rajneeti coloumn Industrial security in the circle of questions – राजनीतिः सवालों के घेरे में औद्योगिक सुरक्षा

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विनोद कुमार

पिछले दिनों आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम शहर में एक कारखाने से जहरीली गैस के रिसाव ने ग्यारह लोगों की जान ले ली थी। इतना ही नहीं, रिसाव से गैस बड़े इलाके में फैल गई और सड़क पर कई लोग बेहोश हो कर गिर पड़े थे। इस हादसे ने एक बार फिर भोपाल गैस कांड की यादें ताजा करा दी थीं। साथ ही यह सवाल भी खड़ा हुआ कि ऐसे हादसों के बाद भी आखिर हम क्यों नहीं सतर्क हैं। इस तरह के हादसे हमारे कल-कारखानों की सुरक्षा पर भी सवाल खड़े करते हैं। मालूम हो कि भोपाल गैस हादसे में पांच हजार से ज्यादा लोग मारे गए थे। लेकिन उससे भी ज्यादा भयावह तथ्य यह है कि यूनियन कारबाइड बनाने वाले इस संयंत्र से रिसने वाली मिक (मिथाइल आइसोसाइनेट) गैस का असर लोगों के शरीर पर बरसों तक बना रहा और लोग गंभीर बीमारियों से पीड़ित हो गए। इससे भी ज्यादा दुखद यह है कि आज तक बड़ी संख्या लोगों को न्याय नहीं मिला है, न दोषी कंपनी यूनियन कारबाइड के खिलाफ कोई ऐसी कार्रवाई हुई जो एक मिसाल बनती।

हालांकि भारत में हुए औद्योगिक हादसों की सूची बहुत लंबी है और समय के साथ यह बढ़ती ही जा रही है। ज्ञात जानकारियों के अनुसार देश का सबसे पहला औद्योगिक हादसा आजादी से पूर्व 1944 में हुआ था जब मुंबई में विक्टोरिया डॉक पर 1395 टन बारूद से लदे जहाज एस.एस. फोर्ट स्टिकीन में भयंकर धमाका हुआ। इस हादसे में एक हजार से ज्यादा लोग मारे गए थे और करीब बड़ी संख्या में जख्मी हो गए थे। यह हादसा इतना भयानक था कि इसकी दहशत कई सालों तक बनी रही। इसी हादसे की याद में भारत में 14 से 22 अप्रैल को अग्निशमन सप्ताह मनाया जाता है। इसके बाद 27 दिसंबर 1975 में चासनाला खदान हादसे में तीन सौ अस्सी लोग मारे गए थे। कोल इंडिया के अंतर्गत आने वाली भारत कोकिंग कोल लिमिटेड की चासनाला कोलियरी के ऊपर स्थित एक तालाब में जमा करीब पांच करोड़ गैलन पानी खदान में भर गया गया था। इस हादसे पर 1979 में फिल्म निर्देशक यश चौपड़ा ने ह्यकाला पत्थरह्ण फिल्म बनाई थी। ऐसे ही बड़े औद्योगिक हादसों में 29 अक्तूबर 2009 को जयपुर आॅयल डिपो में आग से ग्यारह लोग मारे गए थे और इस आग को बुझाने में तीन दिन से ज्यादा लग गए थे।

लेकिन अप्रैल, 2010 में देश की राजधानी दिल्ली में एक ऐसा हादसा सामने आया जिसने सबको हिला कर रख दिया था। यह गैस रिसाव नहीं बल्कि रेडियो एक्टिव पदार्थ से निकलने वाले विकिरण का था। दिल्ली के सबसे बड़े कबाड़ बाजार में अचानक नौ लोग विकिरण का शिकार हो गए थे और इनमें से एक की मौत भी हो गई थी। विकिरण रिसाव का यह मामला एक नए तरह का हादसा था। जहां तक गैस रिसाव से होने वाले हादसों की बात है तो 1984 के भोपाल गैस रिसाव कांड के बाद भी देश में ऐसे कई हादसे हो चुके हैं। साल 1999 में ओड़िशा में एक फैक्टरी में अमोनिया गैस रिसाव, 2002 में बडोदरा में क्लोरीन गैस रिसाव, 2008 में जमशेदपुर में क्लोरीन गैस रिसाव की घटनाएं शामिल हैं।

लेकिन दुनिया के सबसे बडे औद्योगिक हादसों में से एक भोपाल गैस कांड के अलावा समय-समय पर होने वाली औद्योगिक दुर्घटनाओं से हम कोई सबक नहीं ले पाए हैं और शायद यही कारण है कि इतने सालों बाद भी देश में ऐसे हादसों को रोकने के लिए न तो व्यापक स्तर पर कुछ किया गया और न ही खतरनाक रसायनों को नियंत्रित और सीमित करने की कोई ठोस नीति अब तक बन पाई है। भोपाल गैस त्रासदी को पैंतीस वर्ष हो चुके हैं लेकिन जानलेवा मिथाइल आइसोसाइनेट गैस का प्रयोग अभी तक देश में प्रतिबंधित नहीं है। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण विभाग के मुताबिक वर्ष 2015 से 2017 के दौरान रासायनिक कारखानों में दुर्घटनाओं के कारण घायल होने वालों की संख्या में पौने तीन सौ फीसद से ज्यादा की वृद्धि हुई है। 2015-16 में चौंसठ बड़े हादसे हुए थे जिनमें छियासठ लोग मारे गए थे और दो सौ से ज्यादा घायल हुए थे। जबकि 2017-18 में महज इकत्तीस दुर्घटनाओं में उनतालीस लोगों की मौत हुई और सात सौ ज्यादा घायल हुए। ये आंकड़े इस बात का प्रमाण हैं कि भोपाल गैस त्रासदी से हमने कोई सबक नहीं लिया और हमारे कारखाने-फैक्ट्रियां सुरक्षित नहीं हैं।

सवाल है कि आखिर हमारे देश में औद्योगिक प्रतिष्ठानों की सुरक्षा के मानक क्या कमजोर हैं। हालांकि औद्योगिक हादसों को रोकने के लिए देश में कानूनों की कोई कमी नहीं है। दरअसल समस्या कानूनों को सख्ती से लागू नहीं कर पाने की है। उदाहरण के तौर पर भोपाल गैस त्रासदी से काफी पहले दवाओं के निर्माण, आयात-निर्यात और वितरण पर नियंत्रण के लिए द ड्रग एंड कॉस्मेटिक एक्ट 1940 में बना था। फिर फैक्ट्री कानून 1948 में आया जिसे भोपाल गैस कांड और 1987 में ओलियम गैस रिसाव की घटना के बाद 1987 में संशोधित किया गया था। 1962 में सीमा शिल्क कानून बना जो खतरनाक वस्तुओं के आयात-निर्यात पर नियंत्रण के लिए था। इसी तरह 1968 में कीटनाशकों के नियंत्रित इस्तेमाल के लिए कानून आया। जल प्रदूषण और वायु प्रदूषण से बचाव के लिए कानून बने। लेकिन इतना कुछ होने के बाद भी 1984 में बड़ी भोपाल गैस त्रासदी हुई थी। इस भयानक औद्योगिक हादसे के बाद पर्यावरण को ध्यान में रख कर एक महत्वपूर्ण कानून बना, जिसे हम पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के तौर पर जानते हैं। इसके बाद केंद्रीय मोटर कानून, 1988 और 1989 में हानिकारक अपशिष्ट प्रबंधन कानून बना। 1994 में औद्योगिक विस्तार पर नियंत्रण के लिए पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) कानून बना। इसके अलावा भारत कीटनाशक, मर्करी और खतरनाक कचरे के चार प्रमुख अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों का हस्ताक्षरकर्ता भी है। इनमें बेसल संधि, रॉटर्डम संधि, स्टॉकहोम संधि भी शामिल हैं। औद्योगिक हादसों को रोकने और धरती को जहरीला बनाने से रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय कानूनों की भी कमी नहीं है।

निश्चित तौर पर फैक्टरियों के कानूनी नियमन की दिशा में काफी कुछ हुआ है, लेकिन ये सब इस कारण से नाकाफी साबित हो जाते हैं क्योंकि इन पर ईमानदारी से अमल में भारी खामियां देखने को मिलती हैं। रॉटर्डम सम्मेलन में यह तय हुआ था कि आयात-निर्यात के लिए देश एक-दूसरे को रसायनों के जोखिम और खतरे के बारे में पूर्व सूचना देकर अनुमति लेंगे, लेकिन इसे भी पूरी तरह अमल में नहीं लाया गया। देश में महत्त्वपूर्ण कानून, नियम और दिशानिर्देश हमेशा बनते रहते हैं। जब भी कोई बड़ा हादसा होता है तो उसकी औपचारिक जांच होती है और फिर वह जांच रिपोर्टें कहां चली जाती हैं, कोई नहीं जानता। समस्यायह है कि हम किसी भी घटना से कोई सबक नहीं सीखते और अगली हर दुर्घटना के मूल में यही बात रहती है। तमाम कानूनों के बावजूद में खतरनाक कचरे के पहाड़ खड़े हो रहे हैं और हादसों को निमंत्रण दे रहे हैं।

यह सवाल बना हुआ है कि हम ऐसे हादसों को रोकने में कितने सक्षम हैं, खासकर तब जब सरकार भारत में विदेशी कंपनियों को उत्पादन करने के लिए प्रोत्साहित कर रही है। हालांकि विशाखापत्तनम के हादसे के बाद सरकार गैस रिसाव जैसी घटनाओं को रोकने के लिए रासायनिक दुर्घटना नियमों को संशोधित करने पर काम कर रही है। पर सवाल है कि नए सिरे से जो नियम-कायदे बनेंगे, वे लागू कितने प्रभावकारी तरीके से होंगे। कानूनों की कोई कमी नहीं है, बस उन पर अमल की समस्या है।

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