widespread change in the work culture corona virus outbreak of the encouraging work from home – राजनीति: नई कार्य संस्कृति की चुनौतियां

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अभिषेक कुमार सिंह
कई आपदाओं को इसके लिए याद रखा जाता है कि उनकी मौजूदगी के दौर में और उनके खत्म होने के बाद दुनिया वैसी नहीं रह पाती है, जैसी कि वह अरसे से थी। यह कायदा कोविड-19 के मौजूदा परिदृश्य में साकार होते हुए दिख रहा है। खासतौर से कामकाजी दुनिया पर कोरोना संकट का जो ऐतिहासिक असर हुआ है, वह अभूतपूर्व है। इस महामारी ने पूरे विश्व की कार्य संस्कृति में क्रांतिकारी बदलाव ला दिया है। धीरे-धीरे जब दुनिया से इसका खात्मा होगा, तो बहुत कुछ ऐसा होगा जिसे संपन्न कराने के लिए किसी कार्यस्थल पर जाने की बजाय घर बैठे कोई प्रबंध- जैसे कि आॅनलाइन करना होगा।

हालांकि भारत जैसे देशों की समस्या यह रही है कि यहां घर से काम करने की अवधारणा को साकार करने की कोशिशें न्यून और कुछ ही क्षेत्रों तक सीमित रही हैं। जबकि दुनिया की बदलती जरूरतों के मुताबिक ऐसे उपायों पर सतत अमल की सख्त जरूरत पैदा हो चुकी है।

घर को दफ्तर में बदलने की जरूरत रूपी अवधारणा की चर्चा पूरी दुनिया में बीते कई दशकों से हो रही है। दावा है कि दफ्तर के बजाय घर से काम करने का मूल सुझाव एक अमेरिकी प्रबंधक डेम स्टीफन शर्ली की तरफ से आया था। बीती सदी में 1960 के दशक में उन्होंने यह विचार कंपनियों के सामने रखा था कि यदि आधुनिक तकनीकियों की मदद ली जाए, तो कई दफ्तरी काम ऐसे हैं जिन्हें कर्मचारी घर से कर सकते हैं। इसके बाद के छह दशकों में तो इंटरनेट और टेली-नेटवर्किंग जैसी तकनीक तो मीलों आगे निकल आई हैं, जिनमें आइटी और बीपीओ उद्योग के बहुत से काम घर से ही कराए जा रहे हैं।

इधर, विश्वविद्यालयों से लेकर स्कूलों तक की आॅनलाइन कक्षाओं ने भी इस बहस को आगे बढ़ाया है कि यदि पढ़ाई और परीक्षा के प्रबंध कॉलेज-स्कूल आए बगैर हो सकते हैं तो कई अन्य जरूरी कार्यों को भी घर से ही संपन्न क्यों नहीं कराया जा सकता। यह बहस हवाई नहीं है, बल्कि औद्योगिक संगठन- एसोसिएटेड चैंबर्स आॅफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (एसोचैम) ने पिछले महीने देश की साढ़े तीन हजार कंपनियों के प्रबंधकों से बातचीत कर जो रिपोर्ट तैयार की है, उसका निष्कर्ष यह है कि पूर्णबंदी के बाद कंपनियां अपने दफ्तरों की रूपरेखा में बदलाव करने की तैयारी में लग गई हैं।

मानव इतिहास में यह पहला ऐसा मौका है जब पूर्णबंदी के बावजूद कुछ चीजों को छोड़ कर दुनिया का ज्यादातर कारोबार बदस्तूर चलता रहा है। लोगों को राशन-पानी मिल रहा है, दवाओं समेत कई अनिवार्य चीजों की सप्लाई यथावत है, अखबार तक छप रहे हैं और शिक्षा-परीक्षा में तारीखों में बदलाव को छोड़ कर मोटे तौर पर में ज्यादा रुकावटें नहीं आई हैं। आॅनलाइन शिक्षा को लेकर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा गठित एक विशेष कमेटी ने मानव संसाधन मंत्रालय तक से यह सिफारिश कर डाली है कि कोरोना संकट खत्म होने के बाद भी विभिन्न विश्वविद्यालयों में पच्चीस फीसद शिक्षण कार्य आॅनलाइन माध्यमों के जरिए कराया जाए।

इस नीति के तहत कॉलेजों में पचहत्तर फीसद पढ़ाई कक्षाओं में होगी, जबकि पढ़ाई का फीसद हिस्सा आॅनलाइन माध्यमों के जरिए पूरा किया जाएगा। पढ़ाई ही नहीं, इंटरनेट, स्मार्टफोन, लैपटॉप और कई तरह के ऐप ने यह तक मुमकिन कर दिखाया है कि फिल्मकारों से लेकर आम लोग भी घर बैठे कोई छोटी-मोटी फिल्म बना लें और उसे दुनिया भर में पहुंचा दें।

दुनिया चलाने के आॅनलाइन प्रबंधों का कितना ज्यादा फायदा हमारी पृथ्वी और प्रकृति को हो सकता है, यह बात पूर्णबंदी अवधि में स्वच्छ हुए पर्यावरण और जीवों को मिली आजादी के रूप में दिख रहा है। पर्यावरण को हुए इन फायदों की सूरत पूर्णबंदी खत्म होते पहले जैसी हो जाएगी, यह अंदाजा भी लगाया जा सकता है। लेकिन इस मोड़ पर आकर यदि घर से काम करने के कई अन्य लाभों पर गौर किया जाए और इन पर अमल किया जाए तो हो सकता है कि संसार की एक नई शक्ल हमारे सामने आ सके। घर को दफ्तर में बदलने की जरूरत असल में अब इसलिए भी ज्यादा है कि ज्यादातर शहरों में घरों से दफ्तर की दूरियां बढ़ रही हैं।

कामकाजी आबादी को दफ्तर पहुंचने के लिए बढ़ती दूरियों के अलावा यातायात जाम और परिवहन के बढ़ते खर्चों को भी वहन करना पड़ता है। इसी तरह व्यावसायिक इलाकों में जमीनें और दफ्तरों का किराया काफी महंगा है, जिसे चुकाना कंपनियों को भारी पड़ता है। दफ्तरों को जगमगाए रखने और वातानुकूलन की व्यवस्था करने में बिजली का बेइंतहा खर्च कई अन्य तरह के दबाव पैदा करता है।

यह बदलाव कितना असरदार हो सकता है, इस बारे में कुछ साल पहले अमेरिकी नागरिकों पर किए गए एक सर्वेक्षण में टेक्सास विश्वविद्यालय और रोसेस्टर इंस्टीट्यूट आॅफ टेक्नोलॉजी के शोधकतार्ओं ने एक अध्ययन में बताया था कि वर्ष 2003 के मुकाबले में 2012 में अमेरिकी नागरिकों ने औसतन 7.8 दिन ज्यादा घर पर काम करते हुए बिताए। इसका सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि अमेरिका में बिजली की मांग वर्ष 2012 में 1700 खरब यूनिट (बीटीयू- ब्रिटिश थर्मल यूनिट) की कमी आई। यह अमेरिका की कुल सालाना बिजली खपत का 1.8 फीसद है। इसके बजाय अगर लोग काम करने के लिए दफ्तर जाते तो यात्रा (अपनी कार, बस या मेट्रो आदि के जरिये) में बिजली और जीवाश्म ईंधन की खपत बढ़ती जिसका असर ग्लोबल वॉर्मिंग आदि रूपों में पृथ्वी की सेहत पर पड़ता।

घर से काम करने की अवधारणा को लेकर कुछ बुनियादी सवाल भी हैं। जैसे कि यह क्या घर से काम की नीति कर्मचारियों की तरक्की पर नकारात्मक असर तो नहीं डालती। साथ ही, आशंका यह भी है कि सिर्फ किसी आपदा के समय में आॅनलाइन कामकाज के आधे-अधूरे प्रबंध कहीं हालात बिगाड़ने वाले तो साबित नहीं होंगे। ये सवाल बेमानी नहीं हैं। ज्यादातर प्रबंधकों को यह लगता है कि घर बैठा कर्मचारी दफ्तर से ज्यादा घर के काम ही निपटाता है।

ऐसे कर्मचारियों को प्रबंधक योग्य होने के बावजूद तरक्की देना पसंद नहीं करते हैं और उन्हें कम वेतनवृद्धि देते हैं। लेकिन इससे बड़ी समस्या सिर्फ फौरी तौर पर कामकाज को आॅनलाइन कर देने के तात्कालिक प्रबंधों से पैदा होती है। ज्यादातर भारतीय घरों को इस तरह डिजाइन नहीं किया गया है कि कोई अवसर पड़ने पर घर के किसी कोने को वास्तविक दफ्तर में तब्दील किया जा सके और वहां से आसानी से कामकाज संपन्न कराया जा सके। ऐसी स्थितियां पैदा होने पर लोग या तो अपने बेडरूम या बैठक के सोफे पर ही बैठ कर कोई काम करते या आॅनलाइन कक्षाएं लेते नजर आते हैं।

समस्या का दूसरा छोर इंटरनेट की गति से जुड़ा है। पूर्णबंदी होने पर जैसे ही कामकाज का बोझ इंटरनेट पर पड़ा, मालूम हुआ कि देश में इंटरनेट की गति मंद पड़ गई है। सबसे ज्यादा हास्यास्पद स्थिति आॅनलाइन शिक्षण के कामकाज में देखने को मिली, जहां शिक्षक अपनी रौ में पढ़ाते चले गए, लेकिन छात्रों की शिकायत रही कि खराब नेटवर्क के चलते उनके पल्ले कुछ भी नहीं पड़ा।

निश्चय ही वक्त आ चुका है कि घर से काम करने की इस की अवधारणा को साकार करने के लिए बुनियादी ढांचे में सुधार किया जाए और इसे स्वीकार किया जाए कि कई तरह के कामकाज घर को दफ्तर बनाते हुए संपन्न हो सकते हैं। लेकिन यह भी समझना होगा कि कभी-कभार आधे-अधूरे प्रबंधों के साथ घर को दफ्तर में तब्दील करने की मजबूरी सिर्फ उसी क्षेत्र के कामकाज के लिए नुकसानदेह नहीं
, बल्कि पूरे देश और उसकी अर्थव्यवस्था को भी पटरी से उतार सकती है।

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