jansatta rajneeti Farming will fight recession in coronavirus – राजनीतिः मंदी का मुकाबला करेगी खेती

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निरंकार सिंह

वैश्विक अर्थव्यवस्था की सुस्ती का मुकाबला करने के लिए सरकार को कृषि क्षेत्र में निवेश बढ़ाने के साथ-साथ इसको आधुनिक बनाने पर जोर देना होगा। खेती-किसानी पर भी कोरोना का असर पड़ा है। सभी इलाकों में गेहूं की फसल पक कर तैयार है। इस समय आलू की खोदाई का कार्य लगभग पूरा हो चला है। मसूर, मटर व सरसों आदि की कटाई पूरी हो गई है। हालांकि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने पूर्णबंदी के दूसरे चरण के दौरान कम जोखिम वाले क्षेत्रों में छूट संबंधी दिशानिर्देश जारी किए हैं। कटाई और आने वाले दिनों में नए बुआई सीजन के शुरू होने के मद्देनजर खेती-किसानी से जुड़े कामों को खास छूट दी गई है। हालांकि, इस दौरान सुरक्षित दूरी के मानकों का कड़ाई से पालन किया जाएगा। तीन मई तक चलने वाले बंदी के दूसरे चरण में खेती से जुड़ी सभी गतिविधियां चालू रखने और किसानों और कृषि मजदूरों को फसल से जुड़े काम करने की छूट रहेगी। लेकिन समस्याएं आसानी से खत्म नहीं होने वालीं। बड़े कास्तकार तो मशीनों से गेहूं कटवा लेते हैं, लेकिन मध्यम व छोटे किसान मजदूरों के भरोसे रहते हैं। इस वक्त मजदूर भी मिलने मुश्किल हैं, ऐसे में गेहूं की कटाई कैसे होगी, यह सवाल किसानों को परेशान कर रहा है। बहुत से ऐसे परिवार हैं जो खुद अपने गेहूं की कटाई व मड़ाई में सक्षम हैं लेकिन इनकी संख्या कम है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि आज भी हमारी अर्थव्यवस्था का मूल आधार कृषि ही है। देश की किसान आबादी इसी पर टिकी है। इसलिए देश के राजनीतिक और आर्थिक विकास के लिए कृषि की स्थिति हमेशा महत्त्वपूर्ण रही है। यह आधुनिकीकरण के दौरान भी महत्त्वपूर्ण रहेगी। कृषि एक सौ तीस करोड़ आबादी का पेट भरती है। हल्के उद्योग के लिए कच्चे माल की जरूरतों की सत्तर फीसद आपूर्ति, औद्योगिक उत्पादों के लिए बाजार प्रदान करने और निर्माण के लिए धन जमा करती है। पिछले तीन दशकों के दौरान यह बार-बार देखा गया है कि कृषि उत्पादन राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के विकास पर काफी हद तक असर डालता है और निर्माण के पैमाने और गति को प्रत्यक्ष रूप से निर्धारित करता है। जब भी फसल खराब हुई है तो उसके तत्काल बाद हल्के और भारी औद्योगिक उत्पादन में भारी कमी आई है। उसके बाद जब कृषि की हालत सुधरी तो औद्योगिक उत्पादन दोबारा बढ़ना शुरू हो गया।

यदि हम कृषि के विकास और आधुनिकीकरण के लिए बड़े पैमाने पर कोशिश नहीं करते हैं, तो समूची अर्थव्यवस्था के आधुनिकीकरण को भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है और कई मोर्चों पर नाकामी देखनी पड़ सकती है। कृषि के विकास को प्राथमिकता देने का मतलब यह है कि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में सबसे पहले खेती-बाड़ी को प्रमुखता देनी चाहिए, फिर हल्के उद्योगों और उसके बाद भारी उद्योग पर जोर देना चाहिए। पर आज हमारी खेती पूरी तरह मानसून पर निर्भर है। इसलिए कभी सूखे का, तो कभी बाढ़ का संकट पैदा हो जाता है। उधर, किसान कभी खाद, तो कभी डीजल के संकट से जूझता रहता है। इसलिए खेती में निवेश बढ़ाने की जरूरत है। इसके साथ-साथ सिंचाई सुविधा भी बढ़ाई जानी चाहिए। हमारा देश आज और आगे भी गेहूं और चावल का प्रमुख उत्पादक और उपभोक्ता बना रहेगा। इसलिए उनके उत्पादन को बढ़ाने के लिए कदम उठाने पड़ेंगे। गेहूं की पैदावार के क्षेत्र को और अधिक व्यापक बनाने के उद्देश्य से पूर्वी उत्तर प्रदेश, ओड़िशा, पश्चिम बंगाल और पूर्व के राज्यों में अधिक मात्रा में गेहूं की पैदावार करनी होगी। संकर चावल की विधि को अपना कर, पारंपरिक क्षेत्रों में चावल की विधि को अपना कर, पारंपरिक क्षेत्रों में चावल का उत्पादन और ज्यादा बढ़ाना होगा।

मध्य भारत में मोटे अनाज के उत्पादन में वृद्धि करके अन्य उत्पादों की पैदावार बढ़ाने की जरूरत है, ताकि वे आंशिक रूप से गेहूं और चावल की जरूरत को कम कर सकें। अनाज की प्रौद्योगिकी को अधिक विकसित करके इस क्षेत्र को इतना अधिक महत्त्वपूर्ण बनाना होगा, ताकि वह लगातार तेजी से बढ़ती हुई मांग के अलावा, निर्यात योग्य मोटा अनाज भी उत्पादित कर सके। मध्य भारत को सब्जियों और फलों का उत्पादन केंद्र बनाया जाए और साथ ही यह कोशिश भी की जाए कि ये कम कीमत पर लोगों को उपलब्ध हो सकें। इससे गेहूं और चावल की खपत पर भी असर पड़ेगा और ऐसा ही प्रयास, जाड़े के दिनों में बड़े पैमाने पर हिंद-गंगा क्षेत्र में किया जाना चाहिए। आलू टैपियोका (कसावा) और शकरकंदी जैसी गांठदार फसलों को और ज्यादा उगाया जाए और उन्हें कम कीमत मुहैया कराया जाए। इस बात पर ज्यादा जोर देने की जरूरत है।

देश में दालों की कमी है, मगर प्रोटीन की नहीं। लेकिन लोगों की खाने की आदतों को ध्यान में रखते हुए, दालों की मांग को उच्च वरीयता देकर पूरा करना पड़ेगा। चूंकि सब्जियों और फलों की खपत भविष्य में बढ़ेगी, इसलिए हर क्षेत्र में कृषि के उपयुक्त जलवायु की आवश्यकताओं और आर्थिक दृष्टि से उचित लाभ को ध्यान में रखते हुए सही विकल्प का चुनाव करना पड़ेगा। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए शीतगृह और दूर-दूर तक फासला तय करने वाले परिवहन की व्वयवस्थाएं भी महत्त्वपूर्ण होंगी।

देश के ग्रामीण परिवार, खासकर भूमिहीन और छोटे और सीमांत किसान पशुपालन को आय के पूरक स्रोत के रूप में अपनाते हैं। इस व्यवसाय में अर्धशहरी, पर्वतीय, जनजातीय और सूखे की आशंका वाले क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को सहायक रोजगार मिलता है, जहां केवल फसल की उपज से ही परिवार का गुजर-बसर नहीं हो सकता। विश्व में सबसे अधिक मवेशी भारत में हैं। दुनिया की कुल भैंसों का सत्तावन फीसद और गाय-बैलों का चौदह फीसद भारत में है।

पशुपालन और डेयरी विभाग के द्वारा 16 अक्तूबर 2019 को पशुधन आबादी की जनगणना की जारी गई रिपोर्ट के अनुसार भारत की पशुधन आबादी 2012 की तुलना में 4.6 फीसद से बढ़ कर तिरपन करोड़ सत्तावन लाख हो गई है। भारत में बीते पांच सालों में गायों की संख्या अठारह फीसद बढ़ कर चौदह करोड़ इक्यावन लाख हो गई है। रिपोर्ट के अनुसार देश में भैंसों की संख्या इस दौरान मात्र एक फीसद बढ़ी है। वहीं देश में मुर्गियों की कुल संख्या 85.18 करोड़ है। नवीनतम गणना के मुताबिक बकरियों की संख्या दस फीसद बढ़कर 14.9 करोड़ हो गई है। साल 2019 में कुक्कुट की संख्या करीब 17 फीसद बढ़कर 85 करोड़ 18.1 लाख हो गई है। पिछली गणना की तुलना में साल 2019 में स्वदेशी मादा मवेशियों की संख्या में दस फीसद की वृद्धि हुई है।

देश की लगातार बढ़ती आबादी की (पशुओं से प्राप्त होने वाली) प्रोटीन की आवश्यकताएं पूरा करने में दूध, अंडा और मांस के रूप में खाद्य भंडार में पशुपालन क्षेत्र भारी योगदान कर रहा है। देश में फिलहाल प्रोटीन की प्रति व्यक्ति दैनिक उपलब्धता लगभग 11.3 ग्राम है, जबकि इसका विश्व औसत उनतीस ग्राम है। किंतु बढ़ती जनसंख्या को देखते हुए बढ़ते बच्चों और शिशुओं को दूध पिलाने वाली माताओं के पोषण-स्तर को बनाए रखने के लिए देश में प्रोटीन की उपलब्धता में कम से कम दुगनी बढ़ोत्तरी होनी चाहिए। राष्ट्र के पुनरुद्धार के लिए सिर्फ राजनीतिक स्वतंत्रता पर निर्भर रहना काफी नहीं है। हमें अपनी पूरी सहमति के साथ अर्थव्यवस्था का विकास करना चाहिए। अपने कृषि, पशुपालन उद्योग और राष्ट्रीय प्रतिरक्षा को आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी से संपन्न करना चाहिए। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुधार करके ही मंदी पर लगाम लगाई जा सकती है।

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