If hunger, malnutrition and starvation problems are not given immediate attention, the situation may worsen – राजनीति: कुपोषण की गहराती समस्या

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भारत डोगरा
कुपोषण की समस्या भारत में एक बड़ा मुद्दा बन चुकी है। कुपोषण की चिंताजनक स्थिति पर राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई बार ध्यान दिलाया गया है। इस स्थिति में ही आंगनवाड़ी और दोपहर के भोजन (मिड डे मील) के रूप में विश्व स्तर पर पोषण के कुछ बड़े कार्यक्रम भारत में आरंभ किए गए। ऐसे कार्यक्रमों से निश्चय ही कुछ राहत तो मिली, पर इनके प्रसार के बावजूद कुपोषण की स्थिति का विकट बना रहना इस ओर संकेत करता है कि कुपोषण के कुछ ऐसे पक्ष भी हैं, जिनकी ओर अपेक्षाकृत कम ध्यान जा रहा है।

कुपोषण का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह रहा है कि पोषण के कुछ सूक्ष्म तत्त्वों विशेषकर खनिजों की कमी अधिक पाई जा रही है। इसका एक उपाय यह खोजा गया कि कृत्रिम तौर पर कुछ सूक्ष्म तत्त्वों को कुछ खाद्यों में जोड़ दिया जाता है। लेकिन यह एक अस्थायी व कृत्रिम उपाय ही है, जिसके कुछ हानिकारक असर भी सामने आ सकते हैं। प्राकृतिक तौर पर ही भोजन में जरूरी पोषक तत्त्व प्राप्त हों यह सबसे बेहतर स्थिति है।

पिछले कुछ दशकों में फसलों में रासायनिक खाद का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। इसमें भी नाइट्रोजन खाद का अधिकतम उपयोग हुआ। इससे मिट्टी में अनेक पोषक तत्त्वों, विशेषकर सूक्ष्म पोषण तत्त्वों की कमी हो गई। पोषण विशेषज्ञों के मुताबिक कुछ क्षेत्रों में मिट्टी में सूक्ष्म पोषण तत्त्वों की कमी के विचलित करने वाले प्रमाण सामने आए हैं। इसका आगे यह असर होने की बहुत संभावना है कि यह समस्या ऐसी मिट्टी में उगाई जाने वाले खाद्यान्न की कम पौष्टिकता के रूप में प्रकट होगी।

रिचर्ड डाऊथवेट ने अपनी पुस्तक द ग्रोथ इल्यूशन में लिखा है कि कंपोस्ट खाद से उगाई फसल में जितने नाईट्रेट मिलते हैं, रासायनिक नाइट्रोजन खाद से उगाई फसल में इसकी तुलना में नाइट्रेट चार से पांच गुना बढ़ सकते हैं, जबकि विटामिन सी कम हो जाते हैं। इस कारण, विशेषकर नाईट्रेट की इतनी अधिकता से कैंसर की संभावना बढ़ती है।

इसलिए रासायनिक खाद पर निर्भरता कम करते हुए कंपोस्ट व जैविक खाद का उपयोग बढ़ाना चाहिए। साथ में, रासायनिक कीटनाशकों, जंतुनाशकों और खरपतवारनाशकों का उपयोग भी न्यूनतम किया जाना चाहिए। इस तरह फसलों का जहरीले छिड़काव व तत्त्वों से बचाव होगा। मिट्टी में केंचुए व प्राकृतिक उपजाऊपन बढ़ाने वाले सूक्ष्म जीव पनप सकेंगे। इस तरह मिट्टी में संतुलित पोषक तत्त्व होंगे और इनमें उगाई गई फसल में भी सूक्ष्म पोषक तत्त्वों सहित पोषण अधिक होगा।

एक अन्य महत्त्वपूर्ण मुद्दा यह है कि दलहन व अनाज की मिश्रित खेती में कमी आई है। इस वजह से मिट्टी में पोषक तत्त्वों और खाद्य में पोषण संतुलन दोनों में कमी आई है। अनाज व दलहन की मिश्रित खेती से मिट्टी के प्राकृतिक उपजाऊपन को बनाए रखने में मदद मिलती है और इससे खाद्यों में पोषण संतुलन में भी मदद मिलती है। अनाज व दलहन के फसल चक्र से भी ऐसी सहायता मिलती है।

मोटे अनाजों में सूक्ष्म पोषण तत्त्व, विशेषकर खनिज अधिक मिलते हैं। हाल के दशकों में चावल और गेंहू को मुख्य अनाज के रूप में बढ़ती प्राथमिकता मिली है, जबकि विविधता भरे अनेक मोटे अनाज की फसलों की उपेक्षा हुई। इन मोटे अनाजों को सरकारी खरीद द्वारा सार्वजनिक वितरण प्रणाली और पोषण कार्यक्रमों में बहुत कम स्थान मिलता है। यह उपेक्षा दूर की जाए तो इन्हें उचित प्राथमिकता मिलेगी। इस तरह भी पोषण स्थिति सुधारने में सहायता मिलेगी।

वनों के एक महत्त्वपूर्ण पक्ष को प्राय: उपेक्षित किया गया है और वह यह है कि वनों में बहुत से पौष्टिक खाद्य मिलते हैं। यह पौष्टिक खाद्य पास रहने वाले आदिवासियों को सबसे सहजता से उपलब्ध हो सकते हैं। उन्हें इसकी जरूरत भी है। लेकिन विडंबना यह है कि वनों की इस महत्त्वपूर्ण देन की उपेक्षा करते हुए ऐसी नीतियां अपनाई जा रही हैं जिनसे वनों में मिलने वाले पौष्टिक खाद्यों का बहुत ह्रास हो रहा है। इनमें एक मुख्य नीति है प्राकृतिक वनों के स्थान पर व्यापारिक महत्त्व के पेड़ों को लगाना व पनपाना। ऐसी हानिकारक नीतियों पर रोक लग सके, इसके लिए विशेषज्ञ वनों के पोषण की दृष्टि की ओर बार-बार ध्यान आकर्षित कर रहे हैं।

हालांकि वनों को खाद्य उत्पादक क्षेत्र के रूप में उपयोग करने के लिए ओड़िशा जैसे राज्यों में पहल शुरू भी हुई है। ओड़िशा के रायगढ़ और सुन्दरगढ़ जिले में वनों से प्राप्त होने वाले एक सौ इक्कीस खाद्यों की जानकारी प्राप्त की गई। कोई आदिवासी खाद्यों के लिए एक बार जंगल जाता है तो एक चक्कर में औसतन 4.56 किग्रा खाद्य हासिल कर लेता है। सूक्ष्म पोषक तत्त्व देने में इन खाद्यों का विशेष महत्त्व है। प्रतिकूल मौसम व सूखे के वर्ष में व सस्ता राशन समाप्त हो जाने पर इस वनों से प्राप्त होने वाले खाद्य की भूमिका आदिवासियों के लिए और अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाती है।

जिन वनों में प्राकृतिक विविधता बची हुई है, वहां वर्ष भर कोई न कोई उपयोगी खाद्य वनों से मिलते ही रहते हैं। पोषण के अतिरिक्त इनकी बिक्री से आदिवासियों को कुछ आय भी प्राप्त होती है। यह खाद्य स्वास्थ्य की दृष्टि से बेहतर और सुरक्षित पाए गए हैं। इनसे जहरीली दवाओं व हानिकारक रसायनों का खतरा नहीं है। वन खाद्यों संबंधी आदिवासी समुदायों के पास मूल्यवान ज्ञान का भंडार है जिसका संरक्षण होना चाहिए।

इसके लिए यह आवश्यक है कि सरकार के इस स्तर पर इस महत्त्व को समझा जाए और इसके लिए समुचित अनुसंधान व अध्ययन की दिशा में कदम बढ़ाए जाएं। कुपोषण से लड़ने में यह मील का कदम साबित हो सकता है। साथ ही, जिन नीतियों से पौष्टिक खाद्यों के इस भंडार की क्षति हो रही है, उन नीतियों को छोड़ कर प्राकृतिक वनों की रक्षा की नीतियां अपनाने पर जोर दिया जाए।

इन प्रयासों से आदिवासी समुदायों को भी जोड़ा जा सकता है, ताकि वनों की भली.भांति रक्षा भी हो और यहां से पौष्टिक खाद्य इन समुदायों को उपलब्ध भी होते रहें। देश के अधिकांश आदिवासी क्षेत्रों की यही स्थिति है। यदि वनों से प्राप्त पौष्टिक खाद्यों के महत्त्व को भली-भांति समझ कर इनका उचित उपयोग किया जाए तो इससे भी कुपोषण की समस्या सुधारने में सहायता मिल सकती है।

अनेक महत्त्वपूर्ण पौष्टिक खाद्यों के विषय में देखा गया है कि प्राकृतिक स्थितियों में उनका उत्पादन विविध कारणों से कम हो रहा है। लेकिन कृत्रिम उत्पादों को जोड़ कर बाजार में उनकी बिक्री बढ़ाई जा रही है। उदाहरण के लिए, रासायनिक कीटनाशकों और खरपतवारनाशकों के उपयोग और विद्युत-चुबंकीय प्रदूषण से मधुमक्खियों की बहुत क्षति हुई है और इसका असर प्राकृतिक शहद उत्पादन पर पड़ा है।

प्राकृतिक शहद के उत्पादन में भारी कमी आई है। इससे परागीकरण, कृषि व पौधों की जैव विविधता को भी भारी नुकसान पहुंचा है। पर इन बुनियादी समस्याओं को दूर करने के स्थान पर कृत्रिम उत्पादों को जोड़ कर बाजार में शहद की बिक्री बढ़ाई जा रही है, जिससे इस पौष्टिक खाद्य की गुणवत्ता में बहुत कमी आ रही है। इस संबंध में संसद में सवाल उठ चुके हैं और सरकार के जवाब से भी यह बात सामने आई है कि ऐसी स्थिति में गुणवत्ता मानकों को बदल दिया गया है।

शहद तो केवल एक उदाहरण है। अनेक अन्य पौष्टिक खाद्यों की गुणवत्ता भी इसी तरह प्रभावित हो रही है। अनेक कृत्रिम उत्पादों को गलत ढंग से मिला कर बाजार में इनकी उपलब्धता बढ़ाई जा रही है। इन सभी उपेक्षित समस्याओं पर अगर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो देश में कुपोषण की समस्या से निपटने के प्रयास सफल नहीं हो सकते।

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