NCERT has said that gender stereotypes should be abolished at the play-school level – राजनीतिः लैंगिक असमानता की चुनौतियां

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ऋतु सारस्वत

विगत दशकों में कुछ मुद्दे ऐसे रहे हैं जिन पर दुनिया भर में निरंतर चचार्एं होती रही हैं, लेकिन बावजूद इसके इनके कोई सार्थक परिणाम सामने देखने को नहीं मिले। ‘लैंगिक समानता’ का मुद्दा भी इन्हीं में से एक है, जो तमाम कोशिश के बावजूद यथावत रूप से कायम है। लैंगिक समानता के लिए वर्ष 2020 को महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इस वर्ष बेजिंग घोषणापत्र की पच्चीसवीं वर्षगांठ है और महिला सशक्तिकरण पर यह घोषणापत्र अभी तक का सबसे महत्त्वपूर्ण दस्तावेज है। वैश्विक मंच पर बड़ा सवाल यही उभर कर आ रहा है कि ऐसे कौन से कारण हैं कि तमाम प्रयासों के बाद भी लैंगिक असमानता समाप्त करने की दिशा में ज्यादा कुछ हासिल नहीं हो पाया है।

संयुक्त राष्ट्र के स्थायी विकास लक्ष्यों में लैंगिक समानता भी शामिल है और दुनिया के एक सौ तिरानवे देशों में जिसमें भारत भी शामिल है, ने इस पर हस्ताक्षर किए हैं। इसके अनुसार 2030 तक हरेक देश को अपने यहां लैंगिक असमानता को समाप्त करना है। विभिन्न अध्ययनों से यह बात सामने निकल कर आई है कि लैंगिक भेदभाव के बीज तो बालपन में ही बो दिए जाते हैं। इसमें प्रत्यक्ष भूमिका घर-परिवार और अप्रत्यक्ष भूमिका विद्यालयों की होती है। इस तथ्य की पुष्टि दो महत्त्वपूर्ण तथ्यों से होती है।

पहला अध्ययन स्टैंनफोर्ड विश्वविद्यालय का है, जो बताता है कि घर में बच्चे के जन्म के बाद से ही लिंग आधारित भेदभाव शुरू हो जाता है, जो न केवल बच्चे को मानसिक रूप से कमजोर बनाता है, अपितु उसके मस्तिष्क को भी कुंद कर देता है। नतीजन बच्चा एक ही दायरे में सोचना शुरू कर देता है। वहीं, दूसरा अध्ययन ‘ग्लोबल एजुकेशन मॉनीटरिंग रिपोर्ट 2020’ का है, जो यह दावा करता है कि विश्व भर में स्कूली पाठ्यक्रमों में महिला छवियों की संख्या न सिर्फ पुरुषों की तुलना में कम हैं और जिन महिलाओं की छवि दिखाई गई है, वहां इन्हें सिर्फ पारंपरिक भूमिकाओं में ही चित्रित किया गया है।

विभिन्न शोध यह स्पष्ट कर चुके हैं कि लैंगिक समानता की दिशा में जारी प्रयासों को और भी विस्तारित करने के लिए जरूरी है कि महिलाओं को पेशेवर के तौर पर ज्यादा से ज्यादा सार्वजनिक रूप से सामने लाया जाए और पुरुषों को देखभाल करने वाले घरेलू काम करने वाले के रूप में। मार्च 2020 में संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) की रिपोर्ट ‘जेंडर सोशल नॉर्म्स इंडेक्स’ में पचहत्तर देशों में अध्ययन किया गया। इन देशों में विश्व की लगभग अस्सी फीसद आबादी बसती है। यह अध्ययन बताता है कि लैंगिक असमानता दूर करने के क्षेत्र में पिछले दशकों में हुई प्रगति के बावजूद अब भी नब्बे फीसद पुरुष व महिलाएं ऐसे हैं जो महिलाओं के खिलाफ किसी न किसी तरह का पूर्वाग्रह रखते हैं। इस अध्ययन से एक महत्त्वपूर्ण बात यह निकल कर आई कि पुरुषों की तरह महिलाएं भी महिलाओं को लेकर पूर्वाग्रहों से ग्रसित हैं। यह तथ्य हैरान करने वाला तो है ही, साथ ही विचारणीय भी है कि क्यों महिलाएं स्वयं ही लैंगिक समानता के विरुद्ध खड़ी हैं।

पहली नजर में जो बात समझ में आती है, वह यह है कि लैंगिक भेदभाव किसी भी व्यक्ति के मन में यकायक उत्पन्न नहीं होता। यह समाजीकरण की उस निरंतर चलने वाली प्रक्रिया से ही जन्म लेता है, जो बाल्यकाल से ही आरंभ हो जाती है। महिलाओं के भीतर इस मिथ्या सोच को अंकित करने का निरंतर प्रयास किया जाता है कि महिलाओं का मूल दायित्व परिवार की देखभाल और घरेलू कार्य करना ही है। स्कूली पाठ्यक्रम की पुस्तकें भी इसमें नकारात्मक भूमिका निभाती हैं। यह सच है कि विद्यालय का शिक्षण व्यवहार स्पष्ट और प्रत्यक्ष रूप से कभी भी लैंगिक असमानता का समर्थन नहीं करता है, लेकिन विद्यालय में लैंगिक असमानता अदृश्य स्वरूप में पाठ्यक्रम के हिस्से के रूप में मौजूद है।

यह सर्वविदित है कि पाठ्य पुस्तकीय ज्ञान को विद्यालय में आधिकारिक ज्ञान के रूप में देखा जाता है। इनमें जो ज्ञान, सूचना, भाषा आदि प्रयुक्त होते हैं, वह लैंगिक भेदभाव को उदघाटित करते हैं। इस तथ्य की पुष्टि यूएनडीपी की ‘जेंडर सोशल नॉर्मस इंडेक्स’ रिपोर्ट से भी होती है। अधिकतर सभी पाठ्यपुस्तकों में लड़कों को बहादुर और तमाम विशेषणों से निरूपित किया जाता है और यही प्रतिरूप एक तरह के लैंगिक विषय-कायदे गढ़ते हैं। यही नहीं, विद्यालयों में औपचारिक व छ्द्म पाठ्यक्रम लड़कों और लड़कियों के मध्य विषयों के चयन संबंधी निर्णयों में लिंग आधारित विचारों को चुनौती देने के बजाय इसे बनाए रखने पर बल देते हैं।

ग्लोबल एजुकेशन मॉनीटरिंग रिपोर्ट इस बात पर ठप्पा लगाती है कि इटली, स्पेन, अमेरिका जैसे देशों में भी महिलाओं को एक रूढ़िबद्ध तरीके से ही प्रस्तुत किया जाता है। महिलाओं को निरंतर परंपरागत रूप में दिखाने की प्रवृत्ति के चलते बाल-मन में यह छवि रच बस जाती है कि महिलाओं का काम खाना बनाना है और पुरुषों का काम घर से बाहर जाकर काम करना है। फिर यही सोच पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती जाती है। यह मानसिकता जितनी मजबूती से लड़कों को जकड़ती है, उतना ही प्रभाव लड़कियों के मन-मस्तिष्क पर भी पड़ता है। यही कारण है कि परिपक्व होने पर वे स्वयं न केवल इस लैंगिक असमानता को सहजता से स्वीकार कर लेती हैं, अपितु उस विचारधारा का भी अभिभाज्य अंग बन जाती हैं, जो यह मानती है कि स्त्री, पुरुष से हर क्षेत्र में कमतर होती है। इस संपूर्ण सोच की प्रक्रिया को हम ‘ब्राइट गर्ल इफेक्ट’ कह सकते हैं। हम इस तथ्य को अस्वीकार नहीं कर सकते कि चूंकि पाठ्यक्रम की पुस्तकें बुद्धिजीवी वर्ग द्वारा लिखी जाती हैं, इसलिए उसमें अंकित सभी बातों को सर्वमान्य रूप से स्वीकार किया जाता है।

सदियों से पैठी लैंगिक पूर्वाग्रह की सोच पर पाठ्यपुस्तकें स्वीकृति की मोहर लगा देती हैं। इसलिए यह नितांत आवश्यक हो जाता है कि इस बिंदु पर गहराई से विचार किया जाए। यों तो पिछले वर्ष मानव संसाधन मंत्रालय ने प्ले-स्कूल के दिशा निदेर्शों में लैंगिक समानता की सिफारिश की है। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) ने कहा है कि लैंगिक रूढ़ियों को प्ले-स्कूल के स्तर पर ही खत्म किया जाना चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि बच्चे जब बड़े हो तो वे लिंग के आधार पर पक्षपात नहीं करें। यह भी दिशानिर्देश दिए गए कि शिक्षकों को ऐसी भाषा से बचना चाहिए, जो किसी एक लिंग या अन्य तक सीमित हो, उन्हें तटस्थ भाषा का इस्तेमाल करना चाहिए।

भाषा के महत्व को कई देशों ने स्वीकार किया है। बीते दिनों कैलिफोर्निया के बर्कले शहर में बर्कले सिटी काउंसिल ने उन शब्दों को बदलने का फैसला किया है, जिनसे स्त्री या पुरुष की भनक लगती है। इस आदेश के अनुसार ‘सीवरेज तंत्र’ के जो ‘मैनहोल’ होते हैं, उन्हें ‘मेंटनेंस होल’ कहा जाएगा। मैनपॉवर को ‘वर्क फोर्स’ या ‘‘ मैन एफर्ट’ कहा जाएगा। इस दिशा में स्वीडन जो कि लैंगिक समानता के मामले में पहले पायदान पर खड़ा है, ने हाल के वर्षो में लैंगिक भेदभाव दूर करने के लिए नए शब्द ‘हेन’ का प्रयोग करना शुरू कर दिया है। इस शब्द का प्रयोग किसी व्यक्ति विशेष की लैंगिक पहचान कराए बगैर उसके संबंध में बात करने या जानकारियों के आदान-प्रदान करने के लिए होता है। लैंगिक रूढ़िवादिता को तोड़ने की दिशा में निसंदेह इस तरह के प्रयास सार्थक पहल हैं, परंतु इस सोच को गति तभी मिल सकती है जब संपूर्ण भारत में इस तरह की विचारधारा स्थापित की जाए, जहां पुरुष और स्त्री के मध्य असमानता उत्पन्न करने वाली भाषाई दीवार अपना अस्तित्व कायम ना रख सके।

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