World Food Program warned the world’s governments to prepare for crisis of starvation after covid pandemic – राजनीति: अब भुखमरी का भी खतरा

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संजय दुबे
समूची दुनिया के सामने अब एक और खतरा आ रहा है और यह है भुखमरी का खतरा। विश्व खाद्य कार्यक्रम (डब्ल्यूएफपी) के प्रमुख डेविड वेस्ले ने चेताया है कि भुखमरी के आसन्न संकट के लिए भी दुनिया की सरकारों को तैयार रहने की जरूरत है। एक अनुमान के मुताबिक पूरी दुनिया में पच्चीस करोड़ लोग और भुखमरी का शिकार हो सकते हैं, जो किसी भी हालत में विश्व के लिए ठीक नहीं है। दुनिया में पहले ही तकरीबन बयासी करोड़ लोग भूख की समस्या का सामना कर रहे हैं। फिर आज के हालात में जब कोरोना महामारी ने पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया है, यह संकट और गहरा सकता है। यह गंभीर चिंता का विषय इसलिए भी है क्योंकि महामारी के साथ भुखमरी भी दुनिया के लिए और नई समस्याएं खड़ी करेगी। इसका नतीजा यह होगा कि आबादी और सरकारों पर अनावश्यक दवाब बनेगा और विकास प्रभावित होगा।

दुनिया के ज्यादातर गरीब देशों में इस वक्त हालात विकट हैं। डब्ल्यूएफपी का कहना है कि अगर विकसित और समृद्ध राष्ट्रों ने जल्द ही इस पर ध्यान नहीं दिया तो इसका असर उन पर भी पड़ेगा। कोविड-19 की वजह से चलते दुनिया में भुखमरी की जो हालात बनी है वह चौंका देने वाली है। माना जा रहा है कि आने वाले महीनों में दुनिया में तीन करोड़ लोग इसका शिकार हो सकते हैं। जहां दक्षिण एशिया के कुछ देश सूखे जैसी स्थिति झेल रहे हैं, वहीं यमन, कांगो, हैती, नाइजीरिया, सूडान, सीरिया, अफगानिस्तान जैसे मुल्कों की हालत भी ठीक नहीं है। सूडान की साठ फीसद आबादी पहले से ही सूखे के चलते खाद्यान्न संकट से जूझ रही है।

इस वक्त डब्ल्यूएफपी की चिंता यह है कि वैश्विक खाद्य कार्यक्रम के लिए उसे धन मुहैया कराने वाले सारे देश अमेरिका, जर्मनी, इटली ,फ्रांस आदि कोविड-19 से जूझ रहे हैं। इन सभी देशों की स्थिति इतनी खराब हो चुकी है कि इन्हें अपना देश चलाने के ही लाले पड़ रहे हैं तो वैश्विक संगठनों को मदद कैसे दें, यह बड़ा सवाल है। ऐसे में विकसित देशों से मदद नहीं मिलने पर डब्ल्यूएफपी हाथ खड़े कर सकता है।

विश्व खाद्य कार्यक्रम के तहत रोजाना दस करोड़ लोगों को खाद्य मुहैया कराया जाता है। इनमें भी तीन करोड़ लोग तो पूरी तरह इस कार्यक्रम के भरोसे ही जी रहे हैं। अब प्रश्न यह है कि जब समूची दुनिया में इस तरह के खतरे बताए जा रहे हैं तब भारत जैसे देश का क्या होगा, जहां दुनिया के कुल भूखे लोगों का तेईस फीसद है। अभी भी एक मोटे अनुमान के मुताबिक भारत में बीस करोड़ लोग रोज भूखे सोते हैं। वैश्विक भुखमरी सूचकांक की पिछले साल की रिपोर्ट के मुताबिक भुखमरी के मामले में हमारी स्थिति दयनीय ही बनी हुई है। एक सौ सत्रह देशों की सूची में हमारा स्थान एक सौ दो वां है।

साल 2014 के बाद से भुखमरी के मामले में हमारा प्रदर्शन सुधरा नहीं है, बल्कि बिगड़ा है। बस, तसल्ली इस बात की हो सकती है कि 2018 में भारत का स्थान एक सौ तीन वां था। मगर यह भी ध्यान देने की बात होगी कि उस समय जहां उस सूची में 119 देश थे, वहीं पिछले साल इसमें एक सौ सत्रह देशों को शामिल किया गया था। साल 2014 में भारत इस सूचकांक में छिहत्तर देशों की सूची में पचपन वें स्थान पर था। जबकि हमारे पड़ोसी देशों की स्थिति हमसे बेहतर रही है। पाकिस्तान चौरानवे वें, बांग्लादेश अट्ठासी वें, नेपाल तिहत्तर वें और श्रीलंका छियासठ वें स्थान पर रहा था।

भुखमरी का सूचकांक बनाते समय जिन खास बिंदुओं को ध्यान में रखा जाता है, उनमें सबसे कम पोषण, पांच साल से कम उम्र के बच्चे जिनकी लंबाई कम हो, उम्र के हिसाब से जिनका वजन कम हो और पर्याप्त खाद्य व पोषण नहीं मिलने से हुई मौतें। इन्हीं चार बिंदुओं को आधार बनाकर आयरलैंड की संस्था- कन्सर्न वर्ल्डवाइड और जर्मनी की वेल्थुंगरहिल्फे संस्था सबको सौ में अंक प्रदान करती है। भारत ने पिछली बार इसमें 30.3 अंक प्राप्त किए थे। भुखमरी से लड़ने में हमारी स्थिति क्या है, यह इससे साफ हो जाता हा। ऐसे ही एक और अध्ययन पर गौर करने की जरूरत है जिसके मुताबिक भारत में तकरीबन सत्ताईस करोड़ लोग गरीबी रेखा से बाहर हो गए हैं। इस वैश्विक बहुआयामी गरीबी सूचकांक का आधार क्या है? इस पर गौर करने पर पता चलता है कि गरीबी भारत में कम कैसे हुई। इसमें संपत्ति, खाना पकाने का ईंधन, स्वच्छता और पोषण जैसे बिंदुओं को आधार बनाया गया है।

हालांकि वैश्विक संस्थानों की रिपोर्टों को लेकर कई बार विवाद भी खड़े होते रहे हैं। इसे ऊपर वर्णित बिंदुओं के आधार पर जांचा जा सकता है। जैसे-संपत्ति। इसमें नगदी भी शामिल होती है। बैंक खाते की भी जरूरत होगी। इसे बेहतर ढंग से सिर्फ एक बिंदु के अध्ययन से ही समझा जा सकता है। वह है खाना पकाने के लिए उपलब्ध ईंधन का मापदंड। सभी को पता है कि पिछलें कई सालों से सरकार की एक बहुप्रचारित और लोकप्रिय योजना काम कर रही है प्रधानमंत्री उज्जवला योजना। जिसमें गरीबों को रसोई गैस सिलेंडर मुहैया कराया गया है। इस योजना ने भारत में गरीबों की संख्या को अप्रत्याशित रूप से कम किया।

इसी के चलते भारत गरीबी दूर करने वाले देशों की सूची में अपना नाम दर्ज कराने में सफल रहा। पर हकीकत में गरीबों की तादाद आश्चर्यजनक रूप से अभी भी ज्यादा है। यह संकट और ज्यादा इसलिए गहराता जा रहा है कि पिछले दो महीनों में देश में लाखों मजदूरों का जिस तरह से पलायन हुआ है, उसने उन्हें और ज्यादा गरीबी में धकेल दिया है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आइएलओ) के मुताबिक भारत में कुल मजदूरी से प्राप्त आय का उनहत्तर फीसद हिस्सा दस फीसद लोगों के पास चला जाता है। जबकि निचले तबके के दस फीसद लोगों के पास 0.25 फीसद आय पहुंचती है।

भारत में एक बढ़ती बेरोजगारी एक विकराल समस्या का रूप धारण कर चुकी है। खासतौर से पिछले दो महीनों में। ज्यादातर आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि पूर्णबंदी खत्म होने के बाद ही बेरोजगारों की सही तस्वीर सामने आ पाएगी। एक मोटे अनुमान के मुताबिक पूरे देश में आठ करोड़ से ज्यादा प्रवासी मजदूर हैं। आॅनलाइन नौकरी मुहैया कराने वाली एक कंपनी के मुताबिक परिवहन, होटल, खुदरा कारोबार में रोजगार के मौके साठ फीसद कम हो चुके हैं। यही हाल सेवा क्षेत्र का भी है। लेकिन सबसे ज्यादा मिश्किल असंगठित क्षेत्र की है जिसके कामगारों की सही तादाद किसी को नहीं मालूम। ग्रामीण क्षेत्रों में हालात और खराब हैं। बड़ी संख्या में ऐसे गरीब किसान और मजदूर हैं जो किसी सरकारी एजेंसी में दर्ज नहीं हैं।

पिछले दो महीनों में तो भारत में रोज कमाने खाने वाले पहले से भी बुरे हालात में पहुंच गए हैं। करोड़ों लोगों का कामधंधा बंद हो गया है। ज्यादातर लोगों के हाथ में जरा भी नगदी नहीं बची है। सरकारी मदद ऊंट के मुंह में जीरा साबित हो रही है। लाखों लोग ऐसे हैं जिनके पास राशन कार्ड और बैंक खाते नहीं हैं। ऐसे में किसी भी नाममात्र की सरकारी मदद से बाहर हो चुके हैं। यही वह तबका है जो आने वाले दिनों में भुखमरी के हालात का सामना करने के लिए तैयार बैठा है। पूर्णबंदी करने से पहले अगर सरकार ने मानवीय पक्ष पर जरा विचार किया होता तो भारत एक बड़े गंभीर संकट से बच सकता था।

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