Economic breakdown due to lockdown creating new problems for farmers – राजनीति: कृषि क्षेत्र की चुनौतियां

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सुविज्ञा जैन
भयावह मंदी के बीच अचानक देश के कृषि क्षेत्र से बड़ी उम्मीदें लगाई जाने लगी हैं। कृषि से यह उम्मीद डूबते को तिनके का सहारा है। लेकिन क्या वाकई कृषि की स्थिति अचानक इतनी सुधर गई है कि वह डूबती अर्थव्यवस्था बचा ले जाएगी? वैसे अब तक हम कहते तो यही रहे हैं कि हमारी अर्थव्यवस्था उद्योगों के विकास पर ही टिकी है। बहरहाल, देश के किसानों की दुश्वारियां देखते हुए कृषि से यह उम्मीद बेमानी ही है।

दरअसल देश में यह वक्त रबी की फसल की कटाई का है। प्राकृतिक और आर्थिक संकटों के बावजूद इस साल रबी के फसल अगर ठीकठाक नजर आ रही है तो यह भारतीय किसानों की हाड़तोड़ मेहनत का ही नतीजा माना जाना चाहिए। वरना किसानों पर लगातार संकटों ने उन्हें तबाह करने में कोई कसर छोड़ी नहीं है। सिर्फ पिछले एक साल को लेखे में लें तो कोई आठ महीने से खेती किसानी भारी संकट से गुजरी है। आठ महीने पहले पिछला मानसून इतनी बेतरतीब चाल चला कि किसानों को खरीफ की फसल उगाने में भारी मशक्कत करनी पड़ी थी। पिछले मानसून के शुरूआती दो महीनों में बहुत कम बारिश हुई थी। किसानों को सिंचाई के लिए वक्त पर पानी नहीं मिल पाया और आखिर के दो महीनों में जरूरत से ज्यादा बारिश से देश के तेरह राज्य बाढ़ की चपेट में आ गए थे। वह आपदा गुजरी ही थी कि पता चला कि मंदी ने देश की अर्थव्यवस्था को ही अपनी चपेट में ले लिया है। गौर से देखें तो इसकी सबसे ज्यादा चोट किसान को ही पहुंची।

पिछले साल जिन दिनों अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए उद्योग जगत को भारी भरकम पैकेज दिए जा रहे थे, उन्हीं दिनों कृषि क्षेत्र के जानकार और किसान संगठन उद्योग जगत की तर्ज पर ही कृषि के लिए राहत पैकेज की मांग कर रहे थे। सरकार के स्तर पर कुछ हो पाता उसी बीच मौसम ने फिर भारी तबाही मचा दी थी। कई जगह बेमौसम बारिश और भारी ओलावृष्टि ने खड़ी फसलें बर्बाद कर डालीं। आलू, प्याज, टमाटर, गेंहूं, चने जैसी कई फसलों को बहुत बड़े इलाके में नुकसान पहुंचा था। किसान मुआवजे की गुहार में लगे ही थे कि पिछले महीने ही कोरोना की आफत सिर पर आ पड़ी। इसने पहले से लड़खड़ा रही कृषि की कमर तोड़ दी। लिहाजा कृषि क्षेत्र को देश की अर्थव्यवस्था को राहत पहुंचाने लायक मानना बेमानी लगता है।

पीछे का सब कुछ भूल भी जाएं, लेकिन आज भी किसान के सामने चुनौतियां कम नहीं हैं। कोरोना किसान पर स्वास्थ्य का खतरा तो लाया ही है, साथ ही उसने किसान की आजीविका पर भी बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। सिर्फ चार घंटे के नोटिस पर पूर्णबंदी के फैसले से पूरा देश अचानक बंद हो गया था। जो जहां था वहीं रुक गया। सारे काम-धंधे रातों-रात बंद हो गए। जो माल जहां था, वहीं रोक दिया गया। पकी पकाई फसलें किसानों के पास ही फंस गईं। साग सब्जियों के ट्रक और ट्रालियां जो रास्ते में थे, वे वहीं ठहरा दिए गए। इसका नतीजा यह हुआ कि उनमें लदा ज्यादातर कृषि उत्पाद रास्ते में ही सड़ गल गया। जो कुछ मंडियां तक पहुंचा भी, वह भी मुश्किल से बिका। गांव, किसान या खेती के लिए आगे की चुनौतियां भी कम नहीं हैं। रोजगार छिन जाने से गांव की ओर भागे मजदूरों की चुनौती भी छोटी नहीं है। जगजाहिर है कि शहरों में मजदूरी करने वाले गांव के ये लोग कुछ पैसा बचा कर अपने घर यानी गांव भेजा करते थे। भले ही यह रकम थोड़ी-सी होती थी, लेकिन पूर्णबंदी के बाद ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए यह छोटा-सा सहारा भी जाता रहा।

तुरत-फुरत समाधान सुझाने वाले कथित आशावादी विद्वान सुझा सकते हैं कि शहरों से लौटे इन मजदूरों कामगारों को कृषि में ही लगा दिया जाए। ऐसे लोगों को याद दिलाया जा सकता है कि भारतीय कृषि पहले से ही छद्म बेरोजगारी का शिकार है। छद्म बेरोजगारी जिसका मतलब होता है कि किसी काम में जरूरत से ज्यादा लोगों का लगा होना। इस अप्रिय वास्तविकता को कौन नहीं जानता कि गांव में कृषि के अलावा रोजगार के दूसरे उत्पादक विकल्प आज तक नहीं बनाए जा सके हैं। यानी पूर्णबंदी के चलते अपने गांव वापस लौटे मजदूरों को कृषि में ही खपाने की गुंजाइश हाल-फिलहाल दूर-दूर तक नहीं दिखाई देती। किसान के सामने खड़ी इन चुनौतियों से निपटने के लिए सरकार जो कुछ कर रही है, वह भी हमारे सामने है। मसलन, पहले पूर्णबंदी की मियाद खत्म होने के एक रोज पहले सरकार ने दूसरे दौर की पूर्णबंदी का एलान किया है।

अलबत्ता इस बीच 20 अप्रैल से कुछ काम-धंधों को चालू करने के लिए कुछ रियायतें भी दे दी गई हैं। कृषि क्षेत्र के दूसरे व्यवसाय मसलन चाय, कॉफी, रबर, दुग्ध उत्पाद और खेती के उपकरणों की बिक्री को भी रियायत दी गई है। इसके पहले पिछले हफ्ते ही 15 अप्रैल से देश में गेहूं की खरीद शुरू करने का एलान कर दिया गया था। लेकिन इस एक हफते का अनुभव यह है कि सरकारी खरीद पिछले साल जैसी रफ्तार भी नहीं पकड़ पा रही है। जबकि इस समय देश के बीसियों लाख किसान अपना गेहूं फौरन बेचना चाह रहे हैं।

ऐसे में एक सुझाव यह बनता है कि गेहूं की सरकारी खरीद के लिए कुछ-कुछ दूरी पर अस्थायी खरीद केंद्रों की संख्या बढ़ा दी जाए। कुछ राज्यों में सरकारी प्रबंधकों ने इसे सुझाया भी है। लेकिन अनाज की सरकारी खरीद की इस व्यवस्था में अतिरिक्त खर्च और आकस्मिक प्रबंधन की चुनौतियां भी कम नहीं हैं। पर संकटकाल में खर्च की चिंता करना भी समझदारी नहीं होगी। किसानों की मुश्किलों के मद्देनजर इस साल सरकारी खरीद की मात्रा कम रखने की प्रवृत्ति से बचा जाएगा, तो बेहतर होगा। यानी वक्त की नजाकत को देखते हुए इस बार सरकारी खरीद पहले के मुकाबले कई गुनी बढ़ी हुई दिखनी चाहिए।

एक बात सनद रहे और वक्त पर काम आए कि सरकारी मौसम विभाग के वैज्ञानिक अनुमान अक्सर अटकल ही साबित होते हैं। पिछले साल सरकारी अनुमान छियानवे फीसद बारिश का था और बारिश हो गई थी एक सौ दस फीसद। नतीजतन तेरह राज्यों में बाढ़ ने भारी तबाही मचा दी थी। इसलिए इस बार मौसम विभाग के सौ फीसद बारिश के अनुमान के भरोसे में रहना ज्यादा जोखिम भरा है। इस बार देश में पहले से ही संवेदनशील स्थितियां हैं। लिहाजा बाढ़ प्रबंधन की तैयारियां अभी से करके रखना ही समझदारी है।

कोरोना संकट के कारण एक बहुत बड़ा तबका बेरोजगार हो चुका है। यह तबका राशन-पानी के लिए सरकार पर ही निर्भर होगा। महामारी और बाढ़ के अंदेशे को देखते हुए सरकार को ज्यादा से ज्यादा अनाज भंडारण पर ध्यान देना चाहिए। इससे किसानों को भी फौरी आर्थिक मदद मिलेगी, गांवों में औद्योगिक माल की खपत बढ़ेगी और अर्थव्यवस्था का चक्का चलेगा। लेकिन ज्यादा सरकारी खरीद तभी संभव है जब सरकारी अनाज भंडारों में पहले से अटा पड़ा अनाज निकाल कर जरूरतमंदों के बीच पहुंचा दिया जाए। वरना सरकारी खरीद का नया अनाज रखेंगे कहां?
इसी के साथ कृषि उत्पाद को उपभोक्ताओं तक पहले की तरह सुचारू रूप से पहुंचाने के लिए भी भारी मशक्कत करनी पड़ेगी। पूर्णबंदी ने कृषि आपूर्ति के चक्र को भी ध्वस्त कर दिया है। पर्याप्त मालवाहक ट्रेनों और ट्रकों को फिर से दौड़ाने से लेकर माल ढोने वाले मजदूरों और आपूर्ति कमर्चारियों का फिर से इंतजाम करना पड़ेगा। कुल मिलाकर अगर कृषि क्षेत्र में फिर से जान फूंकनी है तो कई मार्चों पर एकसाथ काम करने पड़ेंगे।

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