Plastic waste emerging major challenge before world become a serious problem non-settlement – राजनीति: प्लास्टिक से बचाव की चुनौती

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प्लास्टिक अब पारिस्थितिकी तंत्र को भी प्रभावित कर रहा है। यह हमारे घर से लेकर समंदर तक का रास्ता तय करता है। लेकिन यह न तो सड़ता है और न ही गलता है। यही कारण है कि इसका प्रदूषण चरम पर है। इसकी पहुंच अब अंटार्कटिका तक हो गई है। वैज्ञानिकों ने बताया है कि बढ़ते वैश्विक तापमान की वजह से अंटार्कटिका में हर साल दो सौ अरब टन बर्फ पिघल रही है। बर्फ के इन टुकड़ों में प्लास्टिक के टुकड़े पाए गए हैं। ग्रीन पीस के सर्वे से भी यह पता चला है कि माइक्रोप्लास्टिक के छोटे कणों ने यहां की बर्फ को भी प्रदूषित कर दिया है। जलवायु संकट के कारण यहां का पारिस्थितिक तंत्र पहले से ही खतरे में है।

प्लास्टिक ने इस खतरे को और बढ़ा दिया है। वैज्ञानिकों को अंटार्कटिका की मिट्टी में पाए जाने वाले सूक्ष्मजीवों के अंदर से पहली बार माइक्रोप्लास्टिक मिला है। यह बात ‘बायोलॉजी लेटर्स’ नाम के साइंस जर्नल में छपी है। अंटार्कटिका के जीवों में प्लास्टिक पहुंचने से ध्रुवीय पारिस्थिकीय तंत्र पर और दबाव बनेगा जो पहले से ही इंसानी दखलअंदाजी और जलवायु संकट की परेशानियां झेल रहा है।

अंटार्कटिका के जीवों में माइक्रोप्लास्टिक कैसे पाया गया, इसके लिए शोधकर्ताओं ने किंग जॉर्ज द्वीप समूह से लाए गए एक सिंथेटिक फोम के टुकड़े की जांच की, जो लंबे समय से वहां पड़े होने के कारण मॉस और लाइकेन जैसे समुद्री जीवों से लिपटा था। इंफ्रारेड इमेजिंग तकनीक की मदद से इनमें से एक जीव के भीतर पॉलीस्टाइरीन से बने फोम का अंश पाया गया। यह जीव स्प्रिंगटेल के नाम से जाना जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम क्रिप्टोपाइगस अंटार्कटिकस है।

यह सूक्ष्मजीव अंटार्कटिका क्षेत्र में हमेशा बर्फ से ढके स्थान पर रहता है और लाइकेन व माइक्रो-एल्गी को खाता है। ऐसा अनुमान है कि इसी भोजन के माध्यम से माइक्रोप्लास्टिक स्प्रिंगटेल के भीतर पहुंचा होगा। शोधकर्ताओं का मानना है कि प्लास्टिक इस रास्ते से अब अंटार्कटिका में पाए जाने वाले जीवों के भीतर प्रवेश कर चुका होगा।

माइक्रोप्लास्टिक प्लास्टिक का सबसे छोटा कण होता है। इसका आकार पांच माइक्रो मिलीमीटर से भी छोटा होता है। दुनिया भर की नदियों और सागरों में इस समय करीब पंद्रह करोड़ टन प्लास्टिक का कचरा घुला होने का अनुमान है। यह जब सागर की लहरों और पराबैंगनी किरणों के कारण टूट-टूट कर बहुत छोटा हो जाता है तो माइक्रोप्लास्टिक बन जाता है और समुद्री जीवों में पहुंच जाता है। दरअसल, प्लास्टिक के ये बारीक कण हर जगह मौजूद हैं। यहां तक कि टुथपेस्ट के जरिए भी माइक्रोप्लास्टिक सीधे हमारे मुंह में पहुंच जाता है। सौंदर्य प्रसाधन के सामान में भी माइक्रोप्लास्टिक मौजूद होता है, जिसे हम देख नहीं पाते।

इसके अलावा यह शहरों की सीवेज प्रणाली से होता हुआ नदियों और सागरों तक पहुंच जाता है और फिर पानी में घुला यह माइक्रोप्लास्टिक मछलियों के पेट तक पहुंचता है। 2017 में किए गए एक सर्वे के मुताबिक इंडोनेशिया और कैलिफोर्निया की पच्चीस फीसद समुद्री मछलियों में प्लास्टिक मिला है। यह आहार चक्र के जरिए इंसान तक पहुंचता है। नमक जो रोज हमारे खाने का हिस्सा है, यह समुद्री पानी से ही बनता है। एक मोटे अनुमान के मुताबिक हर साल 1.2 करोड़ टन प्लास्टिक महासागरों में जा रहा है। नमक के साथ यह माइक्रोप्लास्टिक हर किसी के पेट में पहुंच रहा है।

यहां तक कि नल के जरिए सप्लाई होने वाले पीने के पानी के अस्सी फीसद नमूनों में माइक्रोप्लास्टिक मिला है। पीने के पानी में प्लास्टिक का इस कदर मिलना बताता है कि प्लास्टिक हर जगह पहुंच चुका है। इसी पानी का इस्तेमाल खाना बनाने और मवेशियों की प्यास बुझाने के लिए भी किया जाता है।

सिथेंटिक टेक्सटाइल से बने कपड़ों को जब भी धोया जाता है, तब उनसे काफी ज्यादा माइक्रोप्लास्टिक निकलता है। शोध से पता चला है कि छह किलोग्राम कपड़ों को धोने पर सात लाख से ज्यादा माइक्रोप्लास्टिक फाइबर निकलते हैं। सिथेंटिक टेक्सटाइल से महासागरों में रोजाना पैंतीस फीसद माइक्रोप्लास्टिक पहुंचता है। पानी और जलीय जीवों के साथ ही वैज्ञानिकों को शहद जैसी चीजों में भी माइक्रोप्लास्टिक मिला है। हाल में यूरोपीय संघ ने प्लास्टिक के खिलाफ बनाई गई रणनीति में यह बात साफ कही है कि शहद में भी माइक्रोप्लास्टिक की अच्छी खासी मात्रा मौजूद रहता है।

सड़कों पर दौड़ते टायर वाले वाहन इसके बड़े स्रोत हैं। पर्यावरण में माइक्रोप्लास्टिक सबसे ज्यादा टायरों के जरिए फैलता है। सड़क पर घिसते टायर बहुत ही बारीक माइक्रोप्लास्टिक छोड़ते हैं। यह हवा और पानी के संपर्क में आते ही पूरे वातावरण में फैल जाते हैं, जिसका दुष्प्रभाव हमें देखने को मिल रहा है।

प्लास्टिक का जीवन काल बहुत लंबा होता है। वैज्ञानिकों ने एक प्रयोग के तहत हाल में गहरे समंदर से दूध वाला एक कंटेनर और एक प्लास्टिक का थैला निकाला और पाया कि बीस साल समंदर में रहने के बावजूद इनमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ। इसके घटकों में भी कोई गिरावट देखने को नहीं मिली। इस शोध के नतीजे साइंस पत्रिका नेचर में छपे हैं। शोधकर्ताओं ने पहली बार ऐसे सबूत पेश किए हैं जिसमें समंदर की तलहटी में बीस साल पुराना प्लास्टिक सही सलामत मिला है।

वैज्ञानिकों ने इस प्लास्टिक का विश्लेषण करते समय यह भी देखा कि इल पर अलग तरह के सूक्ष्मजीव मौजूद थे। ऐसे जीव समुद्र की सतह पर नहीं पाए जाते। वैसे सूक्ष्म कीटाणु समंदर की गहरी सतह पर पाए जाते हैं, लेकिन समुद्र की सतह पर प्लास्टिक जमा होने से नई तरह के प्रजातियां पैदा हो रही है।

प्लास्टिक का कचरा घटाने के लिए भारत ने पिछले साल एक महत्त्वाकांक्षी परियोजना शुरू की थी। इसका लक्ष्य था कि 2022 तक देश में एक बार उपयोग किए जा चुके प्लास्टिक को पूरी तरह से हटा दिया जाए। लेकिन इस दिशा में कोई खास प्रगति नहीं हुई है। इस समय भारत में प्लास्टिक की प्रति व्यक्ति खपत ग्यारह किलोग्राम है, जबकि अमेरिका में यह 109 किलोग्राम है। भारत के एक उद्योग संगठन फिक्की द्वारा 2017 में जारी आंकड़ों के अनुसार दुनिया में सबसे ज्यादा प्लास्टिक की प्रति व्यक्ति खपत अमेरिका में ही है। लेकिन ऐसा अनुमान है कि हमारे देश में प्लास्टिक की खपत 2022 तक बढ़ कर बीस किलोग्राम हो जाएगी, जबकि वैश्विक औसत लगभग अट्ठाईस किलोग्राम है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत में लगभग छप्पन लाख टन सालाना प्लास्टिक कूड़े पैदा होता है। भारत में जितना भी प्लास्टिक इस्तेमाल होता है, उसमें से आधा तो पैकेजिंग के काम आता है और यह एक बार इस्तेमाल किया जाने वाला होता है। इस पर रोक लगाने की आवश्यकता है। हालांकि कई राज्यों ने पहले ही प्लास्टिक के थैले बंद कर दिए हैं। लेकिन प्रतिबंध का पालन करवाने की व्यवस्था बहुत ढीली ढाली है। सरकारी आकड़े बताते हैं कि भारत में पूरे ठोस कूड़े का लगभग आठ फीसद केवल प्लास्टिक ही होता है जो चिंता का विषय है।

महासागरों में प्लास्टिक का कचरा होने की जानकारी तो पहले से ही थी। लेकिन अंटार्कटिका जैसे इंसानी आबादी से दूर दराज के इलाकों में प्लास्टिक का पाया जाना नई बात है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यहां भी प्लास्टिक पहुंचने का मतलब हुआ कि इससे अंटार्कटिका का पर्यावरण भी प्रभावित होगा। जलवायु परिवर्तन के कारण यहां बढ़ते तापमान से पहले से ही ग्लेशियर पिघल रहे हैं। इसके अलावा यहां इंसानी गतिविधियां भी काफी बढ़ गई हैं। इसलिए ऐसी संभावना है कि किंग जॉर्ज द्वीप के आसपास का इलाका पूरे अंटार्कटिका के सबसे प्रदूषित क्षेत्रों में से एक हो जाए।

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