Water crisis started in many cities as heat rose, water shortage will increase trouble during Kovid trouble – राजनीति: जल से ही जीवन है

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अतुल कनक
गर्मी के दिन शुरू होते ही देश के अनेक हिस्सों में भीषण जल संकट उत्पन्न हो जाता है। पिछले कुछ वर्षों में तो चेन्नई और शिमला जैसे शहरों को भी नियमित जलापूर्ति सुचारू रखने के लिए अनेक दिक्कतों का सामना करना पड़ा है। स्थिति यह थी कि जहां चेन्नई में अनेक संस्थानों ने अपने कर्मचारियों को इसलिए घर से ही काम करने का आदेश दिया था, क्योंकि कार्यालय परिसर में उनके लिए अतिरिक्त रूप से पानी की व्यवस्था संभव नहीं थी, वहीं शिमला के स्थानीय निवासी पर्यटकों से यह अनुरोध करने लगे थे कि उनके कारण पानी का अपव्यय होता है, इसलिए वे कुछ दिन शिमला नहीं आएं। ऐसे में होना तो यह चाहिए था कि मानसून में हम वर्षा जल के संचयन का प्रबंध करते और भूगर्भीय जलस्तर को बढ़ाने के प्रयास करते। लेकिन ऐसा सर्वत्र नहीं हो सका।

ऐसा नहीं है कि भारत के पास जल संरक्षण की तकनीक नहीं है। नई तकनीकी की बात छोड़िए, पारंपरिक दृष्टि से भी हमारे रेगिस्तानी इलाकों में पानी के सदुपयोग और संचयन की एक पुष्ट परंपरा है। ऐसे भी गांव हैं जहां तालाब या झील या जोहड़ का पानी गंदा करने वाले को साव्रजनिक तौर पर क्षमा याचना करनी होती है। पश्चिमी राजस्थान के बाड़मेर और जैसलमेर जिलों में तो न केवल पानी की एक-एक बूंद का सुदपयोग करने की परंपरा है, बल्कि इन जिलों के ग्रामीण अंचल में संचित पानी की टंकी को ताला लगा कर रखा जाता है, ताकि उस पानी को कोई चुरा न सके।

इस क्षेत्र में पानी के संकट का अनुमान पिछले दिनों छपी उस खबर से लगाया जा सकता है जिसमें बाड़मेर जिले के कई गांव के लोगों ने कहा कि उनके पास घी तो प्रचुर मात्रा में है, लेकिन पानी इतना भी नहीं है कि वे बार-बार हाथ धो सकें। इसी साल अप्रैल के शुरूआती दिनों में राजस्थान के अजमेर जिले से यह खबर आई कि पानी भरने को लेकर हुए विवाद में एक व्यक्ति की जान चली गई।

इस तरह की घटनाएं हर वर्ष उन इलाकों में देखने को पानी मिलती हैं, जहां गर्मी का आगमन पानी की किल्लत का पर्याय होता है। आज भी गर्मी के दिनों में देश के कई गांवों के लोग अपनी जरूरत भर पीने का पानी लेने के लिए कई किलोमीटर तक जाने को विवश होते हैं। राष्ट्रीय सैंपल सर्विस कार्यालय (एनएसएसओ) की अधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार आज भी देश में करीब 21.4 फीसद घरों में ही पाइप कनेक्शन के माध्यम से जलापूर्ति होती है, अर्थात प्रत्येक पांच में से एक घर में।

आबादी का एक बड़ा हिस्सा अपनी जरूरतों की पूर्ति के लिए या तो भूगर्भीय जल के दोहन पर निर्भर है या फिर तालाब, झील, जोहड़, नदी, कुओं, बावड़ियों और टांकों जैसे जल संसाधनों पर। कुछ लोग तो इतने भी भाग्शाली नहीं हैं कि उन्हें अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए ऐसे किसी जल संसाधन का सहारा भी मिल जाए। नीति आयोग ने भी कुछ समय पहले अपनी एक रिपोर्ट में स्वीकार किया था कि देश की आबादी के चालीस फीसद हिस्से के पास वर्ष 2030 तक पीने के पानी की सहज उपलब्धता नहीं रहेगी।

दरअसल, विकास के नाम पर पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह से बड़े शहरों में तालाबों को पाटा गया है और कुओं, बावड़ियों के अस्तित्व से खिलवाड़ किया गया है, उसने समाज में जलापूर्ति के संतुलन पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है। उधर, नकदी फसलों के मोह और बदली हुई जीवनशैली ने भी जल संसाधनों पर अपना दबाव बनाया है। भारत में प्राय: मार्च माह के बाद अगला मानसून सक्रिय होने तक लोगों की निर्भरता जल संग्रहण के संसाधनों या भूगर्भीय जल पर बहुत बढ़ जाती है।

सामान्यत: मानसून के दिनों में भारत में चालीस अरब घन मीटर बरसात होती है जिसमें से 11.37 अरब घन मीटर पानी का ही उपयोग सामान्य जीवनचर्या या सिंचाई आदि में हो पाता है। शेष में से 6.90 अरब घन मीटर पानी जल संग्रहण क्षेत्रों में चला जाता है और 4.47 अरब घन मीटर पानी धरती में रिस जाता है। धरती में रिसा पानी भूगर्भीय जल भंडारण को समृद्ध करता है। इस 4.47 अरब घन मीटर पानी में से 4.11 अरब घन मीटर पानी का ही दोहन संभव होता है।

लेकिन हम सामान्य से अधिक भूगर्भ जल का दोहन करने के आदी हो गए हैं और दुनिया में सर्वाधिक भूगर्भीय जल दोहन करने वाले दस देशों की सूची में सबसे ऊपर हैं। सत्तर के दशक के अंत में लोगों की पानी संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अनियंत्रित तरीके से जलकूप खोदे गए थे। हमने धरती के गर्भ में संचित जल के दोहन की व्यवस्था तो कर ली, लेकिन इस आवश्यकता पर ध्यान नहीं दिया कि भविष्य की जरूरतों को पूरा करने के लिए इस भूगर्भीय जल की ‘रिचार्जिंग’ भी जरूरी है।

प्रकृति सबकी जरूरतें पूरी कर सकती है, लेकिन उसके पास किसी एक व्यक्ति के भी लालच को पूरा करने की सामर्थ्य नहीं है। दुर्भाग्य से पिछले कुछ दशकों में प्रकृति के प्रति हमारा व्यवहार बहुत लालची हो गया है। हमने बरसात के जल को संग्रहित करने वाले परंपरागत संसाधनों को तो विकास के नाम पर नष्ट कर दिया, लेकिन जल संबंधी हमारी जरूरतें लगातार बढ़ती जा रही हैं। स्थिति यह हो गई है कि वैश्विक स्तर पर 7600 घन मीटर प्रति व्यक्ति पानी की वार्षिक उपलब्धता के मुकाबले में हमारे पास केवल 1545 घन मीटर प्रति व्यक्ति पानी ही उपलब्ध है। पिछले पचास वर्षों में भारत में प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता में तेजी से ह्वास हुआ है।

एक तरफ पानी की उपलबधता में निरंतर कमी हो रही है और दूसरी तरफ बदली हुई जीवनशैली ने पानी के उपयोग को कई गुना बढ़ा दिया है। इस तथ्य को सन् 1993 में प्रो. जॉन एलन द्वारा दिए गए आभासी जल उपयोग के सिद्धांत के माध्यम से समझा जा सकता है। प्रो. एलन ने बताया कि जब हम किसी वस्तु का उपयोग करते हैं तो उसके उत्पादन, पोषण या निर्माण में होने वाले जल का उपयोग भी तो हम ही करते हैं। उन्होंने इस तरह आभासी जल के उपयोग को जानने के लिए कुछ सूत्र दिए थे।

इसके अनुसार जब सुबह हम एक कप चाय पीते हैं तो प्रत्यक्ष तौर पर तो लगभग आधा कप पानी का ही इस्तेमाल करते हैं, लेकिन जब हम दुग्ध और चाय उत्पादन आदि की संपूर्ण प्रक्रिया में खर्च होने वाले पानी को भी आनुपातिक तौर पर अपने ही उपभोग में जोड़ते हैं, तो हम पाते हैं कि एक कप चाय पीने के लिए हम करीब पैंतीस लीटर पानी का उपयोग करते हैं।

उन्होंने इस सिद्धांत को निरूपित करते हुए यह भी कहा था कि जब हम थोड़ा-सा भी भोजन झूठन में छोड़ते हैं तो हम उस ऊर्जा, जल और पदार्थ का भी उपयोग करते हैं जो किसी फसल को तैयार करने से लेकर भोजन बनाने तक की संपूर्ण प्रक्रिया में व्यय होती है। इसके अलावा यदि झूठन में फेंका गया भोजन किसी कचरे के ढेर में जाता है तो वह उस ग्रीन हाउस प्रभाव का भी कारण बनता है जिसे पर्यावरण के लिए अत्यधिक खतरनाक पाया गया है। याद करिए, क्या हमारे बुजुर्ग इस सत्य को हजारों साल पहले जानते थे, जो उन्होंने भोजन झूठन में छोड़ने को वर्जित कहा था। हमारे शास्त्रकारों ने तो पानी को भी बहुत पवित्र कहा है और इसकी प्रत्येक बूंद के अपव्यय को बुरा बताया है।

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