participation of women in the economy of any country matters a lot – राजनीतिः श्रमबल में घटती महिला भागीदारी

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लालजी जायसवाल

किसी भी देश की अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी बहुत मायने रखती है। इसके बावजूद भारत में महिला कार्यबल की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। वर्ष 2018 के सामाजिक कार्यबल सर्वेक्षण में 71.2 फीसद कामकाजी पुरुषों की तुलना में पंद्रह वर्ष से अधिक उम्र की केवल बाईस फीसद महिलाएं कामकाजी थीं। वहीं नार्वे और स्वीडन जैसे देशों में चार में से तीन महिलाएं औपचारिक कार्यबल का हिस्सा हैं। भारतीय महिला श्रमिकों के औपचारिक कार्यबल में भागीदारी में कमी के पीछे पितृसत्तात्मक पारिवारिक संरचना की जकड़ है, जिसके कारण उनके शिक्षा में कमी, अपेक्षित कौशल में कमी, स्वास्थ्य देखभाल में कमी के साथ घरेलू कामकाज तक सीमित रहना होता है।

महिलाओं के लिए सुरक्षित कार्यबल का अभाव, मातृत्व सुविधाओं का सही न होना और लैंगिक भेदभाव होना आम समस्या है। जैसे कि भारत में एक चौथाई से अधिक महिलाएं कड़ी मेहनत करने के बाद भी अपने काम का सही मेहनताना नहीं पाती हैं। उन्हें पुरुषों की अपेक्षा पैंतीस फीसद कम वेतन मिलता है। ये कुछ अन्य महत्त्वपूर्ण कारक हैं, जिसके चलते महिलाओं की औपचारिक श्रमबल में भागीदारी का मनोबल तोड़ने का काम करता है। यही बजह रही है कि भारत आज भी लैंगिक समानता सूचकांक के स्तर पर जमीन में पड़ा धूल फांक रहा है। लैंगिक समानता रिपोर्ट के मुताबिक भारत विश्व के एक सौ तिरपन देशों की सूची में एक सौ बाईसवें स्थान पर है। वहीं अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की महिला सूची में एक सौ इकतीस देशों में भारत का स्थान एक सौ इक्कीसवां है।

भारत में महिलाओं के कम कामकाजी होने के पीछे अनेक कारण गिनाए जा सकते हैं। राष्ट्रीय परिवार एवं स्वास्थ्य सर्वेक्षण से इस बात का खुलासा हुआ है कि कुल महिला आबादी में से आधी से अधिक महिलाओं को अकेले कहीं आने-जाने की छूट नहीं होती है। ऐसे में महिलाओं के कामकाजी होने की बात कैसे कही जा सकती है?

पिछले चार वर्षों में रोजगार के अवसरों में बेहद कमी देखी गई है। हाल ही में अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने चेतावनी दी थी कि कोरोना महामारी से दुनिया भर में सभी अर्थव्यवस्थाओं को धक्का लगा है और बेरोजगारी बढ़ी है, जिसमें महिला कर्मचारियों पर ज्यादा असर पड़ा है। संयुक्त राष्ट्र की संस्था ने एक रिपोर्ट में कहा है कि उनतीस साल से कम उम्र के हर छह में से एक या एक से ज्यादा व्यक्तियों ने काम बंद कर दिया है। जैसा कि माना जा रहा था कोविड-19 के कारण लागू देशव्यापी लॉकडाउन ने बेरोजगारों की तादाद में भारी इजाफा किया है, सीएमआइई आंकड़ों के मुताबिक बेरोजगारी दर बढ़ कर 21.1 फीसद पर पहुंच गई है। कोविड-19 के बाद आने वाली मंदी में महिलाएं और बड़ी शिकार बन कर उभरेंगी।

फिलहाल किसी तरह के रुझान का पता लगाना मुश्किल है, क्योंकि नौकरी जाने पर महिलाएं आसानी से पारिवारिक जीवन में खप जाती हैं। शायद यह भी एक वजह है कि इन महिलाओं की बेरोजगारी के खिलाफ कोई सार्वजनिक विरोध प्रदर्शन नहीं होता। अगर देश के गरीबों और निम्न मध्यवर्ग की सामाजिक रूढ़िवादिता को ध्यान में रखें तो कह सकते हैं कि देश में लैंगिक अंतर कम होना दूर की कौड़ी है। हम सभी जानते हैं कि महिलाएं सारे काम करने में सक्षम हैं, लेकिन नियोक्ता उनके साथ भेदभाव करते हैं। ओड़ीशा और केरल जैसे राज्यों में महिलाओं की बड़ी संख्या ने कार्यकुशलता का प्रतिमान स्थापित किया, जिसमें मास्क से लेकर सेनेटाइजर बनाने और कमजोर घरों को राशन के साथ अन्य जरूरी सामान पहुंचाने का कार्य शामिल है। स्पष्ट है कि अगर महिलाओं को उचित अवसर मिले, तो वे अपने हुनर से रोजगार लेने के बजाय देने वाली बन सकती हैं।

मगर चिंता की बात तो यह है कि नीति निर्माताओं का ध्यान इस ओर नहीं जाता है, जिसका परिणाम यह हुआ कि आज भी देश की कुल महिला आबादी में से केवल एक तिहाई महिलाएं श्रमबल का हिस्सा बन पाई हैं। रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2015 में श्रमिक पुरुषों की भागीदारी जहां 75.5 फीसद थी, वहीं वर्ष 2016 में बढ़ कर 76.8 फीसद हो गई थी, लेकिन महिलाओं की स्थिति चिंताजनक ही रही है। 2015 में महिलाओं की भागीदारी जहां 27.4 फीसद थी, वहीं 2016 में घट कर 26.9 फीसद रह गई।

कोरोना के चलते भारत में भी बेरोजगारी दर कई पायदान ऊपर चढ़ गई है। बीते मार्च में यह अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है। बेरोजगारी दर पहली दफा दोहरे अंक में प्रवेश कर गई है। रिपोर्ट के अनुसार विश्व (चीन को छोड़ कर) में कोरोना वायरस महामारी के कारण सबसे अधिक प्रभावित हुए क्षेत्रों के चौवालीस करोड़ कर्मचारियों में बेरोजगारी का सामने करने वाली महिलाओं की संख्या इकतीस करोड़ है। संयुक्त राष्ट्र की एक एजेंसी के अनुसार कोरोना महामारी के कारण दुनिया भर में नौकरी-पेशा लोगों पर बड़ा प्रभाव पड़ेगा और भारत से ही करीब ढाई करोड़ नौकरियां खत्म हो सकती हैं, जिसमे सबसे अधिक महिलाएं प्रभावित होंगी।

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार अवैतनिक घरेलू कामों के प्रति पूर्वाग्रह के कारण हमारे देश में लैंगिक असमानता को ठीक करना अत्यंत दुष्कर सिद्ध हो रहा है। प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या महिला रोजगार में लगातार कमी और महिलाओं की श्रमबल में गिरावट चिंता का कारण नहीं है? गौरतलब है कि कृषि प्रधान देश में आज भी महिलाओं की एक बड़ी संख्या कृषि कार्य में लगी हुई है, इसके बावजूद ग्रामीण महिलाओं की एक बड़ी संख्या बेरोजगार है। अब सवाल है कि ग्रामीण महिलाएं जब श्रमबल में नहीं हैं, तो ये काम क्या कर रही हैं?

छिपी बात नहीं है कि गांव की अधिकतर महिलाओं का समय बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल में जाता है। इसी सामाजिक संरचना की वजह से स्त्री और पुरुष के बीच असमानता की खाई लगातार चौड़ी होती जा रही है। नीति निर्माता भी उसी पारंपरिक जड़ता से ग्रसित हैं, जिससे समाज ग्रसित है। समाज की मानसिकता आज भी पुरुषों को सबसे ऊपर रखने की बनी हुई है। ऐसे में उद्योग-धंधे और कार्यस्थलों के बंद होने का गंभीर परिणाम महिलाओं को झेलना पड़ रहा है।

मगर भारत जैसे देश में महिला श्रमबल भागीदारी को सही मायनों में अर्थव्यवस्था के विकास का इंजन कहा जाए, तो अतिशयोक्ति न होगी। महिला श्रमबल की उचित भागीदारी बढ़ा कर हम देश को तीव्र विकास की ओर ले जा सकते हैं। लेकिन सबसे पहले महिलाओं की स्थिति सुधारने के लिए औपचारिक और अनौपचारिक क्षेत्र में उनकी भागीदारी को बढ़ाना होगा, इसके लिए नियम-कानूनों में बदलाव की दरकार होगी। समाजशास्त्री मेरीलैंड ने अपने शोध में पाया है कि जिन गांवों में सड़क के निर्माण कार्य हुए हैं, वहां पर महिलाओं की तुलना में पुरुषों की संख्या ज्यादा रही है, यहां महिलाओं की अधिक भागीदारी बढ़ाई जा सकती है।

आने वाले दशक में पर्यटन, शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में सबसे अधिक रोजगार उत्पन्न होने वाले हैं, जिसका खाका कोरोना महामारी के दौरान ही खींचा जा चुका है। इसमें महिलाओं की अधिक से अधिक भागीदारी को प्राथमिकता देना होगा। साथ ही महिला उद्यमियों को सही तरीके से तैयार किए जाने की जरूरत है, उनमें उद्यमिता की ऐसी विशेषताएं और कौशल विकसित की जानी चाहिए, जिससे वे वैश्विक बाजारों के बदलते रुझानों की चुनौतियों से निपट सकें। तभी महिलाओं की श्रमबल में भागीदारी बढ़ेगी और महिलाओं का जीवन स्तर भी सुधरेगा। ऐसे सुधार असंभव नहीं हैं, बस इसके लिए मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति और सामाजिक सहयोग की आवश्यकता होगी, जो अभी बेहद कम है।

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