jansatta raajneeti column 63 people of the country have more assets than the annual budget of the country – राजनीतिः असमानता की बढ़ती खाई

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संजय ठाकुर

भारत में असमानता की खाई लगातार बढ़ रही है। अमीर और गरीब के बीच बढ़ती यह खाई देश के विकास में एक बड़ा अवरोध है। इसे पाटे बिना देश के विकास की परिकल्पना बहुत मुश्किल है। देश की स्वतंत्रता के बाद विभिन्न सरकारों द्वारा सर्वहारा समाज के उत्थान की जो बात की जाती रही है, वह व्यावहारिक रूप में कभी परिलक्षित नहीं हुई, जिससे देश अमीर और गरीब में बंटता चला गया। देश में एक वर्ग साधन संपन्न है तो दूसरा साधनविहीन।
देश में असमानता की खाई के बढ़ने का एक बड़ा कारण देश में संसाधनों का असमान वितरण है। 1980 के दशक के बाद जो आर्थिक वृद्धि हुई, उसका बारह प्रतिशत भाग ऊपरी श्रेणी के सिर्फ 0.1 प्रतिशत लोगों को मिला है, जबकि ग्यारह प्रतिशत भाग निचली श्रेणी के पचास प्रतिशत लोगों के हिस्से में आया है। यानी देश में संसाधन तो हैं, लेकिन आम लोगों की पहुंच से बहुत दूर हैं।

देश की जनसंख्या का एक बहुत बड़ा हिस्सा अब भी देश की औपचारिक अर्थव्यवस्था का अंग नहीं बन पाया है। इस वक्त देश के सतत्तर प्रतिशत मजदूर देश की अनौपचारिक अर्थव्यवस्था का ही भाग बने हुए हैं। इन मजदूरों की आय बहुत कम है। इनकी आजीविका में सुधार लाए बगैर अर्थव्यवस्था का सुदृढ़ ढांचा तैयार करना बहुत मुश्किल है। इसी तरह देश की महिलाओं की एक बड़ी संख्या अर्थव्यवस्था का एक बड़ा घटक होने के बावजूद घोर उपेक्षा और भेदभाव की शिकार है। जहां विश्व भर की अर्थव्यवस्थाएं आम जनता, विशेषकर गरीब महिलाओं और लड़कियों की कीमत पर अमीरों की जेब भर रही हैं, वहीं इसका बहुत बड़ा और अत्यंत स्पष्ट प्रभाव भारत के संदर्भ में देखा जा सकता है।

भारत में राजनीतिक सशक्तिकरण, आर्थिक भागीदारी तथा अवसरों और स्वास्थ्य जैसे स्तरों पर महिलाओं के साथ बड़ा भेदभाव किया जाता है। विभिन्न अध्ययनों में यह बात पहले ही स्पष्ट हो गई है कि लैंगिक असमानता के मामले में भारत विश्व के एक सौ तिरपन देशों की सूची में एक सौ बारहवें स्थान पर है। ये महिलाएं देश की अर्थव्यवस्था को चलाने में सबसे जरूरी भूमिका निभाती और इंजन का काम करती हैं, लेकिन इनके योगदान की गणना नहीं होती। यहां तक कि इनके काम को काम ही नहीं समझा जाता। इस तरह देखभाल जैसा जरूरी काम परिवार और अर्थव्यवस्था, दोनों स्तरों पर सिर्फ प्रेम का कार्य माना जाता है, जिसे संभालना एक सामान्य प्रक्रिया ही समझा जाता है। देश की ये महिलाएं और लड़कियां खाना बनाने, घर की सफाई करने और बुजुर्गों तथा बच्चों की देखरेख में अपना जीवन लगा देती हैं, लेकिन इनको वर्तमान अर्थव्यवस्था का लाभ बहुत कम मिल पाता है, जबकि अर्थव्यवस्था; व्यापार और समाज को चलाने में इनका बड़ा योगदान होता है। ये काम करने वाली ऐसी महिलाएं हैं जिन्हें काम का वेतन नहीं मिलता। काम के बोझ के चलते इन औरतों को पढ़ने या रोजगार हासिल करने का भी पर्याप्त समय नहीं मिल पाता है, जिससे ये अर्थव्यवस्था के निचले भाग में सिमट कर रह जाती हैं।

इसी तरह आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, घरेलू काम करने वाले, बुजुर्गों और बच्चों की देखरेख जैसे कामों में लगे अन्य लोग बेहद कम वेतन पर काम करते हैं। ऐसे कामों में न तो काम के घंटे तय होते हैं और न ही दूसरे कामों की तरह अतिरिक्त सुविधाएं मिलती हैं। अर्थव्यवस्था की दृष्टि से इन महिलाओं का योगदान उन्नीस लाख करोड़ रुपए वार्षिक के बराबर है, जो भारत के तिरानबे हजार करोड़ रुपए के वार्षिक शिक्षा-बजट का चार गुना है।

संसाधनों के असमान वितरण से उपजी यह समस्या कितनी बड़ी है, इसकी एक-बानगी देखिए। देश के एक प्रतिशत अमीर लोगों के पास देश की सत्तर प्रतिशत यानी पंचानबे करोड़ से ज्यादा जनसंख्या की कुल संपत्ति की चार गुना संपत्ति है। देश के सबसे अमीर नौ लोगों के पास देश के सबसे गरीब पचास प्रतिशत लोगों की कुल संपत्ति के बराबर संपत्ति है। इस तरह अमीरी और गरीबी परिवार में आगे से आगे स्थानांतरित हो रही है। अंतर सिर्फ इतना है कि अमीरों की संख्या गरीबों की संख्या की तुलना में बहुत कम है।

संसाधनों के असमान वितरण की एक तस्वीर यह भी है कि एक वर्ष के दौरान देश की सबसे अमीर एक प्रतिशत जनसंख्या की संपत्ति में छियालीस प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जबकि सबसे गरीब पचास प्रतिशत जनसंख्या की संपत्ति में सिर्फ तीन प्रतिशत की वृद्धि हुई है। ऊपर की दस प्रतिशत जनसंख्या के पास देश की 74.3 प्रतिशत संपत्ति है, जबकि नीचे की नब्बे प्रतिशत जनसंख्या के पास सिर्फ 25.7 प्रतिशत। हाल ही में जारी ऑक्सफैम की रिपोर्ट भी भारत में संसाधनों के असमान वितरण की पुष्टि करती है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि देश के तिरसठ लोगों के पास देश के वार्षिक बजट से ज्यादा संपत्ति है। इसके अनुसार देश के एक प्रतिशत अमीर प्रतिदिन दो हजार दो सौ करोड़ रुपए कमाते हैं। रिपोर्ट के अनुसार भारत में चौरासी करोड़पति हैं जिनके पास देश की 248 अरब डॉलर की संपत्ति है। यानी इस समय भारत की अठावन प्रतिशत संपत्ति पर एक प्रतिशत अमीरों का कब्जा है।

अमीर और गरीब के बीच के अंतर की रूपरेखा देश में सरकारी और निजी, हर स्तर पर तैयार की जाती है। भारत में सरकारी स्तर पर जहां एक शीर्ष अधिकारी को ढाई लाख रुपए तक का वेतन दिया जाता है, वहीं एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी इसका लगभग दसवां हिस्सा वेतन पाता है। फिर बेरोजगारों की वह भीड़ भी है, जिसमें किसी को एक भी रुपया उपलब्ध कराने के लिए सरकार के पास कोई नीति या योजना नहीं है। दूसरी तरफ, भारत के निजी क्षेत्र का भी यही हाल है। मसलन, एक शीर्ष निजी कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी और उसके सामान्य कर्मचारी के वेतन में चार सौ गुना से ज्यादा का अंतर है।
चिंता का विषय है कि संसाधनों के असमान वितरण का दंश झेल रहे देश के बाईस राज्य गरीबी दूर करने के अपने लक्ष्य से बुरी तरह पिछड़े हुए हैं।

असमानता कम करने के लिए गरीबों के लिए विशेष नीतियां बना कर उन्हें व्यावहारिक रूप दिए जाने की जरूरत है। सरकार को शिक्षा, स्वास्थ, स्वच्छता, जल और देखरेख के लिए ज्यादा धन की व्यवस्था करनी चाहिए। इससे लोगों को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने के साथ-साथ रोजगार भी उपलब्ध कराया जा सकता है। अगर सकल घरेलू उत्पाद का थोड़ा-सा भी हिस्सा सिर्फ देखरेख की व्यवस्था पर खर्च कर दिया जाए, तो इससे एक से दो करोड़ नए रोजगार पैदा किए जा सकते हैं।

देश में गरीबी का एक बड़ा कारण संसाधनों के असमान वितरण से पैदा हुई आर्थिक असमानता है, लेकिन इसका एक और बड़ा कारण उपभोग-विषमता भी है। 1990 के दशक से आरंभ हुए आर्थिक उदारीकरण या वैश्वीकरण के बाद से उपभोग-विषमता बढ़ी है। इस वक्त क्रय क्षमता के अभाव में बाजार लोगों से दूर होता जा रहा है। रोजगार के अभाव में यह समस्या और गंभीर होती जा रही है।

देश की अर्थव्यवस्था का ढांचा मजबूत करने और विश्व की शीर्ष तीन अर्थव्यवस्थाओं में स्थान बनाने के लिए देश में असमानता को कम करने की दिशा में प्राथमिकता के आधार पर काम किया जाना चाहिए। एक ऐसा वातावरण बनाने की जरूरत है, जिसमें बेहतर स्वास्थ्य और शिक्षा, यथोचित रोजगार, न्याय, उन्नत तकनीक और उत्कृष्ट प्रौद्योगिकी तक देश के लोगों की पहुंच बनाई जा सके। देश में पारंपरिक रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने के साथ-साथ अपारंपरिक रोजगार का भी सृजन किया जाना चाहिए। देश की अर्थव्यवस्था में लोगों के बीच के बहुत बड़े अंतर को कम करना इस वक्त की एक बहुत बड़ी जरूरत है।

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