jansatta raajneeti column Corona not left any country in a fighting position at the moment Industries are closed everywhere – राजनीतिः चुनौती के बीच अवसर

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संजीव पांडेय

संकट के दौरान ही विकल्प भी निकलता है। कोरोना महामारी ने दक्षिण एशिया के देशों को आपसी सहयोग और मजबूत करने के लिए एक बेहतर मौका दिया है। पिछले सात दशकों से भी ज्यादा समय से संघर्षरत भारत और पाकिस्तान को कोरोना का संदेश है कि पुराने विवादों को भूलिए और सहयोग के नए युग की शुरूआत कीजिए। लेकिन सहयोग का यह संदेश सिर्फ पाकिस्तान और भारत के लिए नहीं है, यह संदेश दक्षिण एशिया के उन तमाम देशों के लिए भी है जो गरीब हैं और अब वैश्विक महामारी से जूझ रहे हैं। कोरोना संकट ने दक्षिण एशिया के देशों के अर्थव्यवस्था को भारी धक्का पहुंचाया है। इसलिए इन देशों के बीच क्षेत्रीय सहयोग की जरूरत और बढ़ गई है। एशियाई देशों के लिए एक सुखद स्थिति यह रही कि इन देशों में कोरोना महामारी मृत्यु दर यूरोपीय और अमेरिकी देशों के मुकाबले कम है। अगर दक्षिण एशियाई देशों में मृत्यु दर ज्यादा होती तो हालात गंभीर होते, क्योंकि ज्यादातर देशों में स्वास्थ्य सेवाओं का ढांचा दयनीय स्थिति में है। यह भी सत्य है कि कोरोना ने सिर्फ कुछ देशों की ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को बिगाड़ दिया है, ऐसे में अब गरीब देश किसी अमीर मुल्क से भी बहुत ज्यादा मदद की उम्मीद नहीं लगा सकते। अमीर मुल्क खुद गहरे संकट में हैं और अपनी अर्थव्यवस्था बचाने में लगे है। इस भंवर से निकलने के लिए अब दक्षिण एशियाई देशों के समक्ष एक ही रास्ता है, और वह है आपसी सहयोग का।

पिछले दिनों सार्क सदस्य देशों के प्रमुख वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए एक दूसरे से जुड़े और मौजूदा हालात पर चर्चा की थी। वस्तुस्थिति यह है कि पिछले कुछ साल से सार्क संगठन महत्त्वहीन होता जा रहा है। भारत ने अपनी पिछली गलतियों का अहसास करते हुए इस बार गुटनिरपेक्ष देशों के सम्मेलन के महत्त्व को भी समझा। सार्क देशों के नेताओं की इस वीडियो कांफ्रेंस मुलाकात ने कुछ उम्मीद जगाई है। इससे लगता है कि दक्षिण एशियाई देश आपसी मतभेद को भुला कर सहयोग की दिशा में बढेंगे और भविष्य में इसके सुखद परिणाम देखने को मिलेंगे। मौजूदा हालात में और सार्क को प्रासंगिक बनाने के लिए भी भारत और पाकिस्तान को कोविड-19 से सबक सीखना चाहिए। दोनों ही देश ज्यादा तनाव झेलने की स्थिति में नहीं हैं। वहीं बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका और अफगानिस्तान जैसे देश आपसी सहयोग के दरिए ही कोरोना संकट से उत्पन्न आर्थिक दुष्प्रभावों को दूर कर सकते हैं।

दक्षिण एशियाई देशों की अर्थव्यवस्था पर भारी चोट कई तरफ से पड़ी है। बस अच्छी बात यह रही कि अंतराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें जमीन पर आ गईं, वरना कई देशों की अर्थव्यवस्था पैंदे में चली जाती। इस वक्त दक्षिण एशियाई देशों का निर्यात काफी ज्यादा गिर चुका है। अंतराष्ट्रीय बाजार में तेल की गिरती कीमतों ने तेल उत्पादक देशों की अर्थव्यवस्था को भी भारी नुकसान पहुंचाया है। अरब देशों में विदेशी कामगारों की छंटनी शुरू हो चुकी है। भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका के लोगों को छंटनी के संकेत मिल चुके हैं। इसका असर यह हुआ है कि कई देशों को अपने नागरिकों द्ववारा अरब देशों से भेजे जाने वाली धनराशि में भी भारी गिरावट आई है। एक मोटे अनुमान के मुताबिक इसमें बीस से पच्चीस फीसद तक की कमी आ सकती है। 2019 में विदेशों में काम करने वाले भारतीयों ने तिरासी अरब डालर भारत भेजे थे। लेकिन अब 2020 में यह रकम चौंसठ अरब डालर के आसपास रह सकती है।

दक्षिण एशिया को दुनिया की बदलती स्थितियों से भी कुछ ग्रहण करना होगा। चीन और अमेरिका के बीच संघर्ष तेज हो गया है। वहीं खाड़ी क्षेत्र में सैन्य संघर्ष से हुए नुकसान के बाद कई देश अब शांति की संभावना तलाश रहे हैं। खबर है कि सऊदी अरब और ई?ान संघर्ष खत्म करने को लेकर गोपनीय बातचीत कर रहे हैं। लेकिन इस संघर्ष से सऊदी अरब और ई?ान को क्या हासिल हुआ? यमन से लेकर सीरिया तक अपने वर्चस्व को स्थापित करने के चक्कर में ई?ान और सऊदी अरब आपस मे लडते रहे है। सामने शिया-सुन्नी विवाद दिखा। संघर्ष के मूल में पेट्रोल बाजार और पेट्रोलियम उत्पादों पर वर्चस्व रहा है। आज वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें गिरी हैं तो दोनों मुल्क यथार्थ के धरातर पर आते नजर आ रहे है। सऊदी अरब पश्चिम एशिया में अब लंबे संघर्ष के लिए तैयार नहीं है। तेल कीमतों के बल पर सऊदी अरब भारी सैन्यीकरण करता रहा। लेकिन अब तेल आय मे कमी के कारण आंतरिक खर्चों में कटौती की नौबत भी आ रही है। ईरान की आर्थिक हालात पहले ही खराब हो चुकी है। दक्षिण एशिया के तमाम देशों को इन बदलती स्थितियों से सीख लेनी चाहिए।

अकेले भारत, बांग्लादेश और पाकिस्तान की कुल आबादी एक अरब सत्तर करोड़ के आसपास है। संसाधनों में अमीर होने के बावजूद विशाल आबादी वाले ये देश गरीब हैं। दक्षिण एशिया के बाकी देश नेपाल, भूटान, श्रीलंका जैसे देश भी प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर होने के बावजूद गरीबी का दंश झेल रहे हैं। इसका एक कारण बड़ा क्षेत्रीय सहयोग का भारी अभाव भी है। अगर ये देश आपसी सहयोग बढ़ाएं तो इन मुल्कों का विकास तेजी से हो सकता है। अगर इन देशों में स्वास्थ्य सेवाओं का ढांचा मजबूत होता तो कोरोना जैसे संकट में अर्थव्यवस्था को झटके नहीं लगते। कोरोना संकट ने दक्षिण एशियाई देशों को यह मौका दिया है कि वे आपस में क्षेत्रीय व्यापार की संभावनाओं को बढ़ाएं, आपसी सहयोग बढ़ाएं, ताकि स्थानीय स्तर पर आने वाले मानवीय और आर्थिक संकटों से निपटा जा सके। कोरोना ने वैश्वीकरण की व्यवस्था पर चोट की है। चीन और अमेरिका आमने सामने हैं। ये दोनों बड़ी आर्थिक ताकत हैं। अगर दक्षिण एशियाई देशों में एकजुटता होती है तो वैश्विक चुनौतियों से निपटना कहीं ज्यादा आसान होगा। इन देशों को तकनीकी क्षेत्र से लेकर कृषि, उद्योग जैसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में सहयोग का दायरा बढ़ाना होगा ताकि नया क्षेत्रीय बाजार विकसित हो सके। भारत और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय व्यापार क्षमता लगभग सैंतीस अरब डालर की है, लेकिन अभी यह व्यापार ढाई अरब डॉलर से ज्यादा नहीं है। भारत पाकिस्तान के रास्ते अफगानिस्तान और उसके आगे मध्य एशिया तक पहुंच सकता है और पाकिस्तान भारत के रास्ते पूर्वी एशिया तक पहुंच सकता है। इन संभावनाओं पर लंबे समय से बातचीत हो रही है। इसे अति आदर्शवादी संभावना भी बताया जाता है। लेकिन अब समय की मांग भी यही है और यथार्थ भी यही है। भारत बांग्लादेश के बीच द्विपक्षीय व्यापार क्षमता लगभग अठारह अरब डालर की है, लेकिन व्यापार नौ से दस अरब डॉलर का ही है। आपसी विश्वास बहाली से द्विपक्षीय व्यापार क्षमता का पूर्ण उपयोग हो सकता है।

कोरोना ने फिलहाल किसी भी मुल्क को लड़ने की स्थिति में नहीं रख छोड़ा है। सब जगह उद्योग धंधे बंद पड़े हैं, करोडों लोग बेरोजगार हो चुके हैं। बड़ी आबादी के भुखमरी के चपेट में आने का संकट गहराता जा रहा है। कोरोना विषाणु दिख भले न सके, लेकिन संदेश दे रहा है कि उसे न राष्ट्रों की सीमाओं की, न सैन्य बलों की ताकत की परवाह है। उसने यह भी नहीं देखा कि कौनसा मुल्क कितना अमीर है और कितना गरीब। इन परिस्थितियों में संघर्ष या विवाद से तो किसी मुल्क का भला नहीं हो सकता।

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