Pakistan impatient change the image of terror again sets out on the path of terrorism fatf – राजनीति: आतंक के रास्ते पर बढ़ता पाक

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ब्रह्मदीप अलूने
पाकिस्तान की मरहूम प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो ने अपनी आत्मकथा- डॉटर आॅफ द ईस्ट में लिखा था कि जिया-उल हक के समय में पाकिस्तान के स्कूलों में आतंकवाद और कट्टरपंथ की शिक्षा का अभियान बेहद योजनाबद्ध तरीके से चलाया गया। इसके लिए चंदा उगाहने का काम इस्लामिक देशों में किया गया। सारे मेहरबान लोग इस विश्वास पर पैसा देने लगे कि वह गरीब शरणार्थियों के लिए, पढ़ाई, बीमारियों के इलाज और उनकी भूख-प्यास मिटाने के लिए खर्च होगा। जबकि सारा पैसा अनाथ शरणार्थियों के पास न जाकर राजनीतिक मदरसों में जाता रहा, जहां आतंकवाद और जातीय घृणा के बीज बोए जाते रहे। अंतरराष्ट्रीय स्तर से आने वाली सब सहायता आइएसआइ के मुख्यालय ही पहुंचती थी।

दरअसल, धनशोधन और आतंकी वित्त पोषण की रोकथाम के अंतरराष्ट्रीय संगठन फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) की निगरानी सूची में बरकरार पाकिस्तान के सामने यह चुनौती बनी हुई है कि वह आतंकियों को मदद की वैश्विक छवि से बाहर आने के लिए आतंकी समूहों पर कार्रवाई करे और उसके सबूत भी पेश करे। लेकिन पाकिस्तान के लिए यह आसान नहीं है। पाकिस्तान पिछले कई दशकों से आतंकवाद का इस्तेमाल अपनी सरकारी नीति के तौर पर कर रहा है। इसमें वे तमाम तरह की गतिविधियां शामिल हैं जो किसी देश की वैधानिक या मान्यता प्राप्त सरकार के समर्थन से संचालित की जाती है। इस प्रकार के आतंकवाद में कोई देश दुनिया को दिखाने के लिए तो खुद को आतंकी गतिविधियों से दूर रखता है, पर उसे अपनी विदेश नीति और युद्ध नीति का अंग बना कर पैसा, हथियार, प्रशिक्षण आदि सुविधाओं से मदद करता है।

एफएटीएफ एक अंतरराष्ट्रीय संस्था है, जो धनशोधन और आतंकी वित्त पोषण जैसे वित्तीय मामलों में दखल देते हुए तमाम देशों के लिए दिशानिर्देश तय करती है, और साथ ही यह भी तय करती है कि वित्तीय अपराधों को बढ़ावा देने वाले देशों पर लगाम कसी जा सके। लेकिन पाकिस्तान के राजनीतिक और सामाजिक ढांचे में आतंकवाद इतना घुल-मिल गया है कि इमरान खान सरकार आतंकियों के पहचान का संकट बता कर वैश्विक संस्था को धोखा देना चाहती है। पाकिस्तान ने वैश्विक दबाव के बाद कुछ आतंकी समूहों पर कार्रवाई का प्रदर्शन तो किया है, लेकिन वहीं सरकार ने अपनी आतंकी निगरानी सूची से करीब चार हजार आतंकवादियों के नाम हटा दिए हैं।

इस सदी में दुनिया भर में हुए ज्यादातर आतंकी हमलों में पाकिस्तान की भूमिका सामने आई है। विश्व भर की जांच एजेंसियों की पड़ताल में यह भी उजागर हुआ है कि पाकिस्तान में धार्मिक, राजनीतिक, सेना और आइएसआइ के गठजोड़ से आतंकवाद फल-फूल रहा है। विख्यात पत्रकार स्टीव कोल ने अपनी पुस्तक- घोस्ट वार- में लिखा है कि मुशर्रफ और उन जैसे कई पाकिस्तानी जनरलों के लिए जेहाद दिल की आवाज नहीं, बल्कि पेशेगत हुक्म है, यह ऐसा काम है जिसे उन्होंने अपने दफ्तर से अंजाम दिया है।

दुनिया के कुख्यात आतंकी और मुंबई हमले के असली साजिशकर्ता हाफिज सईद के संगठन जमात-उल-दावा वल इरशाद का कार्यालय लाहौर से करीब तीस मील दूर मुरीदके में है। वह पाकिस्तान में शिक्षा के नाम पर कई स्कूलों का संचालन करता है, लश्कर-ए-तैयबा इसकी आतंकी शाखा है। मुरीदके दावा का मुख्यालय होने के साथ ही कश्मीर, बोस्निया, चेचन्या और फिलीपींस में जाने वाले आतंकवादियों का प्रशिक्षण केंद्र भी है। कुख्यात आतंकी संगठन जमात ए इस्लामी लाहौर में सैयद मौदूदी इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट नामक एक संस्थान चलाता है जो इस्लामी चरमपंथियों को प्रशिक्षण और आर्थिक सहायता देता है। यहां पर सिकियांग के उइगुर सहित उज्बेक और तुर्क प्रशिक्षण लेते रहे हैं। चेचन्या में रूसी सेना से लड़ने वाले चरमपंथी यहीं से निकले हैं।

इस्लामाबाद स्थित इस्लामिक विश्वविद्यालय भी कट्टरपंथी ताकतों का बड़ा गढ़ है। कराची के जमायत-उल-उलूम-इल-इस्लामिया में दूसरे कई देशों से आए विद्यार्थी चरमपंथ और कट्टरपंथ का पाठ सीखते हैं। मुल्ला उमर सहित तालिबान के अधिकांश लड़ाके यहीं से निकले हैं। मुजफ्फराबाद, अलियाबाद ,कहूटा, हजीरा, मीरपुर, रावलकोट, रावलपिंडी और गुलाम कश्मीर में अनेक आतंकी प्रशिक्षण केंद्र हैं। पाकिस्तान के आतंकी स्थल अफगानिस्तान के खोस्त तक हैं। कुख्यात आतंकी संगठन हरकतझ्रउलझ्रमुजाहिदीन का मुख्यालय पाकिस्तान के सेहसाणा में है। हिजबुल मुजाहिदीन का केंद्र मुजफ्फराबाद में है। इन आतंकी प्रशिक्षण केंद्र में भर्ती के लिए जिहाद को केंद्र में रख कर नए रंगरूटों के लिए अखबारों में विज्ञापन देना सामान्य बात है।

पाकिस्तान के इन आतंकी प्रशिक्षण केंद्रों में मसूद अजहर की खास भूमिका है। जैश-ए-मोहम्मद का प्रमुख मौलाना मसूद अजहर पाक का एक प्रमुख आतंकी है। इस आतंकी संगठन का तंत्र दक्षिण एशिया के साथ पश्चिम एशिया अफ्रीका और यूरोप तक फैला हुआ है। अफगानिस्तान का आतंकवाद पाकिस्तान की गहरी रणनीति का हिस्सा रहा है।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि पाकिस्तान के जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम और जमात-ए-इस्लामी जैसे स्थापित राजनीतिक संगठन आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा, सिपह-ए-सहाबा, जैश-ए-मोहम्मद और तालिबान को समर्थन देकर उन्हें मजबूती देते हैं। आइएसआइ के पूर्व मुखिया हमीद गुल, पूर्व सेना प्रमुख असद दुरार्नी और मिर्जा असलम बेग ने स्वीकार किया था कि उन्होंने गैर-धार्मिक दलों को हराने के लिए धार्मिक दलों को पैसे दिए थे। जुलाई, 2018 में हाफिज सईद ने राजनीतिक पार्टी मिल्ली मुसलिम लीग बना कर चुनाव लड़ा था।

स्पष्ट है कि लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और जमात-उद-दावा को मदद में लगातार बढ़ोतरी हुई है। सवाल है ऐसे में पाकिस्तान सरकार कैसे आतंकी संगठमों पर लगाम लगाएगी। एफएटीए की कड़ी चेतावनी के बावजूद पाकिस्तान सरकार आतंकी संगठनों के साथ है। आतंकियों के वित्तीय लेनदेन पर नजर रखना मुश्किल इसलिए भी है क्योंकि यह नगदी आधारित होता है और इसमें मादक पदार्थों की तस्करी शामिल है।

पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति इसके लिए मुफीद है। भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच गोल्डन क्रीसेंट का इलाका है जो अफीम का स्वर्ग कहा जाता है और नार्को आतंकवाद की यह उपजाऊ जमीन मानी जाती है। पाक-अफगान सीमा पर ऐसे कई गुप्त रास्ते हैं जिनका इस्तेमाल रूस के अफगान पर कब्जे के दौरान मुजाहिद किया करते थे। इन इलाकों में सीमा पर होने वाली आव्रजन और सीमा शुल्क जैसी औपचारिकताएं भी नहीं होतीं। 1999 के कंधार विमान के यात्रियों को पाकिस्तान की सरहद तक इसी रास्ते से लाने की तालिबान की योजना थी।

एफएटीएफ के जाल से निकलने के लिए पाकिस्तान, चीन, मलेशिया और तुर्की जैसे देशों की मदद ले रहा है। इसीलिए उसने दिखावे के तौर पर उसने जमात-उद-दावा जैसे संगठनों पर नाममात्र की कार्रवाई भी की है। लेकिन आतंकवाद के देशव्यापी ढांचे को खत्म करने का मंसूबा न तो वहां की सरकार में है और न ही वहां के धार्मिक संगठन ऐसा होने देंगे। आइएसआइ की भूमिका किसी से छिपी नहीं है। ऐसे में विश्व समुदाय को यह समझना होगा की पाकिस्तान से आतंकवाद को खत्म करने के लिए उस पर आर्थिक प्रतिबंध की व्यापक कार्ययोजना ही कारगर हो सकती है। पाकिस्तान की सरकार और देश में समांतर सरकार चलाने वाले आइएसआइ और सेना पर कड़े आर्थिक दबाव बनाने की जरूरत है।

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