Knowledge-meditation-philosophy of India will have to be taken to the height of theory and practicality in which everyone benefits – राजनीति: विविधता की संस्कृति और शिक्षा

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देश में ऐसा कौन होगा जो भारत की हर प्रकार की श्रेष्ठता को वैश्विक स्तर पर उजागर और स्थापित होते न देखना चाहे? हम सभी ने अनेक महत्त्वपूर्ण अवसरों पर यह वाक्य- ‘भारत को विश्व गुरु बनना है’, अनेक बार सुना है। जब-जब और जहां-जहां यह वाक्य कहा जाता है तो कुछ लोग असमंजस और आशंका से घिर जाते हैं, लेकिन जो भी व्यक्ति भारत और उसकी प्राचीन सभ्यता, संस्कृति से परिचित है, वह इस संभावना को नकारता नहीं है कि भारत विश्व गुरु बन सकता है।

ऐसे लोग यह भी मानते हैं कि इस सुनहरी अभिलाषा के पूर्ण होने की संभावनाएं घोषणाओं से नहीं, उन तथ्यों के विश्लेषण से निखरेंगी, जिनके कारण भारत आज उस स्थिति में नहीं है। वे यह भी मानते हैं कि इस प्रकार की घोषण की आवश्यकता नहीं है कि भारत विश्व गुरु बन गया है, या बस बनने ही वाला है! अनेक लोग इसे इस प्रकार घोषित करते हैं कि जैसे कोई युद्ध जीता जाने वाला है और उनकी विजय होने ही वाली है। इसके लिए तो ज्ञानार्जन परंपरा (आज की शिक्षा व्यवस्था) को उसी प्रकार के त्याग और तपस्या के द्वारा समृद्ध करना होगा, जिसके लिए प्राचीन भारत के ज्ञानीजन जाने और सराहे जाते थे।

भारत के ज्ञान-ध्यान-दर्शन को सिद्धांत और व्यावहारिकता की उस ऊंचाई तक ले जाना होगा जिसमें ‘सर्वभूत हिते रत:’ और ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ का भाव निहित हो, जिसमें सभी के प्रति अपनापन स्पष्ट हो और जीवन की सार्थकता और संतुष्टि की सार्वभौमिक समझ बिखरी हो! हजारों साल पहले यदि यह आकर्षण तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला में विश्व भर के देशों से लोगों को यहां के विश्व-प्रसिद्ध शिक्षा केंद्रों में स्वत: ही लाता था, तो ऐसा आगे भी संभव क्यों नहीं होगा?

ज्ञानार्जन की आज की विधा और व्यवस्था अर्थात शिक्षा तंत्र से ही अधिकतर जानी-पहचानी जाती है। शिक्षा की गतिशीलता या शिथिलता और उसके संस्कृति पर लगातार जीवंतता से पड़ते प्रभाव की गहन व्याख्या और विवेचना समय-समय पर करते रहने से ही सभ्यता, विकास, प्रगति और मानवीयता में भारत अपननी विशिष्टता को पुन: स्थापित कर सकता है। जैसे-जैसे और जब-जब पश्चिम के विद्वानों ने भारत को बिना किसी पूर्वाग्रह के समझने का प्रयास किया, उसके ज्ञान भंडार और संस्कृति की श्रेष्ठता को पहचाना, उनकी श्रद्धा और सम्मान उसके प्रति बढ़ता गया।

एक बड़ा ही प्रसिद्ध उद्धरण अनेक बार दोहराया जाता है कि भारतीय संस्कृति की गतिशीलता और समयानुकूल बने रहने की क्षमता के यशोगान में वैश्विक स्तर पर अनेकानेक मनीषियों के नाम लिए जा सकते हैं, मगर यहां मैं प्रसिद्ध विद्वान डा.अर्नाल्ड टायनबी को उद्धृत कर रह हूं- ‘यह भली-भांति स्पष्ट हो रहा है कि एक अध्याय जिसकी शुरूआत पाश्चात्य थी, यदि उसका अंत मानवजाति के आत्मसंहार में नहीं होना है तो समापन भारतीय होगा…। मानव इतिहास के इस सबसे अधिक खतरनाक क्षण में मानवजाति की मुक्ति का यदि कोई रास्ता है तो वह भारतीय है। चक्रवर्ती अशोक और महात्मा गांधी का अहिंसा का सिद्धांत और श्री रामकृष्ण परमहंस के धार्मिक सहिष्णुता के उपदेश ही मानवजाति को बचा सकते हैं। यहां हमारे पास एक ऐसी मनोवृत्ति व भावना है जो मानवजाति को एक परिवार के रूप में विकसित होने में सहायक हो सकती है। इस अणु युद्ध में विनाश का यही विकल्प है।’

अंतरराष्ट्रीय ख्याति-प्राप्त इतिहासकार विल दुरां ने लिखा था कि आज के हर विद्यार्थी के लिए सबसे बड़े शर्म की बात यही होनी चाहिए कि वह भारत से पूरी तरह परिचित नहीं है। वे अपनी जगत प्रसिद्ध रचना ‘स्टोरी आफ सिविलाइजेशन’ के पहले भाग में भारत में सभ्यता के विकास और प्रगति की प्रभावशाली निरंतरता पर मोएंजोदारो से लेकर गांधी, टैगोर, रमण, तक के परिदृश्य पर दृष्टि डालते हैं, आध्यात्मिकता और दर्शन की उपलब्धियों की गहराइयों की प्रशंसा करते हैं, खगोल विद्या की तीन हजार साल पहले की वैज्ञानिकता की दृष्टि और उपलब्धिओं से चकित होते हैं, प्राचीन भारत की धार्मिक आस्थाओं में विविधता की अभूतपूर्व स्वीकार्यता और स्वायत्तता के दूर दूर तक फैले प्रभाव का वर्णन करते हैं। अंत में वे लिखते हैं कि भारत की ‘पेटेंट स्कालरशिप’अब उस यूरोप के सामने आ रही है, जिसने मान लिया था कि कल विकसित यूरोपीय सभ्यता ही भविष्य की सभ्यता का एकमात्र रास्ता है! दुर्भाग्य यह है कि भारत को जब भारतीय ही समझने का प्रयास नहीं करते हैं, तो अन्य को दोष कैसे दिया जा सकता है?

यह सर्व-स्वीकार्य है कि भारत और भारतीयता से दूरी की ऐसी राष्ट्रव्यापी प्रवृत्ति के निर्मित होने में विदेशी शासकों के सुनियोजित षड़यंत्र ही मुख्यत: उत्तरदायी थे। मगर स्वतंत्रता के सत्तर साल बाद किसी अन्य पर दोषारोपण नहीं किया जा सकता। हमें अपनी शिक्षा व्यवस्था में अपेक्षित परिवर्तन करने की पूरी स्वतंत्रता ही नहीं आवश्यकता भी थी, मगर हमने प्रत्यारोपित व्यवस्था को छोटे-मोटे परिवर्तन करके लागू रहने दिया। ऐसा तब हुआ जबकि साम्राज्यवाद के विरुद्ध जितने भी स्वतंत्रता आंदोलन बीसवीं सदी में चले और सफल रहे। उनमें से किसी में भी संघर्ष काल में ही शिक्षा पर इतना ध्यान कहीं नहीं दिया गया, जितना भारत में दिया गया। इसमें न केवल अपनी शिक्षा व्यवस्था स्थापित करनें की निर्णायक सोच थी, बल्कि उसमें संस्कृति, विविधता की स्वीकार्यता और मानवीय मूल्यों की पुनर्स्थापना पर भी लगातार बल दिया गया था।

कोरोना की चुनौती एक अदृश्य शत्रु को पराजित कराने की है। यह अपने आप में अप्रत्याशित और अभूतपूर्व और है। यह मनुष्य के ज्ञान-विज्ञान और बुद्धि की गहराई की सीमाओं का भान कराती है, प्रकृति के प्रति असंवेदनशीलता के परिणामों को भी दशार्ती है। कोरोना ने इतिहास के इस मोड़ पर नया अध्याय ही नहीं, काल-खंड भी हमारे सामने खोल दिया है। मनुष्य और मानवता के समक्ष जो चुनौतियां समय-समय पर उभरती हैं, उनमें से अधिकांश मानव-जनित ही होती हैं और उनका समाधान भी मनुष्य स्वयं ही निकलता है। जीवधारियों में उसे ही विचारों की शक्ति और संकल्पना शक्ति के वरदान मिले हुए हैं। जिज्ञासा उसकी मूलभूत प्रवृत्ति है। इस सबसे ही उसकी सर्जनात्मकता प्रस्फुटित होती है।

इस समय कोरोना के अलावा भी कई चुनौतियां हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अनेक समस्याएं वैश्विक स्तर पर चिन्हित की गई हैं। इन पर नजर डालने का सबसे सरल तरीका है अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संयुक्त राष्ट्र और यूनेस्को द्वारा स्वीकृत सतत विकास लक्ष्य-2030 पर निगाह डालना! इनमें गरीबी, भुखमरी, स्वास्थ्य, संतुष्टि, लिंग-भेद, समानता, स्वच्छ पानी, साफ-सफाई, आर्थिक विकास, काम के अवसर, न्याय, शांति, सहभागिता, जल और थल पर जीवन, अच्छी गुणवत्ता वाली कौशल-युक्त शिक्षा जैसे सभी महत्त्वपूर्ण पक्ष लक्ष्य के रूप में शामिल हैं।

हर मनुष्य को एक सम्मानजनक गरिमामय जीवन जीने का हक है और इसकी व्यवस्था प्रकृति के नियमों में निहित है, व्यवधान तो मनुष्य के बनाए नियमों, व्यवस्थाओं और दृष्टिकोण के कारण उत्पन्न होते हैं। हर एक लक्ष्य में शिक्षा और शिक्षित व्यक्ति का महत्व स्वत: ही दिखाई देता है। कुल मिल कर सबसे महत्त्वपूर्ण लक्ष्य सभी को अच्छी गुणवत्ता की शिक्षा देना ही बनता है क्योंकि उसके प्रभाव अन्य सभी पर सीधे-सीधे पड़ता ही है।

शिक्षा के चार मुख्य स्तम्भ जिन पर चर्चा होती है, उनमें तीन से सभी परिचित हैं- ज्ञान पाना, कौशल सीखना, और व्यक्तित्व-विकास। इक्कीसवीं सदी में इन तीनों से पहले जिस स्तंभ को इंगित किया गया है, वह है- ‘साथ-साथ रहना सीखना’! गांधी जी ने भारत की सामाजिकता, उसकी सांस्कृतिक परिपक्वता को समझा था, धर्म यानि सदाचरण के महत्त्व को समझा था और उसे व्यावहारिक स्वरूप देने में जीवन लगाय था। उनका स्पष्ट विचार था कि ह्यऐसी कोई भी संस्कृति जो सबसे बच कर रहना चाहती है, जीवित नहीं रह सकती है। भारत को इसे आत्मसात कर विश्व के समक्ष उदाहरण रखना है।

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