children have been asked to study at home through social media during lockdown –

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विशेष गुप्ता
कोरोना महामारी की वजह से इस समय पूरे देश में पूर्णबंदी चल रही है और लोग घरों में कैद हैं। यह वह वक्त है जब बच्चे इस समय माता-पिता के साथ और सबसे करीब हैं। पढ़ाई का नुकसान न हो, इसलिए स्कूलों ने भी इस बीच आनलाइन पढ़ाई के लिए पाठ्यक्रम भी बच्चों के घरों पर भेजना शुरू कर दिया है। बच्चों ने गैजेटों के सहारे अभ्यास भी शुरू कर दिया है। हालांकि इससे बच्चों के तनाव में रहने की खबरें भी आने लगी हैं। गौर करने वाली बात यह है कि लंबे समय तक इन गैजेटों का इस्तेमाल कितना महंगा पड़ सकता है, इसी से जुड़ी कुछ हालिया रिपोर्टों पर गौर किया जाना बहुत जरूरी है। अभिभावकों को भी इन रिपोर्टों की विषयवस्तु पर ध्यान देने की जरूरत है।

पहला सर्वे ब्रिटेन के हार्ट आफ इग्ंलैंड फाउंडेशन का है। इस सर्वे में कहा गया है कि टच स्क्रीन फोन और टेबलेट के अधिक इस्तेमाल से बच्चों की अंगुलियों की मांसपेशियों का ठीक से विकास नहीं हो पा रहा है। इसका नुकसान यह हो रहा है कि ऐसे बच्चों को अब पैन व पेंसिल पकड़ने में भी समस्या आने लगी है। साथ ही, इससे बच्चे देरी से लिखना सीख रहे हैं। दूसरा सर्वे भारत की ही मोबाइल कंपनी ने कराया है, जिसमें यह खुलासा हुआ है कि भारत में तीस फीसद से भी अधिक बच्चे रोजाना छह घंटे से भी अधिक का समय मोबाइल स्क्रीन पर बिताते हैं।

मनोचिकित्सकों की राय है कि बच्चों के अधिक समय गैजेट के साथ बिताने का नुकसान यह है कि उनमें चिड़चिड़ापन पैदा हो जाता है और भूख व नींद की कमी लगातार देखने को मिल रही है। इसी प्रकृति से जुड़ा एक और सर्वे ऐसोचैम का भी है। उसका निचोड़ यह है कि आज भारत में आठ से तेरह आयु वर्ग के तिहत्तर फीसद बच्चे फेसबुक का इस्तेमाल कर रहे हैं। हैरत की बात यह है कि इस आयु वर्ग के पचहत्तर फीसद बच्चों के माता-पिता ने खुद ही उन्हें इसकी पूरी जानकारी दी है। इससे भी अधिक ताज्जुब की बात तो यह है कि बयासी फीसद अभिभावकों ने अपने बच्चों को खुद सोशल मीडिया का अकाउंट बनाने में मदद की। इस सर्वे के निष्कर्ष से यह बात भी निकल कर आई कि आज तेरह साल के पच्चीस फीसद, ग्यारह साल के बाईस फीसद, दस साल के दस फीसद और आठ से नौ साल के तकरीबन पांच से दस फीसद बच्चे फेसबुक के साथ में सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं।

सोशल मीडिया के प्रति बच्चों का रुझान बढ़ाने में अभिभावकों का बड़ा योगदान रहा है। ब्रिटेन में माता-पिता ने ही बच्चों को खुद आधुनिक गैजेट खरीद कर दिए। यही वजह है कि उनका बच्चों से संवाद अब केवल सोशल मीडिया के जरिए ही होता है। इसलिए माता-पिता और उनके बच्चों यानी पूरे परिवार की सामाजिक दुनिया अब सोशल साइटों तक ही सिमट कर रह गई है। कड़वा सच यह है कि अब भारत में भी सोशल मीडिया की आभासी दुनिया ने सामाजिक संबंधों को प्रभावित करना शुरूकर दिया है। मुंबई में तो ऐसे कई चिकित्सा केंद्र शुरू हो गए हैं जहां लोग अपने बच्चों की सोशल मीडिया की लत छुड़ाने के लिए उन्हें ले जा रहे हैं। इनमें नाबालिग ज्यादा हैं। सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने वालों में भारत आज एशिया में तीसरा और विश्व में चौथा देश है। साथ ही इंटरनेट प्रयोग करने वाली पिच्यासी फीसद आबादी यहां आठ से चालीस साल के बीच है। निश्चित ही यह वह वर्ग है जो नेट सर्च, ई-मेल, फेसबुक, ट्विटर और लिंक्डइन के जरिए समाज के वास्तविक संबंधों से धीरे-धीरे कट रहा है।

इस संदर्भ में सामाजिक तथ्य बताते हैं कि आज कंप्यूटर व इंटरनेट की आभासी दुनिया बच्चों के शुरुआती जीवन के लिए अपरिहार्य परिवार, स्कूल व क्रीड़ा समूह जैसी प्राथमिक संस्थाओं की उपादेयता पर सवालिया निशान लगा रही है। सूचनाओं के तेजी से उभरते इस समाज में आज यह प्रश्न तेजी से उठ रहा है कि इस आभासी दुनिया में हमारे प्रत्यक्ष संवाद बनाने वाले आदर्श तेजी से दम क्यों तोड़ रहें हैं? साथ ही, फेसबुक, व्हाट्सऐस और ट्विटर जैसी साइटों के सामने हमारे मष्तिष्क को तरोताजा रखने वाला हमारा स्वस्थ्य प्रत्यक्ष सामाजिक संवाद भी अब जीवन से नदारद हो रहा है। यहां तक कि विद्यालयों में भी पठन-पाठन की क्रिया और शिक्षक की तुलना में सोशल साइटों से तीखा संवाद ज्यादा प्रभावी हो रहा है।

आज आर्थिक दबावों के समक्ष अभिभावकों को फुरसत ही नहीं है। उन्होंने बच्चों का विकास करने वाले खिलौनों की जगह उनके हाथों में आईपैड और बड़े-बड़े मोबाइल थमा दिए हैं। इससे बच्चों का दोहरा नुकसान हआ है। एक तो उन बच्चों के हाथों की मांशपेशियां सिकुड़ने लगीं, दूसरे उनका संपूर्ण सामाजिक संसार आईपैड और मोबाइल तक सिमट कर रह गया है। इसका नुकसान यह हुआ कि संस्कृति और सामाजिक मूल्यों की सीख देने वाली परिवार और स्कूल जैसी संस्थाएं बच्चों के बचपन से दूर होती चली गर्इं। यही वजह है कि बच्चे भी भौतिक देह और सामाजिक सीख की दुनिया से अलग होकर आभासी सुख की दुनिया में लिप्त होने को मजबूर हैं।

पूर्णबंदी और सुरक्षित दूरी का दौर समाप्त होने के बाद हो सकता है कि बच्चों पर एकदम से पढ़ाई का बोझ आ जाए और भावनात्मक दूरी कम हो जाए। यह तो मानना पड़ेगा कि हमें बच्चों के इतना नजदीक आने का कम ही मिलता है। सबकी छुट्टियां एक साथ हों, ऐसा बहुत ही कम हो पाता है। इसलिए इस समय बच्चों का बहुआयामी सामाजीकरण करने यह सुनहरा मौका है। दरअसल, इससे जुड़ा समाजशास्त्र और अनुभव भी बताता है कि हमारी पुरानी पीढ़ियों ने अपनी अगली पीढ़ी से जुड़ कर जितना अधिक उन्हें सामाजिक-सांस्कृतिक रूप से सिखाने की कोशिश की, उन पीढ़ियों के बच्चों का जीवन उतना ही सुरक्षित, सफल व समृद्ध बना है। वर्तमान का सच यह है कि प्रत्यक्ष रुप से दैहिक सामाजीकरण का अभाव और सोशल मीडिया, कंप्यूटर व इंटरनेट के यांत्रिक संवादों की प्रचुरता ने बच्चों के बचपन को द्वंद्वात्मक बनाने में आज कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ी है।

सोशल मीडिया से बच्चों के जुड़ने की कड़वी सच्चाई यह भी है कि बच्चे धीरे-धीरे आपसी प्रेम, बंधुत्व, सहानुभूति और मानवीय संवेदना जैसे सामाजिक मूल्यों से विलग होते साफ दिखाई दे रहे हैं। इस आभासी संसार के विस्तार से सबसे अधिक प्रभावित होने वाला बच्चों का बचपन ही है। बच्चों के लगातार आभासी दुनिया में रहने का दूसरा बड़ा नुकसान यह हुआ है कि जीवन में असफलता का सामना कर पाने की क्षमता उनमें पैदा नहीं हो पाई है और इस कारण उनमें धैर्य और संयम खत्म हो जाने से उनमें निराशा के भाव भी तेजी से घर कर रहे हैं।

कहने की आवश्यकता नहीं कि अभिभावकों की जिम्मेदारी यह है कि वे बच्चों के बचपन और उनके वात्सल्य को सुरक्षित करने के लिए मोबाइल और आईपैड की जगह उनके साथ आपसी संवाद और विलुप्त होती अपने सामाजिक संबंधों की विरासत को साझा करें। आज बड़े परिवारों के खत्म होने के बाद एकल परिवारों का ढांचा भी तेजी से टूट कर एकल-व्यक्ति परिवार की ओर बढ़ रहा है। आज के दौर में जब परिवार के हर सदस्य की अस्मिता एक अलग इकाई के रूप में विकसित हो रही हो, ऐसे में बच्चों के प्रति माता-पिता की जिम्मेदारी और बढ़ गई है। हम जानते हैं आज के नेटीजन समाज में गैजेटों के प्रयोग को रोकना थोड़ा कठिन जरूर है, लेकिन असंभव नहीं है। इसी के साथ-साथ पुरानी और नई पीढ़ी के बीच की रिक्तता को कम करते हुए बच्चों, माता-पिता और दादा-दादी और नाना नानी से जुड़े संबधों की टूटती कड़ी की माला को एक बार फिर बनाएं।

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