jansatta raajneeti column era of information revolution technically competent nations are constantly progressing – राजनीतिः नई शिक्षण पद्धति की जरूरत

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अनुराग सिंह

एक विकासशील देश के रूप में भारत की छवि अब मजबूत हो रही है। अपनी शिक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ और बेहतर मानव संसाधन तैयार कर इसे और मजबूत किया जा सकता है। हमारे यहां शिक्षा व्यवस्था के विविध रूप दिखाई देते हैं। तकनीकी शिक्षा के लिए उत्कृष्ट भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान हैं, तो यहीं ये आरोप भी लगते हैं कि चौरानबे प्रतिशत इंजीनियर अपने कार्य में दक्ष नहीं होते और शीर्ष दस कंपनियां केवल बचे हुए छह प्रतिशत इंजीनियरों को अपने यहां नौकरी पर रखने में प्राथमिकता देती हैं। तकनीकी, प्रबंधन, शोध कार्यों के लिए हमारे ही देश में उत्कृष्ट संस्थान भी हैं, वहीं बेहद औसत या औसत से कम दर्जे के संस्थान भी बड़ी संख्या में मौजूद हैं, जहां आज केवल डिग्रीधारक निकलते हैं, लेकिन वे अपने क्षेत्र में बेहतर मानव संसाधन के तौर पर उपयोगी साबित नहीं होते। संसाधनों के अभाव में हमारे बहुत से संस्थान अपेक्षाकृत पिछड़े हुए हैं, जहां आज भी बहुत परंपरागत तरीके से शिक्षण कार्य हो रहा है। नए विषयों से विद्यार्थी को अधिक से अधिक परिचय प्राप्त कराना इन संस्थानों की जिम्मेदारी होनी चाहिए, मगर ऐसा हो नहीं पा रहा है। भारत के अधिकतर ग्रामीण और दूर-दराज के क्षेत्रों में ऐसी तमाम समस्याएं मौजूद हैं।

सूचना क्रांति के इस दौर में तकनीकी रूप से सक्षम राष्ट्र लगातार उन्नति कर रहे हैं। हमें भी तकनीकी की सहायता लेकर अपने उत्कृष्ट संस्थानों को उसी क्षेत्र के अन्य संस्थानों से जोड़ कर उनकी गुणवत्ता में वृद्धि करने की योजना पर विचार करना चाहिए। भारत की अधिकांश आबादी ग्रामीण है और प्राथमिक शिक्षा के लिए ग्रामीण जनसंख्या अधिकतर गांवों की प्राथमिक पाठशालाओं पर निर्भर है। एएसईआर की रिपोर्ट के मुताबिक प्राथमिक स्तर के ग्रामीण विद्यालयों की दशा चिंताजनक है। इस रिपोर्ट के अनुसार सामान्य विद्यार्थी अपने से निचली कक्षा के बेहद सामान्य पाठ को धाराप्रवाह पढ़ पाने, जोड़-घटाने के बेहद मामूली सवालों को हल कर पाने में अक्षम हैं, ऐसी जगहों पर आॅनलाइन पाठ्यक्रम ले जाने से पहले कुछ सवालों के जवाब ढूंढ़े बिना यह कार्य व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है।

छोटे बच्चों के लिए ऐसे पाठ्यक्रम किसी की मदद लिए बिना पढ़ना संभव नहीं है, क्योंकि वे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को स्वयं संचालित कर पाने में अक्षम होंगे। ऐसे में जिन परिवारों में कोई व्यक्ति इन सबसे जुड़ा नहीं है, उसके लिए यह व्यवस्था बहुत लाभकारी नहीं होने वाली है। माध्यमिक स्तर की स्थिति भी ऐसी ही है। गावों के कुछ बच्चे सटे हुए शहरों या कस्बों तक अपनी पहुंच बना पाते हैं। ऐसे में अगर आज हम आॅनलाइन शिक्षा की बात करते हैं, तो सोचना होगा कि हम इनमें से कितने प्रतिशत ग्रामीण बच्चों तक अपनी पहुंच बना पाने में सक्षम हो पाएंगे?

अभी केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री ने छठी से आठवीं तक के बच्चों के लिए इ-पाठशाला की शुरुआत की, जहां बच्चों को हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू और संस्कृत से संबंधित वैकल्पिक शिक्षा इ-लिंक के जरिए उपलब्ध कराई जाएगी। इस इ-पोर्टल का स्वागत होना चाहिए, लेकिन सोचने वाली बात यह है कि इसकी सहायता से हम कितने लोगों तक पहुंच पाने में सफल होंगे? अगर अधिकांश ग्रामीण विद्यार्थियों तक अपनी पहुंच न बना पाए तो फिर इसको बहुत ज्यादा सफल नहीं कहा जा सकेगा। इसकी सफलता उन तक अधिकाधिक पहुंच से ही संभव मानी जाएगी।

तीसरे स्तर पर, उच्च शिक्षा के क्षेत्र में ऑनलाइन शिक्षा पद्धति को लागू करना अपेक्षाकृत अधिक आसान है, क्योंकि इस अवस्था में वे विद्यार्थी उपकरण संचालन के मामले में आत्मनिर्भर हैं। चिकित्सा, तकनीकी, प्रबंधन आदि विषयों की पढ़ाई करने वाले विद्यार्थी इस मंच का उपयोग आसानी से कर सकते हैं और कर रहे हैं। बड़े कॉलेज और कोचिंग संस्थान इसका उपयोग पहले से कर रहे हैं। दिल्ली के इंदिरा गांधी दिल्ली टेक्निकल यूनिवर्सिटी फॉर वुमन इस वर्ष मार्च से ऑनलाइन शिक्षण कार्य संचालित कर रहा है और अभी हाल में ही उसने मध्यावधि परीक्षा भी आयोजित कर ली, जो सफलतापूर्वक संपन्न हुई। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में दूर-दराज के गांवों में भी पारंपरिक विषयों का पठन-पाठन होता है, क्या वे सभी विद्यार्थी इस शिक्षा पद्धति से अपने को जोड़ कर आसानी से इस कार्य को संचालित कर सकते हैं? इसका उत्तर है नहीं।

गरीबी से जूझते देश में जहां हर व्यक्ति के पास पेट भरने को भोजन नहीं है, उसके पास इस तरह का इलेक्ट्रॉनिक उपकरण का न हो पाना, जिसमें इ-लर्निंग या ऑनलाइन शिक्षण आसानी से संचालित हो पाए, एक व्यावहारिक समस्या है। दूर-दराज के गांवों में नेटवर्क की बड़ी समस्या है। भारत के सामान्य गांवों में अभी ऐसी समस्याएं मौजूद हैं, तो आदिवासी इलाकों में इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। आदिवासी क्षेत्रों में क्या यह आॅनलाइन शिक्षण व्यवस्था पहुंच पाएगी?

भारत के शहरों और गांवों में शिक्षा के स्तर में फर्क आसानी से दिख जाता है। किसी भी तकनीकी, चिकित्सा या प्रबंधन पाठ्यक्रम की पढ़ाई तथा शोध कार्य के लिए हम अपनी संरचना में शहरों पर ही आधारित हैं। उच्च शिक्षा में इनकी पढ़ाई हेतु गांवों को सक्षम नहीं बनाया गया है। अब अगर भारत की अधिकांश आबादी गांवों में बसती है, तो ऑनलाइन शिक्षा के लिए पहले उस स्तर का बुनियादी ढांचा तैयार करना होगा, तब जाकर हम इसके लिए कदम आगे बढ़ा पाएंगे, वरना इस तरह के मंच शहरी विद्यार्थियों के लिए ही ज्यादा लाभप्रद होंगे। ग्रामीण विद्यार्थी और ज्यादा पिछड़े हुए नजर आएंगे। जबकि वास्तव में हमें इसके माध्यम से ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों की शिक्षा पद्धति में आए अंतर को पाटने की कोशिश करनी चाहिए।

संसाधन के अभाव में विद्यालयी स्तर के जो बच्चे बहुत-सी जानकारियों और विज्ञान के नए विषयों से परिचित नहीं हो पाते थे, अब ऑनलाइन शिक्षा के माध्यम से उन्हें उन चीजों को दिखाया-समझाया जा सकता है। शिक्षा की वर्तमान स्थिति में शहरी वर्चस्व कायम है और संसाधनों के अभाव में ग्रामीण होनहार छात्र अपेक्षाकृत पीछे रह जाते हैं। ऑनलाइन शिक्षण पद्धति इसमें एक महत्त्वपूर्ण और कारगर भूमिका अदा कर सकती है। आर्थिक और अन्य कारणों से शहरों में जाकर पढ़ाई न कर पाने वाले विद्यार्थियों के लिए यह किसी वरदान से कम नहीं होगा।

ग्रामीण क्षेत्र के विद्यालयों में प्रोजेक्टर की सहायता से एक इ-क्लासरूम की संरचना में बहुत अधिक धन खर्च न कर उन बच्चों को अच्छी गुणवत्ता की शिक्षा मुहैया कराई जा सकती है। अपने-अपने क्षेत्र के दिग्गजों के साथ उनके वार्तालाप सत्रों को इन माध्यमों से रखा जा सकता है। शहरों में ऐसी गतिविधियां होती रहती हैं, लेकिन अब ग्रामीण इलाकों में भी आसानी से हो सकती हैं। वर्तमान में बहुत सारे ऑनलाइन ऐप पर पठन-पाठन हो रहा है। उनकी सहायता से अपनी पूरी आबादी के आधार को मजबूत करने का मौका अब तकनीक की सहायता से संभव हो पाया है, तो हमें इसे गंवाना नहीं चाहिए। हां, एक समस्या यह है कि सूचना क्रांति के इस युग में जहां अंग्रेजी भाषा की प्रधानता है, बहुतायत ग्रामीण जनसंख्या खुद को इन सबसे जोड़ पाने में अक्षम महसूस करती है, क्योंकि वे क्षेत्रीय भाषाओं में स्वयं को ज्यादा सहज महसूस करते हैं, इसलिए शिक्षण के इन मंचों पर क्षेत्रीय भाषाओं को बढ़ावा देने पर जोर होना चाहिए।

ऑनलाइन शिक्षण पद्धति से हम अब पीछे नहीं हट सकते, यह भविष्य को सुनहरा बनाने का एक बेहतर साधन है। हमें इसकी कमियों को दूर करते हुए सकारात्मक दृष्टिकोण से आगे बढ़ना होगा, ये सुनहरे भविष्य की ओर बढ़ने वाले कदम हैं। भारतीय ग्रामीण शिक्षा व्यवस्था के साथ-साथ कम गुणवत्ता वाले संस्थानों को व्यापक स्तर पर इससे सुधारा जा सकता है।

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