jansatta raajneeti column flood like crisis may complicate the task of dealing with Corona – राजनीतिः बाढ़ प्रबंधन का भी वक्त

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सुविज्ञा जैन

देश इस समय दोहरी आपदा से गुजर रहा है। आर्थिक मंदी से हम पहले से ही जूझ रहे थे। इस बीच कोरोना महामारी ने भी कहर बरपा दिया। महामारी को फैलने से रोकने के लिए देशव्यापी पूर्णबंदी जैसा कठोर और अपरिहार्य कदम उठाना पड़ा। इसका सीधा यह हुआ कि आर्थिक मंदी और बेरोजगारी की हालत और खराब हो गई। एक के बाद एक बढ़ते संकट के इस दौर में हमें यह भी सोच कर चलना चाहिए कि अब कोई नई विपदा और न आ जाए। मौसम के लिहाज से सोचें तो ऐसी ही एक संभावित आपदा है बाढ़। भले ही यह अंदेशा दूर की बात लगे, लेकिन इस बारे में सोचना इसलिए जरूरी है कि बाढ़ जैसा संकट कोरोना से निपटने के काम को और उलझा सकता है।

पिछले कुछ साल से सामान्य बारिश के दिनों में ही जहां-तहां बाढ़ की तबाही मचने लगी है। मसलन, पिछले साल ही मौसम विभाग के सामान्य बारिश के अनुमान के बावजूद देश के तेरह राज्य बाढ़ की चपेट में आ गए थे। दस लाख से ज्यादा लोगों को घरों से भाग कर सुरक्षित जगह तलाशनी पड़ी थी। सैकड़ों जानें गईं थीं और हजारों करोड़ का नुकसान हुआ था। पिछले साल तो जैसे-तैसे हालात से निपट लिया गया, लेकिन इस बार हम पहले से ही कई विपदाओं से घिरे हैं। ऐसे में अगर हर साल जैसी अफे-दफे इस बार भी हो गई तो मुश्किल हो जाएगी। कोरोना को लेकर स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुमान भी गौरतलब हैं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि अभी दो-तीन महीने तक कोरोना से बचाव के लिए सुरक्षित दूरी की जरूरत बनी रहेगी। उधर बाढ़ के अंदेशे का समय भी करीब दो महीने बाद आने को है। उस दौरान अगर बाढ़ के हालात बने और लोगों को घरों से निकाल कर कहीं एक साथ रखना पड़ा तो कोरोना से बचाव के लिए की जा रही सारी कवायद पर पानी फिर सकता है। इसलिए कोरोना के मददेनजर हमें अभी से बाढ़ प्रबंधन के काम पर लगने की जरूरत है। भारत में दक्षिण पश्चिमी मानसून आमतौर पर एक जून को दाखिल होता है और पंद्रह जून तक पूरे देश में फैल जाता है, यानी हमारे पास कुछ करने के लिए बस एक-डेढ़ महीने का ही समय बचा है।

कुछ साल से बाढ़ एक स्थायी समस्या बन गई है। देश में जहां एक तरफ हर साल एक बड़ा भू-भाग पानी की किल्लत यानी सूखे से जूझता है, वहीं हर साल कई राज्य बाढ़ की चपेट में आ जाते हैं। यह भी हैरत की बात है कि जहां बाढ़ आती है, उन्ही इलाकों में कुछ महीने बाद पानी की किल्लत हो जाती है। एक ही साल में बाढ़ और सूखे की इस विसंगत स्थिति के लिए जल कुप्रबंधन से बेहतर और क्या शब्द हो सकता है? बहरहाल मौके पर याद करने की बात यह है कि कोरोना से बचाव में उलझे इस नाजुक वक्त में हम इस साल बाढ़ झेलने की स्थिति में बिल्कुल भी नहीं है। ऐसे में बाढ़ से बचाव की तैयारी को एक तरह से कोरोना के कहर से बचाव का ही काम समझा जाना चाहिए।

यह वक्त बाढ़ प्रंबधन के काम को प्रबंधन प्रौद्योगिकी की नजर से भी देखने का है। इस तथ्य को बार-बार दोहराने की जरूरत है कि देश में एक ही साल में बाढ़ और सूखे का सबसे बड़ा कारण यह है कि हम बारिश के पानी को रोक कर नहीं रख पाते। कुछ दशक पहले तक यह संकट इतना बड़ा नहीं दिखता था। उस दौर में जब भलभला कर पानी बरसता था, तब वह पानी नदियों को उफनाता हुआ वापस समुद्र में चला जाता था। तब नदियों के पाट भी खूब चौड़े थे। लेकिन बढ़ती आबादी ने बसावट के लिए नदियों से सट कर बस्तियां बसा लीं। इधर बढ़ी आबादी के लिए पानी की जरूरत भी बढ़ गई। लेकिन उस लिहाज से बारिश के पानी को गर्मियों के लिए सहेज कर रखने का प्रबंध उतना नहीं हुआ। जल विज्ञान के विशेषज्ञ हर साल बताते हैं कि हमें अपनी बढ़ती जरूरत के मुताबिक जल भंडारण क्षमता बढ़ाने की जरूरत है। लेकिन ऐसा अब तक नहीं हो पाया है। इसीलिए काफी बड़े इलाके में पहले बाढ़ आती है और कुछ महीने बाद ही देश के ज्यादातर हिस्से सूखे का भी सामना करते हैं।

आखिर जल भंडारण क्षमता बढ़ाने में दिक्कत कहां है? इसे समझने के लिए देश में वर्षा जल उपलब्धता और जल भंडारण की वर्तमान स्थिति पर नजर डालना जरूरी है। भारत को प्रकृति से हर साल चार हजार अरब घनमीटर पानी मिलता है। लेकिन हमारी जल भंडारण क्षमता सिर्फ 257.8 अरब घनमीटर है, यानी हम मानसून के चार महीनों मे मिले कुल पानी का सिर्फ साढ़े छह फीसद हिस्सा ही अपने जलाशयों या दूसरी जल सरंचनाओं में जमा करके रख पाते हैं। हमारे पास पर्याप्त जल उपलब्ध है, पर संकट पैसे का है। अगर बहस कराई जाए तो बात केन-बेतवा नदी जोड़ परियोजना के जिक्र तक जाएगी और आखिर में निकल कर यही आएगा कि दिक्कत आर्थिक संसाधनों की ही है। इन नदी जोड़ परियोजनाओं के तहत कई श्रृंखलाबद्ध बांध बनने थे। हो सकता है कि पैसे की अड़चन अब तक वाजिब कारण रहा भी हो, लेकिन आज जब भारी मंदी और बेरोजगारी से निपटने के लिए ताबड़तोड़ सरकारी खर्च बढ़ाना मजबूरी बन गया हो तो एक बार जरूर सोचा जाना चाहिए कि जल प्रबंधन का काम प्राथमिकता पर रखने से कितना कुछ हासिल हो सकता है।

एक बार यह बात फिर दोहरा लेनी चाहिए कि देश पहले ही एक महामारी से जूझ रहा है। अगर बाढ़ आई तो वह पिछले सालों के मुकाबले ज्यादा बड़ी चुनौतियां पेश करेगी। यह भी ध्यान में रखना जरूरी है कि बाढ़ नियंत्रण का काम इतना बड़ा है कि आने वाले दो महीने भी कम पड़ेंगे। ऐसे में बाढ़ की रोकथाम और उसके आने की स्थिति में राहत और बचाव के काम की तैयारी अभी से करने की दरकार है।

एक और नुक्ते पर गौर करने की जरूरत है। वह यह कि केंद्रीय जल आयोग की साप्ताहिक रिपोर्ट के मुताबिक मई के पहले हफ्ते तक पिछले साल के मुकाबले हमारे जलाशय तिरसठ फीसद ज्यादा भरे हुए हैं और सिर्फ पिछले साल के मुकाबले ही नहीं, बल्कि पिछले दस साल के औसत के हिसाब से भी ये जलाशय डेढ़ गुना ज्यादा भरे हुए हैं। यानी अपने जलाशयों में पहले से भरा पानी अगर महीने भर के भीतर खर्च न किया गया तो ऐन मौके पर बांधों को फौरन खाली करने की जरूरत पड़ सकती है। बाढ़ की आशंका में इन बांधों में भरे पानी के प्रबंधन के काम पर सिंचाई विभाग के इंजीनियरों को अभी से लगा दिया जाना चाहिए। दूसरी ओर शहरी इलाकों में जल निकासी को दुरुस्त करने के काम युद्धस्तर पर शुरू करने की जरूरत है। वरना कोरोना काल में लोगों को पानी के भराव वाले इलाकों से निकाल कर अगर राहत शिविरों में रखना पड़ा तो भारी मुश्किल खड़ी हो जाएगी। राहत कार्यों की विस्तृत कार्ययोजना बनाने में भी अच्छा खासा समय लगता है। इसलिए यह काम भी अभी से करने की जरूरत है। महामारी के बीच आपदा प्रबंधकों और राहत कर्मियों को अलग से प्रशिक्षण देने की दरकार है। हमारे पास इन सारे कामों के लिए बस दो महीने ही है। आपदा आने के पहले उसके प्रभाव को कम से कम रखने की तैयारी पहले से ही करनी पड़ती है। आपदा प्रबंधन के नियम यही कहते हैं।

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