Central and state governments want to make education online road to digitization of education – राजनीतिः शिक्षा के डिजिटलीकरण की राह

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राजू पांडेय

केंद्र और राज्य सरकारें शिक्षा को ऑनलाइन करना चाहती हैं। सवाल है कि क्या कोविड-19 के चलते शिक्षा को ऑनलाइन करना आवश्यक हो गया है या इसके बहाने जल्द से जल्द शिक्षा को तकनीक के हवाले करने की कोशिश हो रही है। सरकारों को यह भी स्पष्ट करना होगा कि ऑनलाइन शिक्षा के नाम पर जो कुछ चल रहा है वह आपात व्यवस्था है या प्रभावकारी शिक्षण पद्धति। अगर यह आपात व्यवस्था है, तो कोविड-19 की दवा ढूंढ़ लिए जाने के बाद पुरानी शिक्षा पद्धति की ओर वापसी की संभावनाएं बचती हैं। पर अगर ऐसा नहीं है और हम प्रभावकारी शिक्षण पद्धति की ओर बढ़ रहे हैं, तो हमारे प्रयास न केवल नाकाफी, बल्कि अवैज्ञानिक भी हैं और इनका स्वरूप शिक्षा के अधिकार की मूल भावना पर आघात करने वाला है।

अगर हमारा मकसद प्रभावकारी शिक्षण है, तो हमें विशेषज्ञों के इस आकलन को स्वीकार करना होगा कि अभी हम शिक्षक-छात्र की प्रत्यक्ष अंत:क्रिया के वर्तमान पारंपरिक स्वरूप से ऑनलाइन शिक्षा की ओर पहला कदम रख रहे हैं। अभी हम संपूर्ण ऑनलाइन शिक्षा के पहले चरण में हैं। द्वितीय चरण में शत प्रतिशत पाठ्यक्रम ऑनलाइन हो, यह हमारा लक्ष्य होना चाहिए, जब मूल्यांकन आदि भी पूर्णत: ऑनलाइन होगी। तृतीय चरण कोर्स क्रेडिट की संपूर्ण ऑनलाइन डिलीवरी का होगा, जब ऑनलाइन डिग्रियां दी जा सकेंगी। अगर हमारी शुरुआत ही यह जाहिर करती हो कि हमारी ऑनलाइन शिक्षा का भावी स्वरूप असमावेशी होगा, जिसमें देश के ग्रामीण विद्यार्थियों और निर्धन छात्र-छात्राओं के लिए या तो असमान अवसर होंगे या अवसरों का अभाव होगा, तो चिंता स्वाभाविक है।

समस्याएं अनेक हैं। नीति आयोग का स्ट्रेटेजी फॉर इंडिया ऐट 75 नामक दस्तावेज यह स्वीकार करता है कि हमारे पचपन हजार गांव बिना मोबाइल इंटरनेट कवरेज के हैं और देश में इंटरनेट की गुणवत्ता और विश्वसनीयता की समस्या हमारी प्रगति को बाधित करती है। ग्रामीण इलाकों में रहने वाले विद्यार्थियों में से केवल अट्ठाईस प्रतिशत के पास घर पर इंटरनेट उपलब्ध है। क्वाकरैली सिमंड्स का एक सर्वेक्षण बताता है कि भारत की अस्सी फीसद आबादी इंटरनेट के लिए मोबाइल हॉट स्पॉट का उपयोग करती है और हॉट स्पॉट का उपयोग करने वाले छियानबे प्रतिशत विद्यार्थियों को इंटरनेट कनेक्टिविटी में दिक्कत हुई तथा उनकी पढ़ाई बाधित हुई। क्यूएस की ‘कोविड-19 : ए वेकअप कॉल फॉर टेलीकॉम सर्विस प्रोवाइडर्सछ शीर्षक रिपोर्ट बताती है कि भारत में संचार टेक्नोलॉजी की गुणवत्ता अभी इतनी नहीं है कि वह विद्यार्थियों को ऑनलाइन शिक्षा सही और पूर्ण रूप से प्रदान कर सके। देश में केवल आठ प्रतिशत परिवार ऐसे हैं, जिनमें पांच से चौबीस वर्ष आयु के सदस्यों के पास कंप्यूटर और इंटरनेट दोनों है।

ऑनलाइन शिक्षा को शिक्षा-व्यवस्था की इस अराजक, भयानक और हताशाजनक स्थिति के रामबाण इलाज के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। कई शिक्षाविद मानते हैं कि ऑनलाइन शिक्षा की ओर यह कदम जबरिया जरूर, पर फायदेमंद है। बेशक ऑनलाइन शिक्षा ही भविष्य की शिक्षा है, पर हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि शिक्षा के डिजिटलीकरण की प्रक्रिया में हमारी प्राथमिकताएं क्या हैं? क्या ऑनलाइन शिक्षा की रूपरेखा उस निर्धन व्यक्ति को केंद्र्र में रख कर बनाई जा रही है, जो अभावग्रस्त सरकारी स्कूलों तक भी किसी तरह पहुंच बना पाता है, निजी शालाओं की विलासिता का सपना भी देखना जिसके लिए पाप है? क्या ऑनलाइन शिक्षा उस गरीब विद्यार्थी को बेहतरीन शिक्षकों द्वारा तैयार उच्च कोटि की शिक्षण सामग्री उपलब्ध कराने का जरिया बनेगी, जो दक्ष शिक्षकों और अच्छी पुस्तकों की कमी से निरंतर जूझता रहता है?

क्या ऑनलाइन शिक्षा देश के उस मेधावी युवा को देश और दुनिया के बेहतरीन संस्थानों में पढ़ने का अवसर प्रदान करेगी, जो अर्थाभाव के कारण अन्य शहर या अन्य देश जाकर पढ़ने के विषय में सोच भी नहीं पाता? क्या ऑनलाइन शिक्षा अभावग्रस्त सरकारी स्कूलों और सर्वसुविधायुक्त निजी स्कूलों के बीच की खाई को मिटाने में समर्थ होगी? क्या ऑनलाइन शिक्षा बीच में स्कूल छोड़ने की समस्या का स्थायी समाधान दे पाएगी? क्या शिक्षा का डिजिटलीकरण शिक्षा माफियाओं पर निर्णायक प्रहार कर पाने में समर्थ हो पाएगा? पर जो कुछ चल रहा है, उसमें इन प्रश्नों के उत्तर नहीं मिल रहे हैं, बल्कि नए प्रश्न खड़े हो रहे हैं।

अनेक विशेषज्ञों ने व्यय का आकलन कर यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि पारंपरिक शिक्षा में अधोसंरचना के विकास और मानव संसाधन पर जितना व्यय होता है, उससे कहीं कम खर्च में ऑनलाइन शिक्षा की बेहतरीन सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकती हैं। पर अनेक बुनियादी प्रश्न अनुत्तरित हैं। शिक्षा के डिजिटलीकरण के लिए भारी संख्या में स्मार्ट फोन, लैपटॉप और डेस्कटॉप कंप्यूटरों की आवश्यकता होगी। क्या इनकी गुणवत्तापूर्ण और मुफ्त या रियायती दर पर आपूर्ति आम जरूरतमंद निर्धन परिवार को की जा सकेगी? क्या पांच से पंद्रह वर्ष आयु के बालक-बालिकाओं को स्मार्टफोन देना उचित होगा? अभी तक हमारी आशंकाएं यही रही हैं कि मोबाइल फोन बच्चों को वास्तविक जगत से काट देते हैं, बच्चे आभासी दुनिया के खतरनाक खेलों के पीछे पागलपन की हद तक आकर्षित हो जाते हैं और उनका मानसिक विकास बाधित होता है। क्या इन आशंकाओं के बीच विद्यार्थियों के लिए खास तरह के स्मार्टफोन बनाने होंगे, जिनमें पाठ्य सामग्री ही भरी होगी? क्या हम शिक्षकों को शिक्षण कार्य हेतु विशेष रूप से तैयार ऑनलाइन शिक्षण उपकरण उपलब्ध कराएंगे? क्या इंटरनेट कनेक्टिविटी और कंप्यूटिंग डिवाइस के अभाव की स्थिति को देखते हुए रेडियो और टेलीविजन द्वारा शिक्षा एक विकल्प हो सकती है?

1970 के दशक से इनका प्रयोग शिक्षण हेतु प्रारंभ हो गया था, फिर क्या हुआ कि इन पर समुचित ध्यान नहीं दिया गया? क्या हम शिक्षार्थी केंद्र्रित मुक्त ऑनलाइन पाठ्यक्रम तैयार करने की दिशा में कार्य कर रहे हैं? क्या डिजिटल तकनीक में दक्ष युवाओं को शिक्षण कार्य का प्रशिक्षण देना भी एक व्यावहारिक विकल्प हो सकता है? क्या अब हम धीरे-धीरे पूर्णकालिक शिक्षकों की छंटनी कर शिक्षा को अंशकालिकों के हवाले करने की ओर अग्रसर हो रहे हैं? शालाएं विद्यार्थी के सामाजीकरण और उसके व्यक्तित्व में आधारभूत नागरिक और मानवीय गुणों के विकास में सहायक होती हैं। ऑनलाइन शिक्षा पर संपूर्ण निर्भरता क्या बच्चे के शारीरिक और मानसिक विकास को गंभीर रूप से बाधित करने वाली नहीं है? क्या बाल मनोविज्ञान और शिक्षण कौशल में दक्ष शिक्षक का स्थान यांत्रिक शिक्षा ले सकती है? कम आयु के विद्यार्थियों से आत्मानुशासन की अपेक्षा नहीं की जा सकती। उन्हें अपने व्यवहार को नियंत्रित करने के लिए एक जीवित-जाग्रत सचेतक, मार्गदर्शक और प्रेरक चाहिए होता है। क्या ऑनलाइन शिक्षा में इस पक्ष को अनदेखा किया जाएगा? हर घर में न इतना स्थान होता है न ऐसा वातावरण, जहां एकाग्रचित्त होकर पढ़ा जा सके। शाला का वातावरण और शिक्षकों की उपस्थिति विद्यार्थियों को मनोयोग से पढ़ने में सहायता देती है। क्या ऑनलाइन शिक्षा यह वातावरण और अनुशासन दे पाएगी?

अनेक विशेषज्ञ अफ्रीकी देशों द्वारा अपनाए गए पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल को अपनाने की सलाह दे रहे हैं- जैसे आईबीएम द्वारा केन्या एजुकेशन फाउंडेशन के साथ अनुबंध। यूनेस्को तथा अनेक यूरोपीय और अमेरिकी एनजीओ विकासशील देशों को शिक्षा के डिजिटलीकरण हेतु सहायता देते हैं। इनका सहयोग भी लिया जा सकता है। देश के अनेक शिक्षाविद यह भी परामर्श दे रहे हैं कि शिक्षा मंत्रालय, वित्त मंत्रालय, सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय तथा कौशल विकास तथा उद्यमिता मंत्रालय के मंत्रियों और उच्चाधिकारियों का समूह बनाते हुए एक समेकित रणनीति निर्मित कर कार्य करने से शिक्षा के डिजिटलीकरण का कार्य सुचारू रूप से हो सकेगा। इन सुझावों पर गौर किया जाना चाहिए।

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