jansatta raajneeti column Before the arrival of Corona there was a long trade war between China and America – राजनीतिः बदलते परिदृश्य में चीन

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सतीश कुमार

दुनिया में कोरोना महामारी फैलाने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चीन को जिम्मेदार ठहराया है। ट्रंप ने खुल कर कहा भी है कि अगर यह सिद्ध हो गया है तो चीन का इसका खमियाजा भुगतना पड़ेगा। और सिर्फ अमेरिका ही नहीं, दुनिया के ज्यादातर देश कोरोना विषाणु फैलने के लिए चीन को ही दोषी मान रहे हैं, भले अमेरिका की तरह खुल कर कह नहीं रहे हों। चीन ने अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए पूरी दुनिया को दहशत में डाल दिया है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में बहस छिड़ी हुई है कि क्या कोरोना का मामला ठंडा पड़ने के बाद वैश्विक राजनीति का जो नया रूप उभर कर आएगा, उसमे चीन दुनिया का मठाधीश बन पाएगा या नहीं? इस प्रश्न का सटीक उत्तर खोजने के लिए वर्तमान भू-राजनीतिक और विश्व व्यवस्था की चर्चा जरूरी है।

कोरोना के आने के पहले से चीन और अमेरिका के बीच लंबे समय से व्यापार युद्ध चल रहा था। कोरोना ने इसमें आग में घी का काम कर दिया। शुरुआती दौर में अमेरिका ने चीन को यह कह कर घेरने की कोशिश कि यह वुहान विषाणु है। अमेरिकी टिप्पणी से आहत होकर चीन ने अमेरिका पर आरोप लगाया कि इसकी शुरुआत तो अमेरिकी सैनिकों द्वारा की गई थी, जब वे वुहान में सैन्य अभ्यास में शिरकत करने पहुंचे थे। लेकिन तेजी से बदलते घटनाक्रमों के बीच पूरी दुनिया चीन को दोषी मानती रही। फिर पासा पलटा। निश्चिंत अमेरिका और यूरोप जब इस बीमारी के चंगुल में फंसे तो उनकी सांसे थम गर्इं। कई यूरोपीय देश मसलन स्पेन, इटली, फ्रांस और इंग्लैंड कोरोना के जाल में बुरी तरह जकड़ते चले गए और चीन तो इसमें काफी पूछ छूट गया। खुद अमेरिका में हालात सबसे गंभीर हो गए।

दूसरी ओर, निरंकुशता के दम पर चीन ने वुहान को कोरोना मुक्त घोषित करने की चाल चली। उसने अपने दुनिया के देशों के लिए मसीहा के रूप में एक ऐसे राष्ट्र की भूमिका में खड़ा कर दिय, जिससे दुनिया को लगने लगा कि इस हालत से बचाने कि क्षमता अगर किसी देश के पास है, तो वह चीन है। इसी के तहत चीन ने इटली, स्पेन और कई यूरोपीय देशों को सुरक्षा किट भेजने की कूटनीति अपनाई। चीन के द्वारा इस बात की पुष्टि की जाने लगी कि उसका आर्थिक और राजनीतिक तंत्र ज्यादा कारगर और सटीक है। पूरे विश्व में उदारवाद का पुरोधा अमेरिका और पश्चिमी दुनिया की राजनीतिक व्यवस्था हाशिए पर पहुंच गई है। दुनिया में इस बात की खूब चर्चा भी हो रही है।

अब दुनिया तेजी से बदलने के लिए अभिशप्त है। इसका तीसरा दौर भी जल्दी ही शुरू हो गया। इसमें विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) पर अमेरिका का गाज गिरी। अमेरिका ने इस संगठन पर चीन को बचाने के आरोप लगाते हुए उसे पैसा देना बंद कर दिया है। केवल अमेरिका ही नहीं, दुनिया के अन्य देशों ने भी डब्ल्यूएचओ पर अंगुली उठानी शुरू कर दी। वहीं चीन जो इस बात का दावा कर रहा था कि उसके यहां से कोरोना खत्म हो चुका है, उसने फिर से चीन में दस्तक दे दी है।

चीन ने पिछले पांच दशकों में प्रकृति का जितना दोहन किया है, उतना शायद ही किसी देश ने किया हो। हिमालय से बहने वाली नदियों के पर बड़े-बड़े बांध बना कर उनकी स्वाभाविक धारा को बदलने की साजिश रची गई, जिसका खमियाजा दक्षिण एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया के देशों को झेलना पड़ रहा है। तिब्बत के मुहाने पर चीन ने आणविक कूड़ेदान की इजाजत दे दी, जहां से दर्जनों नदियों के शीतल जल का प्रवाह पच्चीस से तीस देशों के बीच होता है। जंगल काटे गए। प्राकृतिक संतुलन ने वन्यजीव को भारी नुकसान पहुंचाया। अगर कोरोना विषाणु के कारणों को जानने की कोशिश करें, तो यही बातें विशेषज्ञों के द्वारा कही जा रही हैं।

यह बात कई बार कही जा चुकी है कि इक्कीसवीं शताब्दी एशिया के देशों के लिए है। यह सच है कि इस बीमारी ने परिवर्तन की गति को बढ़ा दिया है। अमेरिका का पतन इस बीमारी के दौरान तीखे ढंग से महसूस किया गया। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद यह पहली घटना है जिसमें दुनिया के किसी देश ने अपने को बचाने के लिए अमेरिका से गुहार नहीं लगाई। खुद अमेरिका ने भी नेतृत्व देने की पेशकश नहीं की। कोरिया युद्ध से लेकर अफगानिस्तान संकट तक में अमेरिका संकट मोचक की तरह उपस्थित होकर अपना कूटनीतिक धर्म निभाने की जरूरत महसूस कराता था। लेकिन इस महामारी में वही सबसे ज्यादा संकट में है, इसलिए कैसे वह दूसरों के समक्ष मदद की पेशकश करता। संभवत: ‘अमेरिका पहले’ की नीति के तहत ही यह सब कुछ हो रहा है। दूसरा, जी-7 और जी-20 जैसे निगरानी करने वाले दुनिया के अमीर देशों के संगठन भी चुप्पी साधे रहे। इनके बीच बैठक भी हुई, तो उसमें कोई एकात्मक भाव दिखाई नहीं दिया।

प्रश्न यह है कि क्या चीन ताजपोशी के लिए तैयार है या दुनिया के देश चीन को अपना प्रधान मानाने के लिए उत्सुक है? हालात बता रहे हैं कि चीन के लिए अमेरिका की तरह और अमेरिकी तर्ज पर दुनिया का प्रधान बनना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। कोरोना संकट ने इस दूरी को और बढ़ा दिया है। पहला, चीन की अंतरराष्ट्रीय विश्वसनीयता खतरे में पड़ गई है। कई यूरोपीय देशों में जो सुरक्षा किट भेजे गए हैं, वे जांच में खतरे नहीं उतरे। भारत में जो किट चीन से आए, वे भी भरोसेमंद साबित नहीं हुए। चीन ने पूरी दुनिया को जिस तरह से खतरे में डाल दिया है, वह चीन की राजनीतिक व्यवस्था पर बेहद गंभीर प्रश्न खड़ा करता है। मठाधीशी के लिए चीन पूरी दुनिया को हाशिए पर धकेल सकता है। अगर उसके हाथ में चाबुक चला गया तो कब विश्व प्राकृतिक विध्वंस के खंडहर में जा गिरेगा, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।

चीन का आर्थिक ढांचा इस वक्त खस्ताहाल हो चुका है। ऐसे में भी अगर वह इस बात का दावा कर रहा है कि उसकी व्यवस्था दुरुस्त हो गई है, तो यह केवल दुनिया को भ्रम में डालने से ज्यादा और कुछ नहीं है। चीन की आर्थिक व्यवस्था की रीढ़ निर्यात है। अमेरिका, फ्रांस और यूरोप के कुछ देशों को चीन कुल निर्यात का चालीस फीसद हिस्सा निर्यात करता है। लेकिन अब इन देशों ने चीन के लिए अपने दरवाजे बंद कर दिए है। तकरीबन यही स्थिति दुनिया के दूसरे देशों की भी है। इस परिस्थित में चीन की आर्थिक शक्ति कैसे बढ़ेगी। चीन के आर्थिक गलियारे का भी काम पूरी तरह से रुका हुआ है। अरबों डॉलर का कर्ज खटाई में जाता दिखाई दे रहा है। मलेशिया सहित कई देशों ने चीन की इस परियोजना पर सवाल खड़े किए हैं।

दुनिया को जीतने के लिए चीन ने एक वैकल्पिक विश्व ढांचा बनाने में अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की जगह उसने अपने एक बैंक की स्थापना की, जो उससे ज्यादा रकम दुनिया के दूसरे देशों को दे सकता है। इसके अलावा उसने उन अंतरराष्ट्रीय संगठनों को भी तिलांजलि दे दी, जो उसकी बात से इत्तफाक नहीं रखते। फिर भी चीन का दुनिया का सबसे ताकतवर देश बनाने का सपना अधूरा ही रहेगा। यह भी साफ है कि अमेरिका भी मठाधीश नहीं होगा। तब कैसी होगी दुनिया की व्यवस्था? क्या रूस, भारत, फ्रांस, जापान और ब्राजील जैसे देशों की अहमियत बढ़ जाएगी?

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