jansatta raajneeti column India will triumph in coronavirus multinational tragedy lead the world in times to come – राजनीतिः वैश्विक त्रासदी में खड़ा भारत

0
91
.

प्रभात झा

बहुराष्ट्रीय त्रासदी कोरोना के कारण आज देश में पूर्णबंदी का एक माह हो गया। सब कुछ ठप रहा, पर भारत चलता रहा। इस एक माह के भीतर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सक्रियता से भारत का नेतृत्व किया और यह संदेश दिया कि उनमें विश्व का नेतृत्व करने की ताकत है। नेतृत्व की इस क्षमता के पीछे राष्ट्र के रूप में भारत की लोकतांत्रिक ताकत है। कुछ अपवादों को अगर छोड़ दें, भारत का यह सौभाग्य रहा है कि यहां संविधान के दायरे में सरकार की शक्ति और जनता के अधिकार में अद्भुत संतुलन रहा है, जो वैश्विक जगत को भी अचंभित करता है। भारतीय गणतंत्र की सफलता के मूल में जनता द्वारा अधिकार की आराधना से अधिक कर्तव्य की साधना रही है। यह भारत की सनातन प्रकृति रही है, संस्कृति रही है, जो चुनौतियों की विकृति को कभी लंबे समय तक हावी नहीं होने दिया।

बंदी एक आपातकालीन व्यवस्था है, जो सरकार द्वारा संकट और आपात की स्थिति में नागरिकों के आवागमन को प्रतिबंधित करता है। आधुनिक विश्व इतिहास में बंदी जैसी स्थिति पहले विश्वयुद्ध में बनी, जो 28 जुलाई, 1914 से आरंभ होकर 28 जून, 1919 को वार्सा की संधि के साथ समाप्त हुआ। ब्रिटिश उपनिवेश होने के कारण भारत भी इसमें परोक्ष रूप से शामिल होने के लिए बाध्य था। किंतु भारत पर इसके प्रभाव कई मायनों में सकारात्मक भी कहे जा सकते हैं, क्योंकि भारतीय सैनिकों के इस युद्ध में शामिल होने की शर्तों को ब्रिटिश सरकार द्वारा पूरा न किए जाने से भारतीयों का उसके प्रति मोहभंग हो गया और बढ़ते असंतोष ने राष्ट्रवाद को बढ़ाया, अंतत: स्वतंत्रता की चेतना प्रस्फुटित हुई।

द्वितीय विश्वयुद्ध की शुरुआत 1 सितंबर, 1939 को हुई और वह 2 सितंबर, 1945 तक चला। इस दौरान छह साल तक विश्व में बंदी जैसी स्थिति रही। एक अनुमान है कि विश्व में पांच से सात करोड़ लोगों की जानें गईं, जिसमें सैनिकों के साथ-साथ बड़ी संख्या में नागरिक भी काल के गाल में समा गए। द्वितीय विश्वयुद्ध ने ब्रिटिश सरकार से भारत की स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त किया।

स्वतंत्र भारत में बंदी की स्थिति 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान बनी थी। हमने देखा था स्कूल, कॉलेज, सरकारी कार्यालयों में काम जरूर होते थे, लेकिन सरकारी निर्देशों के साथ नियंत्रण में। रात को रोशनी जलाना प्रतिबंधित था। कर्फ्यू जैसे हालात रहते थे। डर और दहशत का माहौल रहता था। इन दोनों युद्धों में क्रमश: लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी के नेतृत्व में भारत की विजय हुई। राष्ट्रीय संस्कृति के प्रति उदासीनता समाप्त हुई और राष्ट्रीयता का नवजागरण हुआ। सुप्त राष्ट्रीयता ने जागृत राष्ट्रीयता का रूप लिया। नव-राष्ट्रवाद का जागरण हुआ। नव-राष्ट्रवाद की इस धारा को उस समय और शक्ति मिली जब 1999 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में कारगिल युद्ध में विजय मिली।

आज पूरा विश्व अदृश्य शत्रु कोरोना विषाणु से युद्ध लड़ रहा है। भारत भी इस युद्ध को मजबूती से लड़ रहा है। लेकिन कोरोना के विरुद्ध इस युद्ध के कारण आज जो बंदी की स्थिति है, राष्ट्र के रूप में भारत और भारतीय नागरिकों ने इसे चुनौती से अधिक अवसर के रूप में लिया है। चुनौती है। गंभीर चुनौती है। लेकिन नागरिकबोध, आत्मविश्वास और जागृति के एक नए युग की शुरुआत भी हुई है। नागरिकों का आत्मविश्ववास बढ़ा है और आत्मसम्मान जगा है। बहुराष्ट्रीय त्रासदी के दौरान नागरिक कर्तव्य क्या हो, यह परिभाषित हुआ है। जनता और सरकार के बीच परस्पर विश्वास, अधिकार और कर्तव्यबोध परिभाषित हुआ है। सरकार क्या है? सरकार कैसी हो? किसके लिए हो? दायित्व क्या हो? सरकार की आवश्यकता क्यों? इन प्रश्नों का सार्थक उत्तर मिला है।
बंदी के इस दौर में लोगों ने घर में रह कर राष्ट्र की आराधना की है। सामूहिकता, पड़ोसी भाव, रिस रहे रिश्ते की मजबूती, अपनत्व, आत्मीयता, उदारता, सेवा-भाव को उचित स्थान मिला है। ‘कोई भूखा नहीं रहेगा’ का भाव जगा है। सरकार के आग्रह और नागरिकों के कर्तव्य से संकट की इस घड़ी में नागरिकबोध का जागरण हो रहा है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक आज एक ही जनभावना है ‘मैं भी जीऊं और सब जियें’। जनश्रद्धा और जनआस्था जैसे सामाजिक-सांस्कृतिक भारतीय मूलतत्व ने अपना पुन: स्थान प्राप्त किया है। सहिष्णुता, सहानुभूति, संवेदनशीलता और सद्भाव का ऐसा अद्भुत दृश्य भारतीय समाज ने पहले शायद ही देखा हो।

पूरे देश में इस समय अलग-अलग विभागों के लगभग सवा करोड़ कोरोना योद्धा अगली पंक्ति में कार्यरत हैं। उनमें डॉक्टर, अस्पतालकर्मी, पुलिस, सफाईकर्मी आदि शामिल हैं। कोरोना योद्धाओं पर आक्रमण की कुछ अवांछित घटनाएं हुई हैं, लेकिन गृह मंत्रालय ने संज्ञान लेकर ऐसे मामलों में राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के अंतर्गत कड़ी कार्रवाई करने को कहा है। सार्वजनिक उपक्रम हों या निजी, सभी ने अपने स्तर से योगदान दिया है। भारतीय रेल ने दवा और खाद्यान्न को देश के कोने-कोने तक पहुंचाया, वहीं रेल डिब्बों को अस्पताल में परिवर्तित किया है। विनिर्माण क्षेत्र में लगे उद्योगों ने मास्क, टेस्ट किट और पर्सनल प्रोटेक्शन इक्यूपमेंट का निर्माण किया।

कोरोना महामारी तो बहुराष्ट्रीय त्रासदी है, लेकिन इस त्रासदी ने विशेषकर हम भारतीयों को अनेक सीख दी है। ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की उदार नीति ने भारत को विश्व में आज एक नई पहचान दी है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल पर इस त्रासदी के बीच विश्व के बासठ देशों को हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन सहित अनेक दवाओं की आपूर्ति हो रही है। विश्व त्रासदी के इस काल में अपने देश का नेतृत्व करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सार्क देशों और जी-20 देशों (जिसमें विश्व के अग्रणी देश शामिल हैं) की अगुआई की है। अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, ब्राजील जैसे देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने उन्हें न केवल बधाई दी, अपितु भारत का शुक्रिया भी अदा किया।

कोरोना संक्रमित लोगों की संख्या विश्व में बढ़ कर पच्चीस लाख से अधिक हो गई है, और इसने पौने दो लाख से अधिक लोगों की जान ले ली है। साथ ही, यह राहत भरी खबर है कि विश्वभर में अब तक कोरोना महामारी से 6.56 लाख लोग ठीक भी हुए हैं। विश्व में अमेरिका की स्थिति सबसे गंभीर है, जहां आठ लाख से अधिक लोग संक्रमित हैं, वहीं पैंतालीस हजार से अधिक लोगों की मृत्यु हो गई है। इटली, फ्रांस, स्पेन और जर्मनी में भी मरने वाले लोगों की संख्या हजारों में है और यह संख्या लगातार बढ़ रही है। जहां तक भारत का प्रश्न है, सब कुछ नियंत्रण में है। कोरोना संक्रमितों की संख्या अब तक लगभग बीस हजार है, जिसमें लगभग चार हजार से अधिक लोग ठीक हो चुके हैं, जबकि साढ़े छह सौ से अधिक लोगों की मृत्यु हो चुकी है और पंद्रह हजार संक्रमितों का अस्पतालों में उपचार चल रहा है। गोवा, मणिपुर, उत्तराखंड राज्य पूरी तरह कोरोना मुक्त घोषित हो चुके हैं। बाईस करोड़ की आबादी वाले उत्तर प्रदेश और बारह करोड़ आबादी वाले बिहार में कोरोना संक्रमितों की संख्या कम है। पूरे देश में कोरोना संक्रमितों की वृद्धि दर में लगातार कमी आ रही है। भारत की यह सकारात्मक स्थिति नेतृत्व की अद्भुत शक्ति और नागरिक बोध की सजग कर्तव्यपरायणता का परिणाम है।

भारत इस बहुराष्ट्रीय त्रासदी में न केवल विजय प्राप्त करेगा, बल्कि आने वाले समय में विश्व का नेतृत्व भी करेगा। विश्व के कोने-कोने से यह स्वर सुनाई दे रहा है। अमेरिका की एक संस्था ने 1 जनवरी से 14 अप्रैल के बीच एक सर्वेक्षण कराया कि कोरोना की रोकथाम में विश्व का कौन-सा नेतृत्वकर्ता सबसे आगे है। सर्वे में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार सबसे आगे रहे। साफ है, आज पूरा विश्व मान रहा है कि कोरोना से लड़ाई में वे दुनिया में सबसे अधिक प्रभावी हैं।

(लेखक पूर्व राज्यसभा सांसद एवं भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं)

 

 

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App। में रुचि है तो



सबसे ज्‍यादा पढ़ी गई




Source link

Authors

.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here