शोध में दावा- नाक में घुसकर चार दिन में कोरोना वायरस अपनी संख्या एक करोड़ तक बढ़ा लेता है | health – News in Hindi

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शोध में दावा- नाक में घुसकर चार दिन में कोरोना वायरस अपनी संख्या एक करोड़ तक बढ़ा लेता है

डिजाइन फोटो.

नॉर्थ कैरोलिना यूनिवर्सिटी (North Carolina University) के शोधकर्ताओं ने एक रिसर्च (Research) में पाया है कि कोरोना वायरस (Corona virus) गले या फेफड़ों की तुलना में नाक की कोशिकाओं को आसानी से शिकार बनाता है.

Coronavirus: देश में कोराना वायरस संक्रमण हर दिन तेजी से बढ़ रहा हैं. स्वास्थ मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार पिछले 24 घंटे में देश भर में 14,506 करोना संक्रमित सामने आए हैं. कोरोना को लेकर हर दिन नई-नई रिसर्च हो रही हैं, जिनमें नई बातों का पता चलता है. एक ताजा रिसर्च में दावा किया गया है कि कोरोना वायरस गले या फेफड़ों की तुलना में नाक की कोशिकाओं को आसानी से शिकार बना लेता है. नाक में घुसकर कोरोना वायरस बहुत तेजी से अपनी संख्या बढ़ाता है. नॉर्थ कैरोलिना यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने कहा कि इससे बचने के लिए सुरक्षा इंतजामों को अपनाना चाहिए. शोधकर्ताओं ने सलाह दी है कि कोरोना संक्रमण से बचाव के लिए फेस मास्क या कपड़े से मुंह और नाक दोनों को ढंकना बेहद जरूरी है.

फेफड़ों से ज्यादा संवेदनशील है नाक
नॉर्थ कैरोलिना यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं का कहना है कि कोरोना वायरस गले या फेफड़ों की तुलना में नाक में मौजूद कोशिकाओं को आसानी से निशाना बनाता है. नाक में पहुंचकर कोरोना वायरस महज चार दिन में अपनी एक करोड़ से ज्यादा प्रतियां बना लेता है. नाक में संख्या बढ़ाने के साथ ही कोरोना वायरस धीरे-धीरे यह श्वासनली के रास्ते गले और फेफड़ों में भी फैलने लगता है.

ऐसे किया शोध अमर उजाला में छपी एक खबर के अनुसार यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता डॉ. रिचर्ड बाउचर के नेतृत्व में शोधकर्ताओं ने कोरोना से संक्रमित मरीजों की नासिकाओं, श्वासनली और फेफड़ों से लिए गए नमूनों का विश्लेषण किया. साथ ही उन्होंने स्वस्थ लोगों के इन्हीं अंगों में मौजूद ऊतकों को लैब में कोरोना के संपर्क में रखकर उन पर पड़ने वाले असर का भी अध्ययन किया. यहां शोधकर्ताओं ने पाया कि नसिका में मौजूद ‘नेसल एपिथीलियम’ नाम की कोशिकाएं कोरोना वायरस का सबसे पहला शिकार बनती हैं. उनमें फेफड़ों की तुलना में एक हजार गुना ज्यादा वायरस ठिकाना बना सकते हैं.

डॉ. बाउचर ने नाक में मौजूद ‘एसीई-2 रिसेप्टर’की अधिकता को कोरोना संक्रमण के प्रति ज्यादा संवेदनशील होने के लिए जिम्मेदार बताया है. पहले के अध्ययनों में भी यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि एसीई-2 रिसेप्टर ही कोरोना वायरस को हमलावर बनाने वाले ‘स्पाइक प्रोटीन’को सक्रिय करता है. इस वजह से वायरस को नाक में अपनी संख्या तेजी से बढ़ाने में मदद मिलती है.

अध्ययन के दौरान शोधकर्ताओं ने नाक में महज चार दिन के अंदर वायरस की एक करोड़ प्रतियां पाई. वहीं फेफड़ों में यह संख्या 10 हजार के करीब थी, जो कि नाक की अपेक्षा कहीं गुना कम है. शोधकर्ताओं ने कहा है कि बढ़ते कोरोना संक्रमण के बीच फेस मास्क का ढंग से उपयोग जरूरी है और मास्क से मुंह के साथ नाक को भी अच्छे से कवर करना चाहिए.
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