कैसे होते हैं आयुर्वेदिक दवा के क्लीनिकल ट्रायल और लॉंचिंग? | health – News in Hindi

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Coronavirus संक्रमण जबसे वैश्विक महामारी का रूप धारण कर चुका है, तबसे दुनिया भर में कई किस्म की दवाओं और Vaccines के लिए प्रयोग चल रहे हैं, तो कहीं क्लीनिकल ट्रायल. इस बीच, जून में पतंजलि समेत कुछ संस्थाओं ने दावा किया कि Covid19 के लिए आयुर्वेदिक दवा खोजी गई और क्लीनिकल ट्रायल्स हो रहे हैं. जानना दिलचस्प है कि सदियों पुरानी चिकित्सा पद्धति यानी आयुर्वेदिक दवाओं के मामले में क्लीनिकल ट्रायल्स और दवाएं बनाने व लॉंच करने के सबंध में क्या नियम कायदे हैं.

भारत में आयुष मंत्रालय के तहत दवाओं के विकास, क्वालिटी चेक, प्री क्लीनिकल प्रयोग और क्लीनिकल रिसर्च का काम कई स्तरों पर किया जाता है. परंपरागत दवाओं के मामले में आयुष के अधीन रिसर्च काउंसिल के अलावा अकादमिक स्तर पर, आईसीएमआर, सीएसआईआर जैसे रिसर्च संस्थाओं के साथ ही ईएमआर ग्रांट के तहत भी रिसर्च सहायता दी जाती है.

पार्टिसिपेंट्स छांटने के होते हैं आधार
किसी दवा के ट्रायल के लिए अव्वल तो उन लोगों को छांटना होता है, जिन पर दवा का प्रयोग किया जाना हो. बात आयुर्वेदिक दवा की हो तो सिर्फ लक्षणों के आधार पर मरीज़ नहीं छांटे जा सकते. मौसम, वातावरण, मरीज़ों की पूर्व स्वास्थ्य स्थितियां, परहेज़ आदि कई चीज़ों को ध्यान में रखकर प्रयोग में भाग लेने वालों को छांटा जाता है.

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कोविड 19 के लिए अश्वगंधा सहित कई तरह के काढ़ों को भी स्वास्थ्यवर्धक बताकर इनके भी ट्रायल किए गए.

मप्र की राजधानी भोपाल में योग, रसाहार और आयुर्वेद केंद्रित चिकित्सा केंद्र की संचालक डॉ. पूर्णिमा दाते बताती हैं कि दवा के प्रयोग और पार्टिसिपेंट्स के डिटेल्स को सीडीआरआई के साथ साझा कर कोई संस्था अपनी दवा का परीक्षण शुरू कर सकती है. परीक्षण के लिए मंज़ूरी मिलने के लिए दवा के रिफरेंस यानी दवा के फॉर्मूले के स्रोत भी बताना होते हैं. फिर अप्रूवल के बाद तय समय में परीक्षण किए जाते हैं. प्री डायबिटीज़ के लिए एक दवा के मामले में परीक्षणों को अंजाम दे चुकीं डॉ. दाते के अनुसार:

क्लीनिकल टेस्टिंग में दवा का असर देखा जाता है और सकारात्मक परिणामों के बाद दवा निर्माता ज़रूरी परमिशनों के बाद दवा बाज़ार में ला सकते हैं. साथ ही, प्रक्रिया का हिस्सा है कि क्लीनिकल टेस्टिंग का डॉक्युमेंट बनाया जाए, उसे स्कॉलर्स के पास भेजकर पुष्ट कराया जाए और फिर उसे प्रकाशित करने के बाद दवा को आधिकारिक मंज़ूरी मिले.

चार फेज़ में होता है क्लीनिकल ट्रायल

आयुष मंत्रालय ने आयुर्वेदिक पद्धति में ​क्लीनिकल प्रयोगों के लिए जो विस्तृत गाइडलाइन्स जारी की हैं, उनके मुताबिक चार फेज़ में क्लीनिकल ट्रायल पूरा होता है. इसके ​बाद क्लीनिकल स्टडी का काम शुरू होता है यानी ट्रायल के परिणामों को लेकर विस्तार से अध्ययन किया जाता है. ये चार फेज़ क्या होते हैं?

1. पहले फेज़ में आयुर्वे​दिक दवा का शुरूआती प्रयोग होता है जो सामान्य रूप से गैर थैरेपी प्रक्रिया है. यह अक्सर स्वस्थ लोगों या कुछ खास तरह के प्रतिभागियों पर ही होता है.
2. दूसरे फेज़ के क्लीनिकल ट्रायल में दवा के असर को देखा जाता है और लक्षण या लक्षणों की रोकथाम के साथ ही इस दवा के साइड इफेक्ट्स को भी समझा जाता है.
3. तीसरे फेज़ के ट्रायल में दवा के थैरेपीसंगत लाभ को समझा जाता है. इसी फेज़ में यह भी तय किया जाता है कि दवा के ट्रायल को भारतीय मरीज़ों के अलावा भी ट्रायल किया जाना है या नहीं. हां तो लाइसेंसिंग अथॉरिटी से मंज़ूरी लेना होती है.
4. आखिरी फेज़ यानी पोस्ट मार्केटिंग ट्रायल में प्रयोग की गई दवा को दूसरी दवाओं के इस्तेमाल के साथ प्रयोग किया जा सकता है. साथ ही, लाइसेंसिंग अथॉरिटी दवा के ज़्यादा से ज़्यादा फायदे जानने के लिए अन्य प्रयोग भी करवा सकती है.

क्या हैं आयुर्वेदिक दवा बनाने के नियम?
क्लीनिकल ट्रायल से पहले किसी बीमारी के लिए दवा के उत्पादन की भी एक प्रक्रिया है. आयुर्वेदिक पद्धति की दवा के विकास संबंधी जनरल गाइडलाइन्स के तहत दवा निर्माता को भारतीय आयुर्वेद सूत्र संहिता जैसे किसी ग्रंथ से लीड लेना होती है. ऐसे ग्रंथों में दवा बनाने के हज़ारों फॉर्मूले दिए गए हैं. यहां से दवा बनाने का काम शुरू होता है. हर्बल दवा के बनाने की प्रक्रिया के कुछ खास पहलू होते हैं.

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आयुर्वेद में औषधियां बनाने के लिए हज़ारों सूत्र पहले से ही हैं.

1. दवा बनाने में बायोएक्टिव और सिंथेटिक चीज़ों को अलग करना होता है.
2. दवा को सुरक्षित और कारगर बनाने के तरीके अपनाना होते हैं.
3. नई दवा के सिलसिले में थैरेपी असर के लिए जो चीज़ें मिलाई जाएं, उनके लिए मंज़ूरी चाहिए होती है.
4. इसके बाद दवा के क्लीनिकल ट्रायल होते हैं.

आयुर्वेद में हर रोग के लिए दवाएं या फिर दवाओं के सूत्र पहले ही से मौजूद हैं. इन्हीं फॉर्मूलों के आधार पर वनस्पतियों या मिश्रणों में फेरबदल कर नई दवाएं बनाई जाती हैं. इसके लिए स्थानीय स्तर पर नियामक या नियंत्रक की मंज़ूरी लेकर कोई फार्मेसी अपनी दवा का उत्पादन करती है.

डॉ. धरमप्रकाश आर्य, सीनियर कंसल्टेंट, GCGHS, लोदी रोड, दिल्ली

आयुर्वेदिक दवाओं के लिए कानूनी प्रावधान
ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स रूल्स 1945 के तहत नियम 160 A-J में उल्लेख है कि आयुर्वेदक, सिद्ध और यूनानी दवाओं के सिलसिले में टेस्टिंग लैब, टेस्टिंग नियमन और क्वालिटी कंट्रोल कैसे किए जाएं. इस रूलबुक में दवाओं के प्रयोगों के दौरान सरकारी स्तर पर लगातार मॉनिटरिंग के लिए एक इंस्पेक्टर नियुक्त किए जाने का विस्तृत ब्योरा है.

क्या क्लीनिकल ट्रायल ज़रूरी है?
इस पूरे ब्योरे से साफ है कि आधुनिक चिकित्सा पद्धति यानी अक्सर जो नियम कायदे एलोपैथी दवाओं के संदर्भ में अपनाए जाते हैं, उन्हें ही थोड़े बहुत फेरबदल के साथ आयुर्वेदिक दवाओं के लिए भी लागू किया गया है. हालांकि आयुर्वेद दवाओं को लेकर क्लीनिकल ट्रायल की ज़रूरत पर ही प्रश्नचिह्न है.

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‘आयुर्वेद एवं एलोपैथी : एक तुलनात्मक विवेचन’ पुस्तक में संजय जैन ने लिखा है कि क्लीनिकल ट्रायल की प्रामाणिकता शक के दायरे में है, फिर भी यह युग क्लीनिकल ट्रायल का ही है. आयुर्वेद में इससे कुछ नया हासिल नहीं होता, लेकिन जो पहले से ज्ञान आयुर्वेद के पास है, उसे क्लीनिकल ट्रायल बस सत्यापित ही कर सकते हैं. जैन के मुताबिक क्लीनिकल ट्रायल का मकसद कल्याण की भावना नहीं बल्कि पेटेंट वाली दवा से मुनाफा कमाना रह गया है.

बहरहाल, गौरतलब यह है कि कोविड 19 के दौर में पतंजलि ने क्लीनिकल ट्रायल के बाद दवा के 100 फीसदी कारगर होने का दावा कर दिया है तो वहीं, एक अन्य आयुर्वेदिक दवा के ट्रायल राजस्थान में चल रहे हैं. साथ ही, खबरें हैं कि डालमिया ग्रुप की एक कंपनी ने भी आस्था 15 नामक आयुर्वेदिक दवा के ट्रायल किए हैं.



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