राजनीतिः जेल सुधार की दरकार

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कारावास या जेल-व्यवस्था उन्नीसवीं शताब्दी के आधुनिक समाज की देन है। अंग्रेजी सत्ता ने अपने बनाए नियमों का उल्लंघन करने पर दोषियों को कारावास में रखने की व्यवस्था बनाई। 1894 में कारावास कानून बना, जो आज तक अस्तित्व में है। बीच-बीच में सुधार समितियों द्वारा जेलों में सुधार की सिफारिशें की जाती रही हैं। पर आजादी के सात दशक बीत जाने के बाद भी जेलों में कैदियों की भीड़ और उनके प्रति व्यवहार में कोई खास तब्दीली नहीं आई है। कैदियों की सुरक्षा के नाम पर कठोरता, अपराध की गंभीरता के नाम पर बर्बरता, दमन आदि कुछ ऐसे गंभीर मसले हैं, जिन पर कुछ ठोस नीतियां बनाने और आमूलचूल परिवर्तन की आवश्यकता है।

दंड का स्वरूप समय और स्थितियों के अनुसार बदलता रहा है। दंडशास्त्रियों ने दंड के जो सिद्धांत बताए हैं, उनमें प्रतिशोधात्मक, भयकारी, निवारणात्मक और सुधारवादी सिद्धांत प्रमुख हैं। इन्हीं सिद्धांतों के तहत जेल-व्यवस्था को चलाने की बात कही जाती है। कानून तोड़ने वाले व्यक्ति को जेल इसलिए भेजा जाता है, ताकि उसमें भय पैदा हो और वह दुबारा अपराध न करे, और समाज ऐसे व्यक्ति से यह सीख ले कि उसे भी अपराध नहीं करना है।

अब प्रश्न उठता है कि किसी व्यक्ति के आवागमन की स्वतंत्रता को खत्म करके, उसे उसकी दैहिक स्वतंत्रता से वंचित करके कैद में रखना मात्र पर्याप्त है या कि फिर यह माना जाए कि उस व्यक्ति ने अपराध करने के कारण अपने व्यक्ति होने के अधिकार को ही खो दिया है। एके गोपालन बनाम मद्रास राज्य के मामले में यही कहा गया था कि अपराधी व्यक्ति नहीं है। पर बाद में मनेका गांधी बनाम भारत संघ के मामले में आपराधिक न्याय प्रणाली में महत्त्वपूर्ण सुधार किए गए और कहा गया कि किसी भी व्यक्ति को उसकी दैहिक स्वतंत्रता से वंचित करने वाली प्रक्रिया साम्य, न्याय और सद्विवेक पर आधारित होनी चाहिए और विचारण में दूसरे पक्ष के अधिकार भी सुनिश्चित होने चाहिए।

इसके बाद सुनील बात्रा बनाम दिल्ली प्रशासन के मामले में न्यायमूर्ति वीआर कृष्णा अय्यर ने जेल प्रशासन और कैदियों की दशा में सुधार के लिए अनेक महत्त्वपूर्ण सुझाव दिए। नतीजतन, यह निश्चित हो गया कि कैदियों का भी मानवाधिकार होता है, उन्हें अपनी बात रखने, विधिक सहायता प्राप्त करने और मौलिक अधिकारों का उपयोग करने का अधिकार होता है। पर आज भी जब जेलों में कैदियों की आत्महत्याएं, उनके भाग जाने की घटनाएं, उनके साथ होने वाले दुर्व्यवहार, उनकी आपसी मारपीट जैसी घटनाएं बरबस जेल के जीवन पर सोचने को मजबूर करती हैं।

हाल ही में प्रकाशित राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट बताती है कि पूरे भारत में जेलों की संख्या के अनुपात में कैदियों की संख्या बहुत ज्यादा है। जेलों में यह जनसंख्या विस्फोट भी जेल की प्रशासन व्यवस्था को बुरे तरीके से प्रभावित करता है। 2018 की रिपोर्ट के मुताबिक भारत की कुल 1339 जेलों में 3.83 लाख कैदियों की जगह है, जबकि इनमें कैदियों की संख्या 4.66 लाख है। यानी औसतन प्रति सौ कैदी के स्थान पर 117 कैदी रह रहे हैं। इसमें भी उत्तर प्रदेश, सिक्किम, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, मेघालय और दिल्ली की स्थिति बहुत गंभीर है। उत्तर प्रदेश में तो सौ कैदी के स्थान पर 176.5 कैदी रह रहे हैं।

जेलों में भीड़ पर न्यायपालिका ने तब संज्ञान लिया, जब पूरा विश्व कोरोना की चपेट में आ रहा था। उसे लगा कि अगर इस भीड़ भरी आबादी में कोरोना फैला तो स्थिति विनाशक हो जाएगी। इसलिए आदेश पारित किया गया कि सभी राज्यों में तत्काल प्रभाव से उच्चाधिकार प्राप्त समिति गठित कर ऐसे विचाराधीन कैदियों का पता लगाया जाए, जो जेलों में सात वर्ष से ज्यादा समय से रह रहे हैं, ताकि उनकी रिहाई की जा सके। इस निर्णय के परिणाम स्वरूप महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, गुजरात, असम, गोवा और तमिलनाडु आदि राज्यों में हजारों कैदियों को अस्थायी रूप से रिहा किया जा रहा है।

वर्तमान में केंद्रीय कारागार, जिला कारागार, उप-कारागार, महिला कारागार, विशेष कारागार और ऑब्जर्वेशन होम आदि का प्रावधान है। केंद्रीय कारागार में दो वर्ष से ज्यादा की सजा पाए व्यक्तियों को रखने का और महिलाओं को विशेष महिला कारागार में रखने का नियम है। आतंकवाद जैसे गंभीर अपराधों के दोषियों को विशेष कारागार में रखने का नियम है, पर इसका पूरी तरह पालन नहीं होता। ऐसे में सबसे महत्त्वपूर्ण है कि अपराध की गंभीरता, समाज को अपराधी से होने वाली संभावित क्षति और ऐसे अपराध, जिसमें कारावास से ज्यादा प्रभाव जुमार्ने का हो सकता है, उनको जेल भेजने पर पुनर्विचार किया जाए। यह भी सुनिश्चित किया जाना आवश्यक है कि किसी भी दशा में सिद्ध दोष कैदियों के साथ विचाराधीन कैदियों को न रखा जाए। कम गंभीर प्रकृति के अपराध करने वाले, कम उम्र के लोगों को ज्यादा से ज्यादा प्रोबेशन पर छोड़े जाने की नीति बनानी चाहिए। सदाचरण की शर्त पर भी ज्यादा से ज्यादा लोगों को छोड़ना चाहिए। केवल लैंगिक अपराध, नैतिक अधमता वाले अपराध, हत्या, लूट, डकैती या ऐसे अपराध जिनसे राज्य की सुरक्षा को खतरा हो, उन्हीं मामलों में अपराधियों को जेल में रखा जाना चाहिए।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के बाद एक अन्य रिपोर्ट ‘क्रिमिनल जस्टिस इन द शैडो ऑफ कास्ट’ प्रकाशित हुई है। उसमें कहा गया है कि भारत की जेलों में प्रत्येक तीन में से एक व्यक्ति अनुसूचित जाति या जनजाति का है। दलित समाज के लिए यह एक बड़ा प्रश्न चिह्न है, इसलिए इस विषय पर भी गंभीरतापूर्वक शोध की आवश्यकता है। किसी सरकारी योजना, घोषणा या नीति के विरोध में उल्लंघन कतार्ओं की गिरफ्तारी हो तो उनके लिए एक अलग प्रकार की और अस्थायी जेल का सृजन किया जाना चाहिए।

दूसरी समस्या है जेल अधीक्षकों की। इनकी संख्या स्वीकृत पदों की तुलना में अत्यंत कम है। सबसे पहले तो सारी रिक्तियां भरे जाने और फिर आदर्श कारागार मैनुअल के सुझावों पर अमल करते हुए अन्य पदों का भी सृजन आवश्यक है। कैदियों के अनुपात में ही जेल अधीक्षक और जेलों की संख्या होनी चाहिए। प्रत्येक जेल में चिकित्सा व्यवस्था के साथ मनोचिकित्सकों की भी स्थायी नियुक्ति की जानी चाहिए, ताकि वे अपराधियों की मनोवृत्ति में सुधार ला सकें और उन्हें समाज में समायोजित किया जा सके। विचाराधीन कैदियों के मामलों का शीघ्रता से निपटारा किया जाना आवश्यक है, ताकि सुनिश्चित हो सके कि वे दोषी पाए गए या नहीं।

अभी हाल में अनूप सतपथी समिति ने सिफारिश की है की दिहाड़ी मजदूरों का पारिश्रमिक बढ़ाया जाए। इस संदर्भ में कैदियों के पारिश्रमिक पर भी विचार होना चाहिए। यातना और अन्य क्रूर, अमानवीय या अपमानजनक व्यवहार या सजा के विरुद्ध यूएन कनवेंशन पर भारत ने हस्ताक्षर तो कर दिया है, पर इसकी पुष्टि होना बाकी है। इसलिए आवश्यक है कि शीघ्रातिशीघ्र भारत सरकार इसकी पुष्टि करे।

कुछ लोग जेल से छूटने के बाद अपने अनुभवों को लिखते हैं। जैसे अरुण फेरारिया ने अपनी पुस्तक ‘द कलर ऑफ केज’ में जेलों की दयनीय दशा का बहुत मार्मिक वर्णन किया है। ऐसी पुस्तकों की समीक्षा और उनके आधार पर कमियों को दूर करने की कोशिश होनी चाहिए। चूंकि अपराधी के प्रति समाज अपना रोष और प्रतिक्रिया व्यक्त करता है, इसीलिए शायद विधायिका इस समुदाय के प्रति अपनी संवेदनशील सोच को विकसित नहीं कर पाती। पर हमें सोचना होगा कि आज नहीं तो कल, ये कैदी बाहर आएंगे और इसी समाज में रहेंगे, इसलिए जेलों को अपराध की पाठशाला न बना कर उनको नियंत्रित और अनुशासित रखते हुए समाज में पुनर्वासित करने वाला केंद्र बनाना चाहिए।

 

 

 

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