Kovid global epidemic crisis and stimulus package on Indian economy workers troubled by unemployment – राजनीति: आर्थिक प्रोत्साहन और चुनौतियां

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जयंतीलाल भंडारी
इन दिनों वैश्विक आर्थिक संगठनों ने कोविड-19 से निर्मित चुनौतियों और भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसके प्रभाव को लेकर जो रिपोर्टें पेश की हैं, उनका सार यही निकलता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था को मुश्किलों से निकालने के लिए अभी और आर्थिक प्रोत्साहनों की जरूरत है। हाल ही में क्रेडिट रेटिंग एजेंसी फिच ने कहा कि भारत सरकार ने हाल में जो आर्थिक पैकेज घोषित किया है, वह अर्थव्यवस्था को संकट से उबारने में सक्षम नहीं है।

ऐसे में अभी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए राहतदायी आर्थिक प्रोत्साहनों की जरूरत है। क्रेडिट रेटिंग एजेंसी सुइस वेल्थ मैनेजमेंट ने भी अपनी रिपोर्ट में इस आर्थिक पैकेज में अर्थव्यवस्था के लिए तात्कालिक प्रोत्साहन का अभाव बताया है। ऐसे में हो सकता है कि नया प्रोत्साहन पैकेज देश की वृद्धि को बहाल करने के लिए पर्याप्त न हो। गोल्डमैन शॉक्स ने भी कहा कि यद्यपि भारत ने पिछले दिनों अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों के लिए ढांचागत सुधारों की घोषणा तो की है, लेकिन इनसे अभी तत्काल वृद्धि बहाल होने में मदद नहीं मिलेगी।

पिछले दिनों वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने पांच किस्तों में बीस लाख करोड़ रुपए से ज्यादा के पांच पैकेज प्रस्तुत किए हैं। इससे केंद्र के राजकोष पर करीब 2.28 लाख करोड़ रुपए का ही बोझ पड़ेगा। नए पैकेज में ज्यादातर घोषणाएं नए व्यय के रूप में न होकर गारंटी या नकदीकृत उपायों और सुधारों के रूप में है।

नए आर्थिक पैकेज में चार बातें उभरती दिखाई दे रही हैं। एक, खेती किसानी को बेहतर बना कर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भरता की बुनियाद बनाने का लक्ष्य रखा गया है। दो, देश में रोजगार के केंद्र बिंदु सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग (एमएसएमई) को बड़ा सहारा दिया गया है। तीन, गरीब, किसान, श्रमिक और निम्न मध्यमवर्गीय परिवारों को बड़ी राहत दी गई है। चार, बड़े उद्योगों के लिए आर्थिक सुधार किए गए हैं। रक्षा क्षेत्र में बड़े बदलाव किए गए हैं और गैर रणनीतिक सार्वजनिक उपक्रमों को निजी क्षेत्र के लिए खोला गया है।

नए आर्थिक पैकेज के माध्यम से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर भारत की बुनियाद बनाने का कदम उठाया गया है। कृषि एवं उससे जुड़े क्षेत्रों पर 1.63 लाख करोड़ रुपए के प्रावधान किए गए हैं। सरकार ने आर्थिक पैकेज में खेती-किसानी पर जोर देकर किसानों को बेहतर मूल्य दिलाने की कवायद की है। निसंदेह शीत भंडार गृहों और यार्ड जैसे बुनियादी ढांचे के लिए एक लाख करोड़ रुपए का कोष, अत्यधिक महत्त्वपूर्ण कदम है। निश्चित रूप से पशुपालन बुनियादी ढांचा विकास फंड से भारत के डेरी क्षेत्र की मौजूदा क्षमता तेजी से बढेगी। साथ ही, इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में तीस लाख लोगों के लिए रोजगार का सृजन होगा। इसी तरह किसानों को कृषि उत्पाद मंडी समिति के माध्यम से उत्पाद बेचने की अनिवार्यता खत्म होने और कृषि उपज के बाधा रहित कारोबार से बेहतर दाम पाने का मौका मिलेगा।

नए पैकेज के तहत किसानों एवं ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए 2.30 लाख करोड़ रुपए से आसान कर्ज दिए जाने का प्रावधान किया गया हैं। नाबार्ड के जरिए कर्ज देने के लिए तीस हजार करोड़ रुपए के अतिरिक्त फंड की व्यवस्था की गई है। करीब तीन करोड़ छोटे और सीमांत किसानों को इसका फायदा मिलेगा। तैंतीस राज्य सहकारी बैंकों, साझडे तीन सौ जिला सहकारी बैंकों और तियालीस क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों के जरिए यह कर्ज दिया जाएगा। नए पैकेज के तहत किसान क्रेडिट कार्ड के लिए भी अभियान चलेगा। मछुआरे और पशुपालक किसान भी इसमें शामिल किए जाएंगे। इससे डाई करोड़ किसानों को दो लाख करोड़ रुपए के रियायती कर्ज की सुविधा दी जाएगी।

देश के कोने-कोने में ढहते हुए सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग (एमएसएमई) को बचाने के लिए नए आर्थिक पैकेज में कुल तीन लाख सत्तर हजार करोड़ रुपए के राहत प्रावधान घोषित किए गए हैं। इसमें तीन लाख करोड़ रुपए इन इकाइयों को गारंटी मुक्त कर्ज के लिए रखे गए हैं। इसके अलावा ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आइबीसी) के तहत नई कार्रवाई को पहले घोषित छह माह की जगह एक साल तक के लिए टाल दिए जाने और सूक्ष्म, लघु और मध्यम उपक्रम के लिए दिवालिया प्रारूप लाने की घोषणा भी महत्त्वपूर्ण हैं।

पूर्णबंदी के कारण गरीबों, श्रमिकों, किसानों और निम्न मध्यमवर्गीय परिवारों की मुश्किलें ज्यादा बढ़ी हैं। ऐसे में इन वर्गों को कोविड-19 की चुनौतियों से बचाने के लिए तीन लाख सोलह हजार करोड़ रुपए की विभिन्न राहतों की घोषणा की गई है। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के लिए चालीस हजार करोड़ रुपए बढ़ाने की घोषणा की गई है।

इससे गांव लौटने वाले प्रवासी श्रमिकों को रोजगार उपलब्ध हो सकेगा। खास बात यह भी है कि जो प्रवासी मजदूर अपने राज्यों में लौटे हैं, उनके लिए भी नई योजनाएं हैं। जो मजदूर अपने घरों में लौटे हैं, वे अपने गांवों में ही मनरेगा के तहत अपना नाम वहीं पंजीकृत कर काम हासिल कर सकते हैं। मनरेगा के तहत मजदूरी एक सौ बयासी रुपए से बढ़ा कर दो सौ रुपए कर दी गई है।

प्रवासी मजदूरों और शहरी गरीबों को सस्ते किराए पर मकान दिलवाने की योजना को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत शामिल किया जाएगा। यदि उद्योगपति अपनी जमीन पर ऐसे घर बनाते हैं तो उन्हें रियायत दी जाएगी। पूर्णबंदी और ठप हुए उद्योग-कारोबार ने निम्न मध्यम वर्ग के कई नौकरीपेशा लोगों और उद्योग-कारोबार से जुड़े कई लोगों की मुस्कराहट छीनी है।

ऐसे में नए पैकेज के तहत मध्यआय वर्ग जिसकी सालाना आय छह लाख से अठारह लाख तक है, उनके लिए किफायती आवास के तहत क्रेडिट लिंक सब्सिडी स्कीम मार्च 2021 तक बढ़ाई गई है। इससे आवास क्षेत्र में करीब सत्तर हजार करोड़ रुपए का निवेश आने की उम्मीद है। अब सरकारी स्वामित्व वाली इकाइयां केवल रणनीतिक क्षेत्रों में होंगी। इसके अलावा अन्य क्षेत्रों की कंपनियों का निजीकरण किया जाएगा। रक्षा क्षेत्र के तहत सार्वजनिक क्षेत्र केवल ‘सामरिक’ क्षेत्रों में सीमित रह जाएगा और वहां भी निजी क्षेत्र को प्रवेश की अनुमति होगी। सरकार के द्वारा स्कूली छात्रों की शिक्षा के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म का विस्तार किया जाना भी लाभप्रद कदम है।

भारत आत्मनिर्भर अभियान के तहत सरकार कुल 20.97 लाख करोड़ रुपए के पांच आर्थिक पैकेजों में अच्छे प्रावधानों के साथ आगे बढ़ी है। यदि विभिन्न प्रदेश उधार लेने की बढ़ी हुई सीमा का पूरा इस्तेमाल करते हैं, तो वे बाजार से करीब 4.28 लाख करोड़ रुपए जुटा सकते हैं। इससे संबंधित प्रदेश का राजकोषीय घाटा राज्य सकल घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) का पांच फीसद बढ़ सकता है। इसी तरह ही केंद्र की अतिरिक्त 4.20 लाख करोड़ रुपए की उधारी से देश का एकीकृत राजकोषीय घाटा जीडीपी के दस फीसद तक पहुंच सकता है। नए आर्थिक पैकेजों में प्रोत्साहन से ज्यादा सुधारों पर जोर है। ये आर्थिक पैकेज विभिन्न क्षेत्रों में उदार कानूनों के जरिए साहसिक सुधार करते हुए भी दिखाई दे रहे है।

इस वक्त सरकार के समक्ष प्रवासी मजदूरों के पलायन की चुनौती कहीं ज्यादा बड़ी है। करीब आठ करोड़ प्रवासी श्रमिकों को अस्थायी रूप से ठहराना और उनके लिए भोजन मुहैया कराना चुनौतीपूर्ण काम है। साथ ही असंगठित क्षेत्र के कई लाख श्रमिक बिना किसी मदद के न रह जाएं और गरीबी के भंवर में न घिर जाएं, इस बात का भी ध्यान रखना होगा। अपने घरों को लौट चुके श्रमिकों को वापस लाना कोई आसान काम नहीं है। अब जरूरत है पैकेज और योजनाओं पर ईमानदारी और गंभीरता से अमल की। इसमें केंद्र और राज्यों दोनों को समन्वय के साथ काम करना होगा। तभी देश आर्थिक मुश्किलों से उबर पाएगा।

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