dispute over the dominance of China over South China Sea with Australia India South Korea and Vietnam Except Pakistan – राजनीतिः चीन की सामरिक घेरेबंदी

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ब्रह्मदीप अलूने

साम्यवादी चीन का अपने देश की राष्ट्रीय सीमा का कोई स्पष्ट मानचित्र नहीं है। वह संयुक्त राष्ट्र में भरोसा नहीं रखता और इस देश की कम्युनिस्ट पार्टी उग्र राष्ट्रवाद की नीति से पोषित होकर प्राचीन चीनी सभ्यता, उसके राजवंश और इतिहास के आधार पर वृहत चीन साम्राज्य स्थापित करने की संकल्पना के साथ संचालित होती रही है। पड़ोसी देशों की संप्रभुता और समुद्र की स्वायत्तता को चुनौती देने की चीन की यह विस्तारवादी नीति अंतरराष्ट्रीय शांति को लगातार खतरे में डाल रही है। द्वितीय विश्व युद्द के बाद उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद को खत्म करने और विश्व शांति की स्थापना के लिए संयुक्त राष्ट्र की स्थापना की गई थी। संयुक्त राष्ट्र में पांच महाशक्तियों के साथ सुरक्षा परिषद का गठन इसीलिए किया गया था, ताकि विश्व में सामूहिक सुरक्षा की भावना को बढ़ावा मिले। इसके साथ ही ऐसे राष्ट्रों के खिलाफ निरोधात्मक और दंडात्मक कार्रवाई भी की जा सके, जो अपनी तानाशाही और आक्रामक प्रवृत्ति से अंतरराष्ट्रीय शांति को भंग करते हैं और अपनी विस्तारवादी नीति से छोटे और शांतिप्रिय राष्ट्रों की अखंडता को खत्म करना चाहते हैं।

चीन सुरक्षा परिषद का अहम सदस्य है। इसके बाद भी वह अपने वैश्विक दायित्व के प्रतिकूल व्यवहार कर संयुक्त राष्ट्र की शांतिपूर्ण सह अस्तित्व की भावना को लगातार चुनौती दे रहा है। संयुक्त राष्ट्र पर चीन आर्थिक और राजनीतिक रूप से हावी है, अत: चीन को प्रतिसंतुलित करने के लिए अब दुनिया के कई देश लामबंद हो रहे हैं। इस समय अमेरिका भी एशिया की क्षेत्रीय ताकतों के बूते चीन की सामरिक घेराबंदी करने के लिए प्रयासरत है। अमेरिकी विदेश नीति में एशिया प्रशांत क्षेत्र को बेहद महत्त्वपूर्ण माना गया है। चीन के उभार को रोकने के लिए कूटनीति और सामरिक रूप से अमेरिका एशिया के कई इलाकों में अपनी सैन्य क्षमता बढ़ा रहा है। ओबामा काल में अमेरिका की एशिया केंद्रित नीति में जापान, दक्षिण कोरिया, थाईलैंड, फिलीपींस और ऑस्ट्रेलिया के सहयोग से चीन को चुनौती देने की प्रारंभिक नीति पर काम शुरू हुआ था। ओबामा ने एशिया में अपने विश्वसनीय सहयोगी देशों के साथ ही उन देशों को जोड़ने की नीति पर भी काम किया, जो चीन की विस्तारवादी नीति और अवैधानिक दावों से परेशान हैं। इन देशों में भारत समेत इंडोनेशिया, ताइवान, मलेशिया, म्यांमार, ताजिकिस्तान, किर्गिस्तान, कजाकिस्तान, लाओस और वियतनाम जैसे देश शामिल हैं।

दक्षिणी चीन सागर, प्रशांत महासागर और हिंद महासागर के बीच स्थित समुदी मार्ग से व्यापार का बेहद महत्वपूर्ण इलाका है। इंडोनेशिया और वियतनाम के बीच पड़ने वाले समंदर का हिस्सा करीब पैंतीस लाख वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। दुनिया के कुल समुद्री व्यापार का बीस फीसद हिस्सा यहां से गुजरता है। सात देशों से घिरे दक्षिणी चीन सागर को लेकर चीन और अन्य देशों के बीच गहरा तनाव रहा है और कई बार युद्ध जैसी स्थितियां भी बन चुकी हैं। फिलीपींस के पास स्कारबरो शोल एक छोटा-सा द्वीप है, जिसका अपना रणनीतिक महत्त्व है। चीन से यह पांच सौ किलोमीटर दूर है, लेकिन इसके बाद भी साल 2012 में चीन ने अपना लड़ाकू जहाज भेज कर उस द्वीप पर कब्जा कर लिया था। इसे लेकर फिलीपींस और चीन के बीच कई महीने तनातनी रही और जंग जैसे हालात बन गए थे। यह विवाद अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में गया और फैसला जब फिलीपींस के पक्ष में हुआ, तो चीन ने उसे मानने से इंकार कर कर दिया।

यदि पाकिस्तान को छोड़ दें, तो बाकी देशों ऑस्ट्रेलिया, भारत, दक्षिण कोरिया और वियतनाम से चीन का दक्षिण चीन सागर पर आधिपत्य को लेकर विवाद है। चीन के दक्षिण में वियतनाम, लाओस और म्यांमार है और वियतनाम के साथ उसका युद्ध भी हो चुका है। चीन के मुताबिक वियतनाम पर भी उसका हक है और वह इसका आधार चौदहवीं सदी में मिंग राजवंश के शासन को बताता है। भारत और वियतनाम के बीच दक्षिण चीन सागर में प्राकृतिक गैस उत्खनन को लेकर समझौता हुआ था और इसका चीन ने विरोध किया था। पूर्वी चीन सागर में शेंकाकू द्वीप को लेकर चीन और जापान के बीच विवाद है। चीन ने इस द्वीप में साल 2012 से अपने जहाज और विमान भेजने शुरू कर दिए थे। तब से ही जापान और चीन के बीच विवाद बढ़ गया है। चीन का कहना है कि वह द्वीप उसी का है, जिसे जापान ने उससे 1895 के युद्ध में चीन से लिया था। चीन-जापान विवाद के बीच अमेरिका जापान को खुला और मुखर समर्थन दे रहा है।

जापान और अमेरिका के बीच साल 2004 में मिसाइल रक्षा प्रणाली के संबंध में समझौता भी हुआ था। जापान की नई रक्षा नीति में दक्षिणी द्वीपों को प्राथमिकता देते हुए वहां सैनिकों की संख्या में भारी बढ़ोत्तरी की गई है। जापान अब चीन को बड़े खतरे की तरह देख रहा है और इसका प्रभाव उसकी सामरिक नीति पर भी देखा जा सकता है। अमेरिका जापान को भारत और आॅस्ट्रेलिया के साथ बेहतर संबंध रखने को प्रेरित कर रहा है, ताकि चीन को काबू किया जा सके। इसके सामरिक प्रभाव भी देखे जा रहे है। इस वर्ष के अंत में भारतीय नौसेना, ऑस्ट्रेलियाई, अमेरिकी और जापानी नौसेना के साथ मिल कर बंगाल की खाड़ी में अभ्यास करेगी। 2007 से ही इन देशों के बीच समुद्री सामरिक सहयोग बढ़ा है और इस पर चीन नकारात्मक प्रतिक्रिया देता रहा है।

एशिया में चीन जमीन और समुद्र में लगातार आक्रामक नीतियां अपनाएं हुए है। इससे यह आशंका बढ़ गई है कि जिस प्रकार अमेरिका ने रूस को घेरने के लिए नाटो का विस्तार कर रूस के पड़ोसी देशों के साथ सुरक्षा संधि की थी, उसी तर्ज पर चीन को घेरने की नीति अपनाई जा सकती है। भारत, ऑस्ट्रेलिया, जापान और अमेरिका लगातार एशिया प्रशांत के समुद्र में अपनी शक्ति बढ़ा रहे हैं। हाल में इसमें न्यूजीलैंड, दक्षिण कोरिया और वियतनाम को भी जोड़ कर इसे क्वॉड प्लस नाम दिया गया है। अमेरिका के आधुनिक युद्धपोत चीन के सामने तैनात हैं।

चीन के उत्तर पूर्व में उत्तर कोरिया है और पूर्व में जापान है। कोरियाई प्रायद्वीप में चीन और उत्तर कोरिया को नियंत्रित करने के लिए अमेरिका सैन्य कार्रवाई के लिए तैयार है। दक्षिण कोरिया की 1953 से अमेरिका के साथ रक्षा संधि है और दक्षिण कोरिया में अठ्ठाईस हजार से ज्यादा अमेरिकी सैनिक और युद्धपोत नियमित रूप से वहां तैनात रहते हैं। मिसाइलों से लैस यूएसएस मिशीगन विमानवाहक युद्धपोत कार्ल विंसन भी वहां खतरे से निपटने के लिए तैयार है। चीन के दक्षिण में वियतनाम, लाओस और म्यांमार है और दक्षिण पश्चिम में नेपाल, भूटान और भारत है। इन सभी देशों से चीन का विवाद है। वियतनाम ने पिछले कुछ सालों में हथियारों की संख्या में भारी इजाफा करके चीन को जवाब देने की तैयारी की है।

भारत गलवान के बाद ज्यादा मुखरता से सामने आया है। चीन के पश्चिम में ताजिकिस्तान और किर्गिस्तान हैं, वहीं उत्तर-पश्चिम में कजाकिस्तान है। ये सभी देश अमेरिका के सामरिक सहयोगी हैं और चीन से इनका सीमाई विवाद बना हुआ है। चीन के उत्तर में मंगोलिया है जिस पर चीन अपना अधिकार बताता रहा है। चीन के दक्षिण पूर्व में हांगकांग, ताइवान और मकाऊ है। हांगकांग को लेकर चीन पूरी दुनिया के निशाने पर है और ताइवान चीन के खिलाफ कोई भी कदम उठाने से गुरेज नहीं करता।

आने वाले समय में इस बात की प्रबल संभावना है कि चीन की जमीनी सीमा से लगे अधिकांश देश और दक्षिण चीन सागर से लगे सभी देश अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ मिल कर सामूहिक रूप से किसी स्पष्ट सामरिक रणनीति के तहत काम कर सकते हैं। चीन से सीमाई विवादों में उलझे देश यह समझ गए हैं कि द्विपक्षीय संबंधों और वातार्ओं से चीन को नियंत्रित नहीं किया जा सकता, बल्कि सामूहिक सुरक्षा की नीति पर चल कर और चीन की सामरिक घेराबंदी करके ही उसकी विस्तारवादी नीति को झटका दिया जा सकता है।

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