nation needs Strong opposition development role of weak role and policyless leaders misguide – राजनीति: संकट में विपक्ष की भूमिका

0
64
.

प्रभात झा
कोरोना महामारी का सामना करते हुए हमें पचास दिन से अधिक हो गए हैं। मानवता की सेवा में व्यक्ति, परिवार, समाज, संस्था सभी अपने-अपने स्तर पर लगे हुए हैं। संकट की इस घड़ी में आज जब भारतीय लोकतंत्र के बारे में सोचता हूं, तो सहसा मन में आता है कि देश में विपक्ष की क्या स्थिति हो गई है! ऐसा इसलिए है, क्योंकि लोकतंत्र की सफलता के लिए विपक्ष की सबलता भी जरूरी है। पिछले वर्षों में विपक्षी दलों की स्थिति का जो सच सामने आया है, वह चिंताजनक है। आज विपक्ष का जो रवैया है, वह लोकतंत्र के लिए स्वस्थ्य नहीं है। सरकार और संगठन के समन्वय से कोरोना के खिलाफ जो युद्ध लड़ा जा रहा है, पूरा विश्व इसकी प्रसंशा कर रहा है।

लोकतंत्र में दल की संगठनात्मक मजबूती जरूरी है, जो कार्यकर्ताओं से बनता है। संकट की इस घड़ी में पूरा देश पक्ष और विपक्ष की भूमिका के बारे में सोच रहा है। देश में आज आठ राष्ट्रीय, तिरपन क्षेत्रीय और दो हजार से ज्यादा गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल हैं। आठ राष्ट्रीय राजनीतिक दलों में भारतीय जनता पार्टी (1980), भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (1885), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (1925), मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (1964), बहुजन समाज पार्टी (1984), तृणमूल कांग्रेस पार्टी (1998) और नेशनल पीपल्स पार्टी (2013) हैं। प्रमुख क्षेत्रीय दलों में द्रविड़ मुनेत्र कषगम (1949), शिवसेना (1966), झारखंड मुक्ति मोर्चा (1972), समाजवादी पार्टी (1992) और राष्ट्रीय जनता दल (1997) हैं। कोरोना माहामारी के संकट की इस घड़ी में ये राजनीतिक दल कहां हैं? क्या इन राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीतिक दलों की नजरों में लोकतंत्र का मतलब केवल चुनाव लड़ना और सत्ता में आना है?

लगभग एक सौ पैंतीस वर्षों के इतिहास में कांग्रेस की भूमिका को दो भागों में देखा जाना चाहिए। मोतीलाल नेहरू से लेकर जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा तक कांग्रेस पार्टी को अगर देखा जाए तो किसी भारतीय के लिए समझना यह कठिन नहीं है कि कांग्रेस एक वंश की पार्टी है, देश की जनता से अधिक इन्हें अपने परिवार और कुनबे की चिंता है। 2019 के चुनाव में पार्टी की हार के बाद राहुल गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा देते हुए कहा था कि गांधी परिवार का कोई अध्यक्ष अब कांग्रेस अध्यक्ष नहीं बनेगा।

कुछ दिनों बाद ही सोनिया गांधी पुन: कांग्रेस अध्यक्ष बनीं। कथनी और करनी में अंतर से विश्वसनीयता घटती है। राजनीतिक दल आत्मीयता से बनता है, संगठन ढांचे से बनता है, व्यवस्था से बनता है। लेकिन आज कांग्रेस में इसका अभाव है। जिस कांग्रेस ने छह दशक तक देश में शासन किया, उसने केवल गांधी परिवार की चिंता की, उनके एजेंडे में न कभी संगठन रहा, न कार्यकर्ता, न भारत रहा न कभी भारत की जनता। कुछ अपवाद को छोड़ दें तो, व्यक्ति, वंश और परिवार आधारित सभी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीतिक दलों की स्थिति यही रही है, चाहे बहुजन समाजवादी पार्टी हो, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी हो, तृणमूल कांग्रेस पार्टी हो, समाजवादी पार्टी हो, राष्ट्रीय जनता दल हो, द्रविड़ मुनेत्र कषगम हो या कोई अन्य दल। यही कारण है कि ये सभी दल आज हाशिये पर हैं।

जहां तक कम्युनिस्टों का सवाल है, उन्हें तो भारतीय राष्ट्र की अवधारणा से ही परहेज है। यही कारण है कि देश में कम्युनिस्टों के सभी गढ़ ढह गए हैं, चाहे पश्चिम बंगाल हो या त्रिपुरा। केवल केरल में बचा हुआ है।

संक्रमण के इस कठिन परीक्षा की घड़ी में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व और संगठन ने जागृति पैदा की है। पार्टी जनपरीक्षा में विशेष अंक के साथ उत्तीर्ण हुई है। इस सफलता के पीछे तपस्वी नेताओं की शृंखला का नैतिक समर्थन है जो निश्चय ही मेरुदंड के रूप में कार्य करता है। अगर भारतीय जनता पार्टी भी अन्य राजनीतिक पार्टियों की तरह वंश, परिवार, व्यक्ति आधारित पार्टी होती तो, कोरोना संकट के इस काल में क्या होता?

भारतीय जनता पार्टी की स्थापना 6 अप्रैल, 1980 को हुई थी, लेकिन इसकी यात्रा 21 अक्तूबर, 1951 को भारतीय जनसंघ की स्थापना के साथ ही आरंभ हो गई थी। जनसंघ के संस्थापक श्यामाप्रसाद मुखर्जी स्वतंत्र भारत के पहले मंत्रिमंडल में वरिष्ठ मंत्री थे, जो सरदार पटेल के विचार और नीति से साम्यता रखते थे, लेकिन जवाहरलाल नेहरू की नीति को राष्ट्र की मूल प्रकृति के विपरीत मानते थे। नेहरू-लियाकत समझौते के विरोध में उन्होंने मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया था और राजनीतिक दल बनाने का निश्चय किया। लेकिन जवाहरलाल नेहरू और शेख अब्दुल्ला के अधिनायकवादी रवैये के कारण डॉ. मुखर्जी को कश्मीर की जेल में डाल दिया गया, जहां उनकी रहस्यमय स्थिति में 23 जून, 1953 को मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु आज भी रहस्य बनी हुई है।

उनकी मृत्यु के पश्चात जनसंघ को सशक्त बनाने का कार्य पंडित दीनदयाल उपाध्याय के कंधों पर आया। भारत-चीन युद्ध में भी भारतीय जनसंघ ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई और राष्ट्रीय सुरक्षा पर नेहरू की नीतियों का डट कर विरोध किया। जनवरी 1954 के बंबई अधिवेशन में दीनदयाल उपाध्याय ने अपने कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा था, ‘लोकतंत्र की सफलता के लिए हमें जनता को योग्य शिक्षा देनी होगी। एक हजार साल की गुलामी ने हमारे दृष्टिकोण को बिगाड़ दिया है। अंग्रेजी शिक्षा ने असत्य जीवन मूल्यों की स्थापना कर दी है, जिसे दूर करना है। अपने लक्ष्य पर दृष्टि केंद्रित कर, आत्मविश्वास और निष्ठा के साथ हम आगे बढ़ें।’

सन 1967 में पहली बार भारतीय राजनीति पर लंबे समय से बरकरार कांग्रेस का एकाधिकार टूटा, कई राज्यों के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई और संयुक्त सरकारों में जनसंघ भी सहभागी बना। जून, 1975 में विपक्ष की आवाज को दबाने के लिए इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लगाया। राष्ट्र हित में एक मई, 1977 को भारतीय जनसंघ ने अपना विलय जनता पार्टी में कर दिया। उस वर्ष हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस हार गई।

केंद्र में पहली बार गैर-कांग्रेसी और जनता पार्टी की सरकार बनी। लेकिन जनता पार्टी का प्रयोग अधिक दिनों तक नहीं चल पाया। जनसंघ से जनता पार्टी में आए सदस्यों को अलग-थलग करने के लिए दोहरी सदस्यता का मामला उठाया गया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबंध रखने पर आपत्तियां उठाई जाने लगीं। यह कहा गया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सदस्य रहते जनता पार्टी के सदस्य नहीं हो सकते। अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हमारी मातृसंस्था है, इसे हम नहीं छोड़ सकते। जनता पार्टी से अलग होकर छह अप्रैल, 1980 को एक नए संगठन की घोषणा की गई। भारतीय जनता पार्टी की स्थापना हुई। अटल बिहारी वाजपेयी पार्टी के प्रथम अध्यक्ष निर्वाचित हुए।

इतिहास पर नजर डालता हूं तो पाता हूं कि लगभग सभी राजनीतिक दलों में टूट और बिखराव हुआ है। कांग्रेस भी कई बार टूटी, नई पार्टियां बनीं। कांग्रेस कमजोर होती गई और आज तो कांग्रेस की हैसियत कई क्षेत्रीय दलों से भी कम है। लेकिन भारतीय जनता पार्टी में वैसा टूट और बिखराव कभी नहीं हुआ।

देश के लोकतंत्र को तो राजनीतिक दलों को ही चलाना है। विपक्ष की मजबूती ही लोकतंत्र की मजबूती है। विपक्षी नेता के रूप में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और अटल बिहारी वाजपेयी जैसी विभूतियों को आज भी स्मरण किया जाता है। विपक्ष की भूमिका कल भी थी, आज भी है और आगे भी रहेगी।

(लेखक पूर्व राज्यसभा सांसद एवं भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं)

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App। में रुचि है तो




सबसे ज्‍यादा पढ़ी गई




Source link

Authors

.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here