over 12 crore jobs are estimated to end in cities during lockdown – राजनीतिः रोजगार का गहराता संकट

0
69
.

सुविज्ञा जैन

कोरोना से बचने के लिए की गई पूर्णबंदी ने कई तरह की समस्याएं खड़ी कर दीं। पिछले साढ़े तीन महीनों के दौरान पहले से धीमा पड़ा अर्थव्यवस्था का चक्का बिल्कुल थम ही गया। खासतौर पर बेरोजगारी ने बुरी तरह डरा दिया। सवाल यह है कि क्या वाकई हमारी अर्थव्यवस्था इतनी कमजोर या सुस्त चल रही थी कि तीन महीने की पूर्णबंदी को भी नहीं झेल पाई? गौर से देखें तो पूर्णबंदी ने पिछले कुछ साल से बेरोजगारी पर पड़े पर्दे को उघाड़ा भर है। अर्थव्यवस्था और व्यापार प्रबंधन को समझने वाले विद्वान अगर ईमानदारी से बहस करेंगे, तो बहुत संभव है कि यही निष्कर्ष निकले कि कोरोना के पहले ही बेरोजगारी के हालात इतने नाजुक हो चुके थे कि वे पूर्णबंदी को बिल्कुल नहीं झेल पाए।

क्या इस बात को भुलाया जा सकता है कि कोरोना के बहुत पहले से बेरोजगारी के पैंतालीस साल के रेकार्ड तोड़ आंकड़े पर विवाद हो रहा था। कोरोना से पहले ही कई तिमाहियों से जीडीपी घटती जा रही थी, औद्योगिक उत्पादों की मांग घट रही थी और इससे उत्पादन घट रहा था। नतीजतन रोजगार तेजी से घट चले थे। यानी यह मानना गलत होगा कि सिर्फ पूर्णबंदी ने ही रोजगार बर्बाद कर दिए।

पूर्णबंदी के दौरान शहरों से अपने घरों को लौटता प्रवासी मजदूरों का सैलाब पूरी दुनिया ने देखा है। लेकिन यह मान कर चलना सही नहीं होगा कि वे कोरोना से घबरा कर शहरों से भागे। वे इसलिए भागे, क्योंकि उनकी जेब खाली हो चली थी। अभी तक शहरों से वापस लौटै प्रवासी मजदूरों का सही-सही आंकड़ा भले उपलब्ध न हो, लेकिन एक मोटा अंदाजा जरूर लगा है कि कम से कम दो करोड़ परिवार शहर छोड़ कर अपने गांव पहुंचे। यानी देश में बेरोजगारी का अंदाजा करना हो, तो सबसे बड़ा संकट गांवों पर ही है। हालांकि इस बीच इस तरह का माहौल बनाने की भी कोशिश हो रही है कि ये मजदूर फिर शहर लौट आएंगे। बेशक रोजगार की मजबूरी में ऐसा हो सकता है। लेकिन अभी से सोच लेना चाहिए कि बहुत ही बुरा अनुभव कर चुके प्रवासी मजदूर हालात को गौर से देखेंगे परखेंगे। खासतौर पर शहरों में उद्योगधंधे फिर शुरू होने की बात पुख्ता होने के बाद ही वे शहर आने का जोखिम उठाएंगे। अभी यह संशय भी है कि शहरों में उनकी वापसी किस तादाद में होगी और इस प्रक्रिया में कितना वक्त लगेगा? यानी गांवों पर आया बेरोजगारी का अपूर्व संकट हाल-फिलहाल कम होता नजर नहीं आता।

अगला सवाल यह है कि क्या गांव अचानक बढ़े इतने बेरोजगारों का बोझ उठा सकते हैं? गांवों में छद्म बेरोजगारी पहले से इतनी ज्यादा है कि दो लोगों लायक खेती के काम में घर के चार लोग लगे हैं। कोई कितना भी कहते रहे कि गांव में खेती के अलावा नए काम-धंधे शुरू करवाए जाएंगे, लेकिन यह काम कागजों पर तो हो सकता है, जमीन पर होना मुश्किल है। बेशक नामुमकिन नहीं है, क्योंकि कई साल से विद्वान सुझाते आ रहे हैं कि गांवों में बहुत कुछ ऐसा उत्पादित हो सकता है जो शहरी भारत और विदेशों में बिक सके। लेकिन एक शर्त भी लगाई जाती रही है और वह यह कि गांव में संभावित उत्पाद बनाने के पहले यह जरूरी होगा कि शहरी भारत और विदेशों में उस माल की मांग पैदा की जाए। देश में बेरोजगारी के ऐसे भयावह संकट के समय विद्वानों के पुराने सुझावों पर गौर का समय आ गया है। भले इसके नतीजे फौरन न दिखाई दें, लेकिन इसके अलावा कोई चारा बचा भी नहीं है।

अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए सरकार बीस लाख करोड़ के राहत पैकेज का ऐलान भले कर चुकी हो, लेकिन अकेला बेरोजगारी का संकट ही इतना बड़ा है कि बीसियों मोर्चे संभालने के लिए दी गई यह रकम ऊंट के मुंह में जीरा है। यह अलग बात है कि प्रतीकात्मक रूप से कुछ भी कर देना मुश्किल नहीं होता, लेकिन बेरोजगारी का मामला हजार-पांच सौ गांवों में उत्पादक गतिविधि बढ़ाने का नहीं है, बल्कि मौजूदा संकट छह लाख से ज्यादा गांवों का है। गांव के अलावा शहरी बेरोजगारी का भी अब छोटा संकट नहीं है। गांव के पास तो फिर भी अनाज, दाल, तेल, चीनी, कपास उत्पादन का मौका है और इसके सहारे वह अपना गुजारा करने में सक्षम है, साथ ही वह शहरों को भी जिंदा रख लेगा। लेकिन शहरों की बेरोजगारी अब बड़ी चिंता समझी जानी चाहिए। जिस तरह से शहर कस्बों में काम-धंधे ठप पड़े हैं, अधखुले बाजारों में सन्नाटा है, खपत बढ़ने की कोई सूरत बनती नजर नहीं आ रही है, उससे तो लगता है कि मंदी का माहौल इतनी जल्दी नहीं बदल सकता। जब तक बाजार में मांग नहीं होगी, तब तक उत्पादन बढ़ने का सवाल ही नहीं है। और जब तक उत्पादन नहीं बढ़ता तब तक रोजगार के मौके बहाल नहीं हो सकते।

शहरी बेरोजगारी की बात करते समय यह भी देख लेना चाहिए कि पिछले दिनों पूर्णबंदी के दौरान शहरों में बारह करोड़ से ज्यादा नौकरियां खत्म होने का अंदाजा लगाया गया था। यह बाकायदा सीएमआइई का आकलन है। इन बारह करोड़ लोगों में छोटे-मोटे काम-धंधे करने वाले लोग, वेतनभोगी कर्मचारी और दिहाड़ी मजदूर शामिल हैं। गौरतलब यह भी है कि इन बारह करोड़ लोगों में तीन करोड़ युवा हैं। इस आकलन को विश्वसनीय मान लेने का एक आधार यह भी है कि मई और जून में बेरोजगारी दर सनसनीखेज तौर पर साढे़ तेईस फीसद तक पहुंच गई थी। पूर्णबंदी हटाने और अर्थव्यवस्था में लाखों करोड़ की रकम डालने के एलान के बावजूद जुलाई के शुरूआती हफ्ते में बेरोजगारी दर साढ़े नौ फीसद से कम नहीं हो पाई है। अगर बेरोजगारी का यह आलम हो तो हमें एकदम चेत जाना चाहिए।

बेरोजगारी को अर्थव्यवस्था के अलग-अलग क्षेत्रों के लिहाज से भी देखना जरूरी है। कुछ क्षे़त्रों की हालत कोरोना से पहले ही नाजुक हो गई थी और कुछ क्षेत्र कोरोना के दौरान ज्यादा तबाह हुए। अलग-अलग क्षेत्रों को देखना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि तभी पता चल पाएगा कि किस क्षेत्र में बेरोजगारी को सबसे पहले संभालने की जरूरत है। कुटीर, छोटे और मझौले उद्योग (एमएसएमई) पहले ही खस्ताहाल थे। कोरोना के दौरान यह क्षेत्र पूरी तरह तबाह हो गया। इसी तरह निर्माण क्षेत्र में कोरोना के पहले सन्नाटा था, वह पूर्णबंदी से लगभग बैठ ही गया। इस क्षेत्र में बेरोजगारी का अंदाजा शहरों से प्रवासी मजदूरों के अपने घर लौटने वाली भीड़ से लगाया जा सकता है। होटल-रेस्टारेंट, यातायात, रेहड़ी-पटरी वालों का काम-धंधा बंद होने से कितने करोड़ लोग बेरोजगार हुए, इसका आकलन अभी हुआ ही नहीं है। ये सब वे लोग हैं जिनकी माली हैसियत अपने बूते कोई नया काम शुरू करने की बिल्कुल नहीं है। इनकी अनुमानित संख्या इतनी ज्यादा दिखाई दे रही है कि छुटपुट कर्ज बांट कर उनका नया काम बैठाया नहीं जा सकता। जाहिर है, उनके रोजगार पुनर्वासन के लिए सरकार की तरफ से बड़े पैमाने पर और देशव्यापी योजना की दरकार है।

अब जब यह समझ में आ चुका है कि जान के साथ ही जहान भी जरूरी है तो अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए घोषित किए गए राहत पैकेज को फौरन खर्च करने की दरकार है। यह सरकारी राहत इस तरह देने की जरूरत है जो सबसे पहले बेरोजगारी का मोर्चा संभाल ले। भले किसी भी तरह पहुंचाया जाए, अगर बेरोजगारों की जेब तक पैसा पहुंचेगा तो वह घूम-फिर कर बाजार में ही आएगा और अर्थव्यवस्था का चक्का घुमाने का काम करेगा।

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App। में रुचि है तो




सबसे ज्‍यादा पढ़ी गई




Source link

Authors

.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here