Workplace Bullying: 75% लोग होते हैं वर्कप्लेस बुलिंग का शिकार, कहीं आप भी तो नहीं! | relationships – News in Hindi

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वर्कप्लेस बुलिंग (Workplace Bullying): युवा और प्रतिभाशाली अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत (Sushant Singh Rajput Suicide) की मौत ने कई लोगों को झिंझोड़ कर रख दिया है. इसके साथ ही भाई-भतीजावाद (Nepotism) , डराने धमकाने का मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव के खिलाफ भी लोगों ने आवाज मुखर की है. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इन दिनों शोर से भरे हुए हैं क्योंकि कुछ लोग भाई-भतीजावाद और धमकाने के खिलाफ अपनी आवाज उठा रहे हैं और अन्य लोग खुद से सवाल कर रहे हैं कि क्या उन्हें अपनी चिंता साझा करने का अधिकार है, उनके अनुसार, हर धमकाने वाला भी इस चीज का शिकार है. कई बार स्कूल और कॉलेज के ऐसे कई मामले सामने आते हैं लेकिन वर्कप्लेस पर जब ऐसा होता है तो अधिकतर लोग चुप रहने में भी भलाई समझते हैं. ये बेहद आम हो चुका है.

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टीओआई ने फीनिक्स विश्वविद्यालय से जुडिथ लिन फिशर-ब्लांडो द्वारा किए गए एक शोध के हवाले से रिपोर्ट छापी है. रिपोर्ट के अनुसार , लगभग 75 प्रतिशत कर्मचारी अपने वर्कप्लेस पर जीवन में कभी न कभी वर्कप्लेस बुलिंग का शिकार होते हैं. इस स्टडी का नाम है वर्कप्लेस बुलिंग: एग्रेसिव बिहेवियर एंड इट्स इफेक्ट ऑन जॉब सैटिस्फैक्शन एंड प्रोडक्टिविटी (Workplace Bullying: Aggressive Behaviour and it’s Effect on Job Satisfaction and Productivity). इसके तहत ऐसे ही कुछ चीजों को उजागर करने वाले तथ्यों को सामने लाने का प्रयास किया गया है.

क्या है वर्कप्लेस बुलिंग?वर्कप्लेस बुलिंग (workplace bullying) सहकर्मियों, अधीनस्थों, बॉस आदि द्वारा लगातार ऐसे व्यवहार का पैटर्न है जो पीड़ित को गंभीर भावनात्मक और मानसिक नुकसान पहुंचा सकता है और कई मामलों में तो शारीरिक नुकसान भी. इस तरह के व्यवहार में मनोवैज्ञानिक दुर्व्यवहार, अपशब्दों का इस्तेमाल और बिना कुछ बोले मानसिक रूप से प्रताड़ित करना और कुछ मामलों में, यहां तक ​​कि शारीरिक शोषण भी शामिल है; इस तरह के व्यवहार से पीड़ित को बहुत ज्यादा मानसिक तनाव और अपमान महसूस होता है. इसका सबसे नकारात्मक पक्ष है कि ऑफिस में होने वाला उत्पीड़न स्कूल में होने वाले खराब व्यवहार से ज्यादा बुरा होता है क्योंकि यहां परेशान करने वाला (offenders) ऑफिस के रूल्स और रेगुलेशन के भीतर ही काम करता है. यह बुलिंग काफी बारीक और गहरे मनोवैज्ञानिक स्तर पर होता है. जूडिथ लिन फिशर-ब्लांडो के शोध के अनुसार, ऑफिस पर शारीरिक उत्पीड़न या यौन शोषण की तुलना में वर्कप्लेस बुलिंग ज्यादा आम है.

वाशी-ए फोर्टिस नेटवर्क अस्पताल, हीरानंदानी अस्पताल, के मनोचिकित्सक डॉ. केदार तिलवे ने बताया कि वर्कप्लेस बुलिंग अक्सर कंपनी के नियमों और शिष्टाचार के भीतर ही होता है. बार-बार बहिष्कार, जानबूझकर हाशिए पर रखना, डाउन-रेटिंग, ऑस्ट्रैकिज्म और वर्क प्रॉजेक्ट्स का अपने हिसाब से अलॉटमेंट वास्तव में कुछ चुनिंदा व्यवहारों में से हो सकता है. ऑफिस में इस तरीके के व्यवहार से कई बार पीड़ित खुद को बेहद अलग थलग और डिप्रेशन में महसूस करता है.

कौन होता है वर्कप्लेस बुलिंग का शिकार?

फोर्ब्स में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, ‘वही लोग वर्कप्लेस बुलिंग का निशाना बनते हैं जिनके बारे में कोई चीज बुली यानी कि डराने-धमकाने वाले को खटकती रहती है. बुलिंग का शिकार अक्सर उन लोगों को बनाया जाता है जो तकनीकी रूप से ज्यादा कुशल होते हैं, उनके पास ज्यादा बेहतर ईक्यू होता है या लोग उन्हें काफी पसंद करते हैं. एक्सपर्ट्स के अनुसार, अक्सर वो लोग जो वर्कप्लेस के माहौल में एकदम फिट होते हैं वही बुलिंग के शिकार हो जाते हैं. कई बार लोग बुलिंग का शिकार जातिगत वजहों से होते हैं, कई बार उनके काम के तरीके की वजह से जो दूसरों से ज्यादा बेहतर और उम्दा होता है और उनमें अपने कलीग्स से ज्यादा क्षमता होती है. लेकिन बुलिंग का कारण जो भी लेकिन इससे पीड़ित व्यक्ति मानसिक रूप से काफी परेशान महसूस करता है और कई बार तो वो खुद को लेकर काफी नकारात्मक कदम भी उठा लेता है.

वर्कप्लेस बुलिंग को कैसे रोकें?
वर्कप्लेस बुलिंग को रोकना वाकई काफी मुश्किल है. क्योंकि वर्कप्लेस बुलिंग अक्सर ऑफिस के मानदंडों और नियमों के भीतर ही होती है. अगर वर्कप्लेस बुलिंग के लिए बुली (परेशान करने वाले) को फटकार भी लगे जोकि बहुत ही कम होता है तब भी यह काफी दुष्कर ही होता है कि वो वर्कप्लेस बुलिंग बंद कर दे. कई एक्सपर्ट्स का ऐसा भी मानना है कि वर्कप्लेस बुलिंग अक्सर वही लोग करते हैं जो पहले कहीं इसका शिकार हो चुके होते हैं.



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