। इसे हम हास्य के रूप में देखते हैं। फिल्म ‘दम लगा के हइसा’ में भी इसी तरह का दृश्य है। ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ में भी प्रेयसी को हाथों से उठा कर पहाड़ चढ़ने का दृश्य है। स्पेन में यह उत्सव है, फिल्मों में अपने संकल्प को पूरा करने का जज्बा है। पर एक गर्भवती गृहस्थी का सामान सिर पर लाद कर पति और बच्चों के साथ अपने गांवों की लौटती है, तो उसके पांवों में एक गति होती है, लाचारी में उठाए गए कदम दोहरा भार उठाते हैं। इतने सारे लोग पटरियों के किनारे-किनारे चल कर अपने गांवों की ओर निकले, तो उन्हें जाने का रास्ता नहीं मालूम था। वे चलते चल रहे थे। पांवों को गति देने के लिए केवल गांव तक पहुंचने की इच्छा सर्वोपरि थी। भोजन का तो सवाल ही नहीं उठता। पेट की यही आग उन सबको ढाई हजार किलोमीटर दूर ले गई थी, अब वही आग भीतर ही भीतर गांव की माटी की चाहत बन कर उन्हें ऊर्जा दे रही थी।

हमारे साथी विदेशों में फंस जाते हैं, तो उन्हें एयरलिफ्ट कर अपने देश लाते हैं। पर अपने ही देश में फंसे लोगों को अपने गांव या शहर तक नहीं पहुंचा सकते। एयरलिफ्ट एक अभियान होता है, पर देश के भीतर इसे चुनौती क्यों नहीं माना जाता? देश के लोग देश के भीतर ही फंस कर अकुला रहे हैं, उनकी छटपटाहट ही बताती है कि वे क्या चाहते हैं। सरकार उनकी यह चाहत पूरी भी नहीं कर सकती? बहुत दुख हुआ, जब चलते-चलते कोई मजदूर अपने गांव पहुंचने के पहले ही दम तोड़ गया। सांस भी काम न आई। बेरहम थोड़ी देर और चल देती, तो क्या हो जाता, वह अपने गांव की माटी में रम तो जाता है। रमना और मरना में फर्क है। गांव में अपनों के बीच अपनी माटी में मरना किसी रमने से कम नहीं है। गांव पहुंचने की ललक ने उनके पांवों को शक्ति दी। यही शक्ति है, जिसने पेट की आग की भी नहीं सुनी।

ये मजदूर जहां भी जाते हैं, जी-तोड़ मेहनत करते हैं। विशालकाय इमारत बनने के दौरान पास ही झोपड़ी बना कर रहते हैं। वहीं उनका जीवन होता है। जहां वे परिवार के साथ रहते हैं। विशाल भवन बनता है, तो वे अपना साजो-सामान लेकर निकल पड़ते हैं, दूसरे आशियाने की ओर। इस दौरान आखिर तक उन्हें बाहरी मजदूर ही माना जाता है। अपने तो ये कभी बन ही नहीं पाते। उधर जिस परिवार के लिए वे अपना घर-बार छोड़ कर आते हैं, उनके लिए भी वे पराए ही होते हैं। जो साल में एक बार ही अपने गांव आते हैं। एक तरह इनके जीवन का एक बड़ा हिस्सा पराएपन में ही गुजर जाता है।

आज वे लौटना चाहते हैं, अपने घरौंदों की ओर। जहां वे कुछ ही देर सही, पर सुकून भरी जिंदगी जी सकें। इस घरौंदे से दूर वे अब तक जहां थे, अगर वहां ही उन्हें जीवन जीने के लिए सुविधाएं मिल जातीं, तो वे लौटते ही क्यों? पर उनकी सांसों को बनाए रखने की जो कोशिशें हुई, वे उन तक नहीं पहुंच पाईं, इसलिए उनकी सांसें टूटने लगीं। टूटती सांसों के साथ वे यही मानने लगे कि इन्हें टूटना ही है, तो क्यों न अपनी माटी में जाकर टूटें। इसलिए उनकी तड़प बढ़ गई, बुलाने लगी माटी। इसलिए बेपरवाह होकर वे निकल पड़े। पर जिंदगी इतनी आसान कब हुई है, जो अब होगी। उनका घर लौटना भी किसी त्रासदी से कम नहीं है। घर पर बेरोजगारी उनका इंतजार कर रही है। वही बेरोजगारी, जिससे हार कर उन्होंने अपना घर छोड़ा था। अब उसी बेबसी, लाचारी के बीच जाकर वे तलाशेंगे, जिंदगी। एक अजीब-सी भूल-भुलैया है, जहां लौट-लौट कर आना है। पाना तो कुछ नहीं, बस खोना ही खोना है।

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