raajneeti side effects of environmental degradation tend to dominate those who have little or no infrastructure – राजनीतिः पर्यावरण से तालमेल का संकट

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मुकेश पोपली

आदिकाल से ही मानव और पर्यावरण का गहरा रिश्ता रहा है। मानव जाति के विकास क्रम में आवश्यकताएं भी बढ़ती चली गईं और सतत विकास ने जरूरतों को और बढ़ाया। सबसे ज्यादा बदलाव पिछली चार-पांच शताब्दियों में आया, जब विज्ञान के उपयोग से नए आविष्कार होने लगे और फिर औद्योगिक क्रांति ने तो मानव जीवन की दिशा ही बदल डाली। लेकिन इन्हीं उपलब्धियों के बीच सबसे घातक काम जो शुरू हुआ, वह था प्रकृति के साथ खिलवाड़। विकास के लिए प्राकृतिक संसाधनों के दोहन का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह आज तक जारी है। यही कारण है कि आज हम प्रकृति के कोप का शिकार बनते जा रहे हैं। पूरी दुनिया इस वक्त हर तरह के प्रदूषण की मार झेल रही है। धरती का आज सबसे बड़ा और गंभीर संकट जलवायु का है। धरती का बढ़ता तापमान इसी का नतीजा है। ऐसे में आज सबसे बड़ी जरूरत इस बात की है कि हम वर्तमान में अपना जीवन सुंदर बनाएं और भविष्य के लिए भी एक सक्षम जीवन बनाने का गंभीरता के साथ प्रयास करें।

यह सही है कि अभाव हमेशा रहेंगे, लेकिन इन अभावों के लिए जिम्मेदार कारणों को दूर करना और उसे पुन सही रूप में लाना ही संवहनीयता है। हालांकि यह बड़ी चुनौती है, मगर इस चुनौती से ही मानव का विकास जुड़ा हुआ है। यदि मानव विकसित होगा तो एक परिवार, परिवार से समाज, समाज से राष्ट्र और राष्ट्रों से विश्व विकसित होगा।

पर्यावरण संवहनीयता व्यक्तियों, समुदायों, देशों और अंतरराष्ट्रीय समुदायों को एक नए मार्ग पर ले जाने के लिए सबसे सुयोग्य साधन है। यद्यपि मानव समाज ऊंच-नीच, अमीरी-गरीबी जैसी बुराइयों से हमेशा से ही ग्रसित रहा है। लेकिन फिर भी मानव के विकास में पर्यावरण और उससे जुड़े अनेक घटकों ने एक नई आशा का संचार भी किया है। बदतर से बद और बद से बेहतर बनने की प्रक्रिया में किसी भी मानव को सबसे अधिक सहयोग पर्यावरण ही प्रदान करता है। इस बात को इस तरह से आसानी से समझा जा सकता है कि जब भी कोई इंसान किसी छोटी से छोटी-सी बीमारी में चिकित्सक से संपर्क करता है तो उसे यही सलाह दी जाती है कि घर में साफ-सफाई के साथ-साथ शुद्ध पानी और शुद्ध हवा का रहना अनिवार्य है। इससे यह भी सिद्ध होता है कि मानव-विकास प्रक्रिया में स्वधच्छ वातावरण की एक गंभीर और अनिवार्य भूमिका है, क्योंकि कुशाग्र मस्तिष्क के साथ-साथ मानव के काम करने और रहने के स्थान पर एक स्वस्थ्य वातावरण अति आवश्यक माना गया है। धरती के बिगड़ते पर्यावरण पर नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा था कि ऐसा प्रदूषित पर्यावरण जिसमें भावी पीढ़ी को ताजा हवा भी न मिल सके, प्रदूषित ही बना रहेगा, भले ही भावी पीढ़ी कितनी ही अमीर क्यों न हो।

यह सही भी है क्योंकि हम सब अनिश्चितता के दौर में ही तो रहते हैं और यह कोई नहीं जानता कि भविष्य में सर्वश्रेष्ठ जीवन-यापन के लिए आप किसे मूल्यवान मानेंगे। आप विकल्प चुनने की स्वतंत्रता के दौर में जब तक केवल अपने आराम के बारे में सोचेंगे तो पर्यावरण आपकी सूची में बहुत नीचे होगा, क्योंकि आपके पास वैकल्पिक साधनों की भरमार होगी। यदि अन्य बातों के साथ-साथ हम प्राकृतिक साधनों की उपलब्धता और विविधता को बचाएंगे, तभी हमारी क्षमताएं बढ़ेंगी, क्योंकि यह सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है और सबसे मूल्यवान भी। इसके लिए हमारे पास पर्याप्त कारण भी मौजूद हैं।

पर्यावरण सम्मेलनों और बैठकों में हर बार आगाह किया जाता है? कि हम पर्यावरणीय जोखिमों में निरंतर वृद्धि देख रहे हैं और इन सबके कारण स्वास्थ्य संबंधी जोखिम बढ़ रहे हैं। दरअसल, पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ रहा है और इससे ओजोन परत का संकट बढ़ता ही जा रहा है। औद्योगिक प्रदूषण जल, थल और आकाश को घेरता ही जा रहा है। प्राकृतिक आपदाएं भी तेजी से दस्तक दे रही हैं। यदि मानव के विकास में हम लंबी आयु, स्वस्थद जीवन, रचनात्मक गतिविधियों और अभी तक न छुए गए पहलुओं आदि को शामिल करें तो यह धरती सबके लिए एक ऐेसा अनूठा उपहार बन पाएगी और जिसका लाभार्थी हर प्राणी होगा। यह तब ही संभव है जब सब लोग एक समान अधिकार के लिए जीएं और अपने-अपने कर्तव्यों को पूरी ईमानदारी से पूरा करें।

हम सब यह जानते हुए भी कि इस संसार में कुछ भी स्थायी नहीं है, फिर भी हर चीज पर अपना अधिकार मानते हैं, यहां तक कि प्रकृति पर भी। हम हमारे पास उपलब्ध साधनों की तुलना किसी और के पास उपलब्ध साधनों से कर अपने आपको और अधिक वस्तुएं प्राप्ती करने के लिए झोंक देते हैं, जो कि गलत है। गलत और सही के दृष्टिकोण को समझने के लिए पर्यावरण सबसे अच्छा उदाहरण कहा जा सकता है। पिछले कई वर्षों से दुनिया भर में बड़े पैमाने पर हो रहे पर्यावरणीय क्षरण और भविष्य में इसके बदतर होने की आशंका बताई जा रही है। यहां पर यह विचारणीय है कि कार्बन डाईआक्साइड उत्सर्जन, मिट्टी, जल और वनों की गुणवत्ताई में हानिकारक बदलाव हुए हैं। साथ ही स्वास्थ्य और शिक्षा संबंधी उपलब्धियों के बीच अंतर कम होने के बावजूद आय के वितरण की स्थिति दुनिया के अधिकतर देशों में प्रतिकूलता की ओर अग्रसर हुई है। परिणामस्वरूप मानव के सशक्तीकरण सूचकांक में अनेक उतार-चढ़ाव देखने को मिले हैं। बढ़ते वैश्विक तापमान के कारण कृषि उत्पादन पर पड़े दुष्प्रभाव, साफ पेयजल और बेहतर साफ-सफाई की उपलब्धता में कमी और प्रदूषण की समस्यापएं शामिल हैं। पर्यावरणीय आपदा के प्रकोप ने भी भू-क्षरण, जैव विविधता में कमी, वनों की कटाई और पहाड़ों की तह में खुदाई में कोई कसर नहीं छोड़ी है।

यह भी देखा जाता है कि पर्यावरणीय क्षरण के दुष्प्रभाव उन लोगों पर अधिक हावी हो जाते हैं जिनके पास बुनियादी सुविधाएं भी न के बराबर हैं। दूसरी ओर यह भी सच है कि ऐसे लोगों की एक बड़ी बिरादरी पर्यावरण को सुधारने के स्थान पर उसे विरूपित ही करती है। जलवायु परिवर्तन का कृषि उत्पादन और आजीविका पर तो सीधा प्रभाव पड़ता ही है, साथ ही मवेशी भी प्रभावित होते हैं। पर्यावरण जोखिमों पर गौर करें तो कमतर मानव विकास सूचकांक वाले देशों में घरेलू पर्यावरण प्रदूषित ही रहता है, क्योंकि वहां पर साफ पानी नहीं होता, स्वास्थ्य संबंधी सुविधाओं का अभाव होता है और वायु प्रदूषण तथा ध्वनि प्रदूषण भी काफी होता है। सामुदायिक व्यवस्था के अंतर्गत सबसे अधिक प्रभाव वायु प्रदूषण का पड़ता है। अक्सर देखा गया है कि वायु प्रदूषण घटने की ओर नहीं, बल्कि बढ़ने की ओर अग्रसर रहता है। तमाम कोशिशों के बावजूद समुदाय में फैले प्रदूषण को कम करना बहुत मुश्किल होता है।

यह कहना उचित होगा कि समाज के प्रत्येक अंग को हर पल यही कोशिश करनी चाहिए कि समय के आगे बढ़ते पहिये के साथ ही प्राकृतिक संपदा से मिलने वाली सेवाओं का प्रवाह बना रहे। सही मायने में भौतिक और अन्य तरह की संपदा धरती के बढ़ते तापमान, ओजोन परत के क्षरण और जैव विविधता को हो रहे भारी नुकसान की भरपाई नहीं कर सकती। हाल ही में हरित अर्थव्यवस्था के व्यापक प्रतिमानों के भीतर विकास और पर्यावरणीय संवहनीयता की आपसी समरूपता की गुंजाइश पर जोर दिया जाने लगा है। यह विचार संवहनीयता पर पारंपरिक विचार से भिन्न है और यह उन रास्तों पर जोर देता है जिनमें आर्थिक नीतियां टिकाऊ उत्पादन और खपत का समावेशी स्वरूप प्रदान कर सकती हैं जो गरीबों के हित में हों और रोजाना के आर्थिक फैसलों में पर्यावरणीय चिंताओं को समाहित करे।

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