poor education system in Bihar under questions flaws in higher education to primary education – राजनीति: सवालों के घेरे में शिक्षा व्यवस्था

0
61
.

संगीता सहाय
एक वक्त था जब नालंदा, विक्रमशिला जैसे विख्यात शिक्षा केंद्र भारतवर्ष का गौरव हुआ करते थे। यहां के ज्ञान से पूरा विश्व आलोकित हुआ। बीच के कालखंड में भी इस क्षेत्र के शिक्षा केंद्रों ने अपनी प्राचीन परंपरा को बनाए रखा। लेकिन भारत की आजादी के बाद बिहार में शिक्षा के ऐसे बुरे दिन शुरू हुए कि साल दर साल हमारी यह महान गौरवशाली परंपरा सियासत की भेंट चढ़ती चली गई। वर्तमान में बिहार की शिक्षा व्यवस्था का हाल किसी से छिपा नहीं है। चाहे स्कूली शिक्षा हो, या उच्च शिक्षा, सबकी दशा एक जैसी ही है, सब गर्त में हैं।

राज्य के वर्तमान शैक्षणिक हालात, विशेषकर बदहाल होती विद्यालयी शिक्षा पर विस्तृत चर्चा से पूर्व कुछ आंकड़ों पर गौर करने की जरूरत है। गौरतलब है, वर्ष 2009 में राज्य के सरकारी विद्यालयों में करीब सत्ताईस लाख बच्चों का दाखिला पहली कक्षा में हुआ था। वर्ष 2018 में 17.98 लाख विद्यार्थियों ने बिहार बोर्ड की मैट्रिक की परीक्षा में भाग लिया। यानी कक्षा एक से दस तक आते-आते नौ लाख बच्चे सरकारी स्कूली शिक्षा से बाहर हो गए। यह स्थिति राज्य की मौजूदा शिक्षा व्यवस्था की तस्वीर बताने के लिए काफी है।

वर्ष 2019 में बिहार सरकार के शिक्षा विभाग ने उन स्कूलों को बंद करने का निर्देश जारी किया था, जहां नामांकन या तो शून्य था या बीस से कम पहुंच गया था। ‘यू – डायस’ के 2017-18 के आंकड़ों के मुताबिक शून्य नामांकन वाले स्कूलों की संख्या तेरह है, जबकि एक सौ इकहत्तर विद्यालयों में नामांकन बीस से भी कम हुआ है। इसी प्रकार इक्कीस से तीस और इकत्तीस से उनतालीस नामांकन वाले प्राथमिक विद्यालयों की संख्या क्रमश: तीन सौ छत्तीस और छह सौ बीस है। एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार राज्य के ज्यादातर जिलों में पहली और दूसरी कक्षा में नामांकित बच्चों की संख्या आठवीं के कुल नामांकन से बीस फीसद से भी कम है।

कहा जा सकता है कि हर साल नामांकन दर तो कम हो ही रही है, साथ ही बीच में ही स्कूल छोड़ देने की दर भी बढ़ती जा रही है। एक स्थिति यह भी है कि सरकारी लाभ लेने के लिए बच्चे दाखिला तो ले लेते हैं, परंतु विधिवत पढ़ाई पब्लिक स्कूलों और प्राइवेट ट्यूशन के द्वारा करते हैं। इसके कई कारण हैं। राज्य के करीब 96.4 फीसद विद्यालयों में शिक्षक-छात्र का अनुपात ठीक नहीं है। जबकि 52.3 फीसद विद्यालयों में शिक्षक-कक्षा का अनुपात ठीक नहीं है। करीब चालीस फीसद विद्यालयों में शौचालयों की कोई व्यवस्था नहीं है और जहां हैं भी, वहां उनके उपयोग की आदत बच्चों में डाली ही नहीं गई है या उपयोग करने ही नहीं दिया जाता। हैरानी की बात तो यह है कि पैंतीस से चालीस फीसद विद्यालालयों में पुस्तकालय नहीं हैं।

‘मिड डे मिल’ बच्चों को स्कूल में बुलाने और उन्हें वहां रोके रखने का एक बड़ा माध्यम है। परंतु इसमें आए दिन होने वाले घोटालों की समस्या के अलावा अधिकांश विद्यालयों में अब तक न तो सही तरीके से रसोई घर हैं, न ही बच्चों को बैठा कर खिलाने लिए जगह। ज्यादातर स्कूलों में भोजन बनाने के लिए फूस से बने रसोईघर या खुले स्थानों का उपयोग होता है और बरामदे या कक्षाओं ही बैठ कर बच्चे खाना खाते हैं। खाना बनाने और खिलाने के काम में साफ-सफाई का ध्यान न के बराबर ही रखा जाता है। जाहिर है, वास्तव में सरकार की नीयत और नीति में ही कमी है।

बिहार में शिक्षा का अधिनियम लागू हुए डेढ़ दशक हो चुके हैं। पर यहां यह कानून अभी भी ज्यादातर मामलों में सलीब पर ही टंगा है। केंद्र सरकार सर्वशिक्षा अभियान और राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान के तहत हजारों करोड़ रुपए राज्यों को उपलब्ध कराती है। इस कार्यक्रम के तहत प्रत्येक पांच किलोमीटर की परिधि में कम से कम एक माध्यमिक स्कूल खोलने का लक्ष्य रखा गया है। इसके तहत राज्य में नौ सौ उनचास मध्य विद्यालयों को उन्नत किया जाना है। पर बिहार इन तमाम लक्ष्यों से कोसों दूर है। राज्य की करीब पैंसठ फीसद पंचायतों में माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक विद्यालय नहीं हैं।

जबकि राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान के तहत प्रत्येक ग्राम पंचायत में एक माध्यमिक स्कूल होना चाहिए। विद्यालयों में शिक्षक, शैक्षणिक संसाधन सहित तमाम आवश्यक चीजों की कमी है। बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए गैर शैक्षणिक गतिविधियों का आयोजन बस खानापूर्ति के लिए होता है। विद्यालयों की बेहतरी के लिए बनी अधिकांश योजनाएं फाइलों में धूल खाती रह जाती है। यह स्थिति शिक्षण के हर स्तर पर है।

बिहार में सर्वप्रथम वर्ष 2008-2009 में नियमित रूप से इंटरमीडिएट की पढ़ाई के लिए उच्च विद्यालयों को उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के रूप में प्रोन्नत करने की प्रक्रिया शुरू हुई थी। यह कार्य लगभग बिना किसी नियोजित तैयारी के शुरू कर दिया गया। उन विद्यालयों से मैट्रिक करने वाले छात्रों को पुन: वहीं से ग्यारहवीं और बारहवीं करने के लिए बाध्य होना पड़ा। उन तमाम विद्यालयों में तब भी और अब भी नौवें और दसवें वर्ग के लिए ही सभी विषयों के शिक्षक सहित तमाम शैक्षणिक ससाधनों की कमी बनी हुई है। इंटरमीडिएट की पढ़ाई के लिए तो व्यवस्था के नाम पर सब कुछ शून्य ही है।

जबकि कायदे से होना यह चाहिए था कि विद्यालयों में ग्यारहवीं और बारहवीं की पढ़ाई आरंभ करने पूर्व राज्य सरकार उसकी मुकमम्ल तैयारी करती। प्रत्येक विषय के लिए योग्य शिक्षकों की बहाली, सुविधायुक्त भवन निर्माण, पुस्तकालय, विज्ञान विषयों के लिए प्रयोगशाला सहित तमाम संसाधनों की व्यवस्थाएं करनी चाहिए थी। लेकिन यह दुखद है कि कई सत्र बीत जाने के बावजूद आज भी प्रत्येक वर्ष इसके लिए सभी विभागों- विज्ञान, कला और वाणिज्य आदि में छात्रों का नामांकन तो हो रहा है, परंतु उनकी पढ़ाई से संबंधित सभी सुविधाएं और संसाधन लगभग नदारत हैं। ऐसे हाल में छात्रों की उपस्थिति और पढ़ाई की बात करना ही बेमानी है।

सरकार ने मध्याह्न भोजन, साइकिल, पोशाक, छात्रवृति सहित तमाम योजनाओं के माध्यम से बच्चों को विद्यालय की ओर खींचने की कोशिश तो की, लेकिन वह शिक्षा के असल उद्देश्य यानि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के मामले में पूरी तरह नाकाम रही। इसका बड़ा कारण इस व्यवस्था की रीढ़ शिक्षकों की अनदेखी है। इसे गुणवत्ता को नजरंदाज करने, नियुक्ति के तरीकों, असमान और निम्नतर वेतन-भत्ते से लेकर अन्य हर स्तर पर लगातार किया जा रहा है। वर्ष 2006 से सरकार द्वारा शिक्षक नियुक्ति के नियमों को परिवर्तित कर इसके लिए नए सिरे से नियोजन इकाई का निर्माण किया गया था, जिसकी जिम्मेदारी पंचायती राज व्यवस्था को दी गई। तब से लेकर अब तक राज्य के विद्यालयों में सभी स्तर पर ‘डिग्री लाओ नौकरी पाओ’ के तरीके से शिक्षक के पद भरे जा रहे हैं। फलस्वरूप आज इस पद पर लगभग वही लोग आते हैं जो हर तरफ से थक-हार चुके होते है। स्वाभाविक रूप से इससे शिक्षा स्तर भी घटा।

सबसे बड़ा सवाल सरकार की मंशा पर है। साल दर साल बर्बाद और समाप्त होते सकारी शिक्षा संस्थान और हर रोज खुलते महंगे गैरसरकारी विद्यालय और कोचिंग संस्थान, बड़े-बड़े उद्दोगपतियों, राजनेताओं सहित तमाम संपन्न लोगों द्वारा इसे व्यवसाय के रूप में अपनाना…, सब कुछ यह स्पष्ट करने के लिए काफी है कि सरकार का कदम सरकारी शिक्षा को पूर्णतया समाप्त कर उनका निजीकरण करना है। हर स्तर पर फैली कुव्यवस्था राज्य की शिक्षा व्यवस्था की बर्बादी को मुकम्मल करने के लिए काफी है। यह मुद्दा राज्य की लगभग तिरासी फीसद आबादी के जीवन और अस्तित्व से जुड़ा है।

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App। में रुचि है तो




सबसे ज्‍यादा पढ़ी गई




Source link

Authors

.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here